कुछ साल पहले तक बाबुजी जब भी लाइफ इंश्योरेंस की बात करते थे, तो एलआइसी की ही बात होती थी। ग्लोबलाइजेशन के बाद कान्सेप्ट बदला। नयी फिजांओं में नयी कंपनियां आयीं। लुभावने, मनमोहक और मायावी दुनिया का सरताज बन बैठी इन कंपनियों की चिकनी बातों में न जाने कितने करोड़ रुपये इस देश की जनता के फंसे हुए हैं। भाई, मेरा मकसद यहां इन्हें बदनाम करना नहीं है, लेकिन हाले अमेरिका का जो हो रहा है, उसमें तो मन ऊपर-नीचे हो रहा है।
एआइजी का दम निकलने जैसी घटना ने अमेरिकी अथॆव्यवस्था को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया है। आज अमेरिकी अथॆतंत्र मजबूर है। कल तक दूसरे को संभालनेवाले खुद को संभालने में लगे हैं। मेरा मकसद भारतीय जनमानस में मची हलचल को सामने रखने का था। एक औसत भारतीय हाडॆ अनॆ मनी को हमेशा सुरक्षित हाथों में रखना चाहता है। हम ज्यादातर लोग पहले अमेरिकी अथॆनीति के अंदरूनी प्रक्रिया से अपरिचित रहे। लेकिन हालिया घटनाओं ने हमें भयग्रस्त, चिंतित और संशकित बना दिया है। लोन के लेन-देन पर टिकी अमेरिकी अथॆव्यवस्था के रहस्य को समझ चुके हैं। प्राब्लम होम लोन पर बढ़ती ब्याज दर से शुरू हुई। जिसे आम लोग अमेरिका में चुकाने में असमथॆ होने लगे। जिसका परिणाम हुआ कि इन कंपनियों की इकोनॉमिक पोजिशन गड़बड़ा गयी।
ज्यादातर विदेशी कंपनियां अमेरिकी अथॆनीति से ही प्रभावित प्रतीत होती है। उनके गड़बड़ाने से पूरे विश्व की अथॆव्यवस्था पर असर साफ दिख रहा है। ऐसे में हम जब अपने लाखों रुपये इन कंपनियों में निवेश कर चुके हैं, तो क्या आनेवाले समय में यह सुरक्षित रहेगा, यह एक अहम प्रश्न है। बड़ी-बड़ी निवेश करनेवाली ये कंपनियां सुरक्षित मापदंड अपनाने को बाध्य हो गयी हैं।
मेरा मानना है कि कम से कम सरकार ऐसी नीति बनाये, जिससे इन कंपनियों की अपने देश में जो स्थिति है और जो भी इनके इनवेस्टमेंट हैं, उससे एक निवेश करनेवाला पूरी तरह परिचित रहे। ज्यादातर एजेंट और अधिकारी कंपनी के रुतबे और पोजिशन का हवाला देते रहे हैं। लेकिन हाले अमेरिका के बाद अब शायद ऊपर के सवालों का जवाब देना जरूरी होगा।
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Friday, September 26, 2008
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अमर उजाला में लेख..