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Saturday, November 29, 2008

क्या फिर होगी बेहुदा बयानबाजी?

पिछली आतंकी घटनाओं के बाद अब ये देखना दिलचस्प होगा कि कौन साहब सबसे पहले आगे आकर इस पुलिसिया कारॆवाई पर उंगली उठाते हैं। पिछले सालभर से पुलिस और सेना का भी राजनीतिकरण इस आतंकवाद के मुद्दे के बहाने कर लिया गया। लेकिन इस बार ये बवाल इतना बड़ा और विशाल आकार ले चुका है कि शायद अब किसी तथाकथित रहनुमाओं की हिम्मत नहीं होगी कि सामने आकर बेहुदा बयानबाजी करें। अगर करें, तो पुख्ता सबूत के साथ। इजरायल ने आतंकी घटना के मद्देनजर मदद की पेशकश की, जिसे ठुकरा दिया गया। लेकिन हम इजरायल से आतंकी घटनाओं से निपटने के तरीकों के बारे में सीख सकते हैं। इजरायल काफी छोटा देश है। चारों ओर से दुश्मनों से घिरा हुआ। लेकिन उसके बाद भी उसने शेर की तरह रेगिस्तान में अपना झंडा लहरा रखा है। जरूरी है कि सरकार तत्काल बिना कुछ देरी किये फेडरल एजेंसी बनाये और राज्यों के साथ को-आरडिनेशन को तगड़ा करिये। बस यही उपाय है। इस बार का हमला हमारे खुफिया तंत्र की नाकामियों को साफ उजागर कर रहा है। अगर अब भी हालातों से हम सबक नहीं लेंगे, तो कब लेंगे। सुरक्षा के नाम पर हो रही राजनीति इस देश को एक अंधेरी गुफा की ओर धकेल रही है। हर राज्य बस अपनी सोच रखता है। अब समय आ गया है कि अब देश के स्तर पर सोचा जाये। क्योंकि टकराव किसी छोटी ताकत से नहीं है, बल्कि ऐसी ताकत से है, जिनसे लड़ने में सेना, कमांडों और एटीएस तक के पसीने छूट गये। सोचिये, मुकाबला ६० घंटे तक जारी रहा। एक स्पेशल ट्रेंड लड़ाके ही डट कर इतनी देर तक मोरचा संभाल सकते हैं। इन आतंकवादियों ने बेस्ट को-आरडिनेशन, कान्फिडेंस और जानकारियां होने का उदाहरण पेश किया है। जिससे हमारा और हमारी हुकूमत की नींद हराम हो गयी है। ये एक सबक है सरकार के लिए। इसे जाया नहीं जाने दिया जाये। हो सकता है कि इन आतंकियों के नाम पर फिर राजनीति हो। लेकिन आम जनता कम से कम इस बार ये गंदी राजनीति सहन करने की स्थिति में नहीं है। बस बहुत हुआ। अब और नहीं।
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