प्रकाश झा की फिल्म आरक्षण अगले १२ अगस्त को रिलीज होगी. प्रचार-प्रसार जोरों पर है. ९० के दौर में जब हमारी उम्र के सारे लोग दुनिया की नादानियों को समझने की कोशिश कर रहे थे, तो दिल्ली यूनिवर्सिटी में हुए उबाल ने एक बड़े समुदाय को प्रभावित किया. आरक्षण मुद्दे ने हमें इतना प्रभावित किया कि सच में कहें, तो सरकारी नौकरी से एक तरह का अलगाव का भाव पैदा हो गया. एजूकेशन में आरक्षण को लेकर विवाद का दौर जारी रहा, जो अंततः ५० फीसदी आरक्षण पर जाकर रुक गया. लेकिन अब जब दो दशक बीत चले. हमारे पिताजी, मौसाजी, चाचा जी और तमाम लोग रिटायर हो रहे हैं और हमारी उम्र के करीब ६० से ७० फीसदी लोग प्राइवेट सेक्टर में मांस गला रहे हैं, तो हम अब दलित विचारधारा की अवधारणा को समझने की कोशिश में लग गए हैं. हम और हमारे तमाम दोस्त खुद को आर्थिक दलित की श्रेणी में रखने से गुरेज नहीं करते. प्राइवेट सेक्टर में काम करते हुए जहां रोजी-रोटी को लेकर तमाम दोस्तों को नौकरी के रहने या नहीं रहने के तनाव से लगातार जूझना पड़ता है, वहीं उन्हें ये भी सोचना पड़ रहा है कि बुढ़ापे में, अगर ईमानदारी से काम किया जाए, वो क्या लखपति कहलाने के भी भागीदार होंगे क्या? हमारी पीढ़ी के लोग न तो उतनी पूंजी जुटा पाए हैं कि वो अपनी आनेवाली पीढ़ी को शानो शौकत से रहने को प्रेरित कर सकें और न ही इतने बेफिक्र ही हो पाए हैं कि बुढ़ापे में कोई टेंशन न हो. महंगाई का आलम सब जानते हैं. नमक, तेल से लेकर बढ़ती ब्याज दर जान ले रही है, तो बच्चों की पढ़ाई इतनी महंगी होती जा रही है कि औसत मिडिल क्लास का आदमी बस ग्रैजूएशन ही कराने की सोच सकता है. सरकारी स्कूलों में पढ़ाई न के बराबर है और यूनिवर्सिटी में शिक्षा का जो हाल है, वो किसी से छिपा नहीं है. आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों में आज हर वर्ग के लोग शामिल हैं. सीधे तौर पर दो वर्ग तैयार हो रहे हैं, एक वो जो किसी न किसी तरह से धन का जुगाड़ कर आराम की जिंदगी बसर कर रहा है और दूसरा वो जो मात्र दस से २० हजार की मासिक कमाई कर किसी तरह से अपना पेट पाल रहा है. बचत कुछ नहीं. इनके परिवार की माली हालत भी महीने का अंत आते-आते पतली हो जाती है. आखिर ऐसा क्यों है कि हमारी सरकार और या हमें इस वर्ग की कोई चिंता नहीं है. वैसे भी जिस जातीय संरचना के आधार पर नियम कानून बने बनाए गए हैं, वो तो धीरे-धीरे टूट रहे हैं. अंतरजातीय विवाह की प्रक्रिया रफ्ता-रफ्ता सारी संरचना को बदल कर देगी. गांव-देहात में बसे लोगों को भी इस आर्थिक दलित वाली कैटेगरी में रख कर सोचना चाहिए. आज के टाप इंस्टीट्यूट बिना पांच या दस लाख की फीस से नीचे में नहीं मानते, तो फिर आर्थिक दलित कैटेगरी वाले लोगों के बच्चे कहां से अच्छी पढ़ाई कर पाएंगे. कैसे एमबीए या इंजीनियरिंग करेंगे. अब सवाल ये है कि ऐसे में गलत काम करके अंधाधुंध पैसे कमाने की प्रवृत्ति क्यों न बढ़े. कोई भी व्यक्ति क्यों न सीमा लांघे. कई सवाल हैं? वैसे भी पढ़ने-पढ़ाने के खेल में कोई भी ब्यूरोक्रैट या पॉलिटिशियंस अपने बेटे या बेटी को शहर के सरकारी स्कूलों या कालेजों में नहीं पढ़ाता. सबके बेटे या बेटी दिल्ली, मुंबई, बंगलौर या लंदन में पढ़ते हैं. वहीं आर्थिक दलित कैटेगरी के बच्चे चुपचाप, बेदम होकर अपनी ग्रैजूएशन की डिग्री के लिए इंतजार करते रहते हैं. उसमें भी सरकारी नौकरियों में चयन को लेकर अनियमितता एक अलग सर दर्द देता है. एक अदद सरकारी नौकरी मिल जाए, ये ख्वाब हमारे युवाओं को मिट्टी का पुतला बना रहा है. अब तो अभियान ये होना चाहिए कि पढ़ाई के मामले में कैसे भी स्टेट खर्च वहन करे और हमारे बच्चे उन सारी सुविधाओं का सरकार की ओर से लाभ उठाएं, जो वो देती है. आखिर लोकतंत्र लोक के लिए है, परलोक के लिए नहीं. लोगों का संतुष्ट होना ज्यादा जरूरी है. दूसरी बात जातिगत बहस को एकदम से परे रख कर पूंजीवादी नजरिये से हर बहस को देखना और तौलना चाहिए. पिछले सौ साल में क्या हुआ, क्या नहीं हुआ, ये अब पुरानी बात है. आज की पीढ़ी मंडल कमीशन और बाबरी मस्जिद विवाद के जमाने से आगे निकल चुकी है. इसलिए वक्त रहते आर्थिक दलित के वजूद को खत्म करने की कवायद करना जरूरी है, बशर्ते हम जातिगत बहस में न पड़ें. क्योंकि आज १०० में से ७५ फीसदी युवा आर्थिक दलित की कैटेगरी से जुड़े हैं. इस जमात को अब एक नया लीडर चाहिए.
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गांव की कहानी, मनोरंजन जी की जुबानी
अमर उजाला में लेख..
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1 comment:
क्या थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी।
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