कोई आदमी कितना पैसा चाहता है. किसी की चाहत कितनी हो सकती है. ये हम-आप नहीं बता सकते, लेकिन आईबीएन-७ और कोबरा पोस्ट के स्टिंग ने पानी का पानी साफ कर दिया है. झारखंड के विधायक पचास लाख से लेकर एक करोड़ तक की चाहत रखते हैं. अब ये खबरें कोई रिएक्शन क्रिएट नहीं करते. कहीं भी नेशनल लेवल के चैनलों में सिवाय आईबीएन-७ के इस खबर को नहीं चलाया जा रहा था.
सिस्टम का टूटना कोई एक दिन में नहीं होता. आज झारखंड सबसे भ्रष्ट राज्यों में से एक है. जिस राज्य में दस साल में छह से ज्यादा बार सीएम ही बदले गए हों, वहां की स्थिति की कल्पना की जा सकती है. आज झारखंड राज्य का कोई माई-बाप नहीं है. हम किसी योजना को लेकर ये नहीं कह सकते हैं कि हमारे राज्य में ये योजना पूरी हो जाएगी.दूसरे राज्य सारी आफतों के बाद भी विकास के रास्ते पर धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन यहां ऐसा कुछ भी नहीं है. सही में कहें, तो हमें त्रासदी की सिवाय यहां कुछ नजर नही आता.
विधायक लोग भी क्या करें, उनके अधिकार राजनीतिक अस्थिरता की भेंट चढ़ जा रहे हैं.आज के दौर में झारखंड में हर विधायक सीएम बनना चाहता है. चाहे वह कहीं से भी किसी भी स्तर का हो. राजनीतिक हलके में बेचैनी नजर नहीं आती. सबकुछ बेशर्मी की भेंट चढ़ चुका है. आदिवासी सीएम के नाम पर स्टेट में सीएम की कुर्सी का बंटाधार हो चुका है. चयन के वक्त योग्य व्यक्ति दरकिनार कर दिए जाते हैं. आदिवासियों में भी योग्य नेता होंगे. लेकिन उन योग्य नेताओं को उभरने का मौका नहीं मिलता.
ये एक ऐसा राज्य है, जहां के राजनीतिकों को चार-पांच को छोड़ कर पढ़ने का कोई शौक नहीं. वे जानकारी के नाम पर शून्य नजर आते हैं. घोटालों की राशि की जब बात आती है, तो पूरे स्टेट का बजट उस घोटाले के सामने फीका नजर आता है. यहां के लोगों ने भी मान लिया है कि हमारे नेता ऐसे ही हैं. जब झारखंड बना था, तो यहां सरप्लस बजट था. यानी कि बजट से ज्यादा आमदनी थी. आज इसका बजट घाटा डराता है.
हर क्षेत्र में विफलता है. ये राज्य आज तक बिजली का एक पावर प्लांट तक नहीं लगा सका है. इसके एनएच में जर्जर पुल और खराब सड़कें आती हैं. रांची सहित आधे से ज्यादा राज्य का हिस्सा नक्सलियों के प्रभाव में है. अगर हम अधकिरायों की बातें करें, तो उनके अधिकार क्षेत्र की भी सीमाएं हैं. वे क्या करें. कहीं भी बिना पुलिस के आना-जाना नहीं कर सकते हैं. अधिकारियों को चुननेवाली जेपीएससी को प्राइवेट एजेंसी की तरह यूज किया गया. अब निगरानी इसकी जांच कर रही है और दोषियों को निशाने पर ले रही है.
न तो यहां नौकरी पक्की है, न उद्योग और न ढंग की राजनीति ही. बिहार को गरियानेवाले अब झारखंड को गरियाते नजर आते हैं. शायद बाहर के राज्यों में झारखंड के नाम पर लोग हंसते भी होंगे. पता नहीं, इस राज्य का स्तर और कितना गिरेगा.
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Tuesday, August 3, 2010
Wednesday, July 21, 2010
राजनीति के बहाने छिछोरेपन का नंगा नाच
कल मेरे दोस्त की बेटी ने पापा से पूछा-अंकल टीवी पर आंटी गमला क्यों फेंक रही हैं. दोस्त ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा-बेटे उनका दिमाग खराब हो गया है.
वे यह नहीं बता सके कि ये बिहार विधानसभा के बाहर की तस्वीरें हैं. ये जनता की चुनी गयी प्रतिनिधियों में से एक हैं. इनके सहारे हमारा शासन चलता है. बिहार के नौजवान बाहर जाने पर धिक्कारे जाते हैं. उन्हें बिहारी संबोधन गाली जैसा लगता है.
अब जब टीवी पर जनप्रतिनिधियों के द्वारा विधानसभा में चप्पल फेंकने और गमला फेंकने की घटना सरेआम दिखाई जा रही है, तो यहां की संस्कृति को लेकर बिहार के लोग किस दम पर अपने अनोखे होने का दावा कर सकते हैं.
जब बिहार से तथागत जैसे लड़के पूरे देश में बिहार राज्य का नाम रौशन कर रहे हैं, तो उसके बीच बिहार के जनप्रतिनिधि इमेज की लुटिया डुबोने में लगे हैं. शासन तंत्र कोई लाठी चलाने से नहीं आता, ये समझ लेना चाहिए. लालू प्रसाद के दस सालों के कार्यकाल में किस प्रकार का विकास हुआ, ये जगजाहिर है. उसमें अब नीतीश सरकार के शासन के चार साल गुजरने के बाद विपक्ष फिर से उग्र अंदाज में सक्रिय हुआ है. लेकिन बातें तब तार्किक लगेंगी, जब विपक्ष अपनी बातों को तरीके से रखे.
बिहार को आगे ले जाना सारे लोगों का सामूहिक दायित्व है. लेकिन राजनीति के बहाने छिछोरेपन का नंगा नाच कितना उचित है. ये हमारे राजनेता सोच कर देखें.
वे यह नहीं बता सके कि ये बिहार विधानसभा के बाहर की तस्वीरें हैं. ये जनता की चुनी गयी प्रतिनिधियों में से एक हैं. इनके सहारे हमारा शासन चलता है. बिहार के नौजवान बाहर जाने पर धिक्कारे जाते हैं. उन्हें बिहारी संबोधन गाली जैसा लगता है.
अब जब टीवी पर जनप्रतिनिधियों के द्वारा विधानसभा में चप्पल फेंकने और गमला फेंकने की घटना सरेआम दिखाई जा रही है, तो यहां की संस्कृति को लेकर बिहार के लोग किस दम पर अपने अनोखे होने का दावा कर सकते हैं.
जब बिहार से तथागत जैसे लड़के पूरे देश में बिहार राज्य का नाम रौशन कर रहे हैं, तो उसके बीच बिहार के जनप्रतिनिधि इमेज की लुटिया डुबोने में लगे हैं. शासन तंत्र कोई लाठी चलाने से नहीं आता, ये समझ लेना चाहिए. लालू प्रसाद के दस सालों के कार्यकाल में किस प्रकार का विकास हुआ, ये जगजाहिर है. उसमें अब नीतीश सरकार के शासन के चार साल गुजरने के बाद विपक्ष फिर से उग्र अंदाज में सक्रिय हुआ है. लेकिन बातें तब तार्किक लगेंगी, जब विपक्ष अपनी बातों को तरीके से रखे.
बिहार को आगे ले जाना सारे लोगों का सामूहिक दायित्व है. लेकिन राजनीति के बहाने छिछोरेपन का नंगा नाच कितना उचित है. ये हमारे राजनेता सोच कर देखें.
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