हिंदी ब्लागिंग की दुनिया में एक साल हुए। इसे लेकर काफी दिलचस्पी भी बनी रही। पता नहीं क्यों, व्यक्तिगत खेमेबाजी के अलावा पिछले सालों में काफी कुछ पढ़ने को मिला। एक से एक लेख पढ़ते रहे और पढ़ रहे हैं। लेकिन पता नहीं क्यों, ऐसा लग रहा है कि स्तरीय सामग्री की निरंतर कमी होती जा रही है।
प्रोफेशनल एटीट्यूड के साथ लिखनेवाले कमतर नजर आते हैं। सिर्फ दूसरे के लेखों का लिंक लगाकर कब तक ब्लाग को चलाते रहेंगे। जो लेख जहां हैं, वहां तो रहेंगे ही, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर आप कितना योगदान देते हैं, ये अहम हैं। ब्लागिंग जितना आसान लगता है, उतना है नहीं। एक ब्लागर लिखने के लिए हमेशा जुगाड़ की तलाश में रहता है। कई ग्रुप ब्लाग भी दिखने में आ रहा है कि खेमेबाजी और आरोप-प्रत्यारोप के शिकार हो गए हैं। ये बेहतर संकेत नहीं हैं।
खुलकर बहस करने को लेकर कमतर लोग लिखते हैं। ऐसा क्या है कि हिन्दी ब्लागिंग में एक तरह का हल्कापन नजर आता है। बस लिख देना या बस ट्रैफिक बढ़वाने के लिए विवादास्पद लेखन करना, क्या यही ब्लागिंग है। कुछ लोग तो ब्लाग लेखन को साहित्य तक का दर्जा दिलाने के लिए लगे रहते हैं। मुझे तो हमेशा कहने को जी करता है कि छोड़ यार, जो जैसा है, रहने दो। खुद की प्रशंसा से इतर समाज की अंदरूनी जानकारी देनेवालों की संख्या कम नजर आती है।
हिंदी ब्लाग जगत को लेकर क्या मेरा सोचना गलत है या ऐसा कुछ हो रहा है, जिसमें कि नजर डालने से कमजोरियां साफ झलकती हैं। काफी सवाल हैं, जिन्हें जानने की इच्छा है।
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Saturday, July 18, 2009
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गांव की कहानी, मनोरंजन जी की जुबानी
अमर उजाला में लेख..