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Sunday, July 4, 2010

बेहतर पत्रकारों का टोटा होता जा रहा है...

रांची में जब अखबार दो रुपए और एक रुपए में बिकने लगे, तो पाठकों में एक उत्सुकता सी जग गयी है. हमसे पत्रकार होने के नाते थोड़ा स्नेह जताते हुए हालचाल जरूर पूछ डालते हैं. वास्तविकता ये है कि आज के दौर में रांची में जैसी प्रतियोगिता के आसार दिखाई पड़ रहे हैं, उसमें बड़े-बड़े जानकार भी माथा पकड़े बैठे हैं. पत्रकारों का एक से दूसरे संस्थान तक जाना आम हो गया है. कई मौके पत्रकारों के साथ अखबार के कर्मियों को मिल रहे हैं. ये अच्छी बात है. शायद यहां काफी सालों बाद ऐसा मौका आया है.

रांची जैसा शहर और यहां के लोग ऐसी प्रतियोगिता के लिए कभी तैयार नहीं रहा.जिस जंगल राज की कल्पना हम नहीं कर सकते, वह यहां होता दिख रहा है. संस्थानों के पास सर्वाइव करने के लिए मार्केट के हिसाब से खुद को ढालने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिखता. इन सब चीजों के बीच साफ तौर पर दो बातें साफ होती हैं कि या तो पत्रकारिता के उच्च मापदंड यहां पर आनेवाले दिनों में विकसित होंगे या फिर एक अखबार की मोनोपाली वाला पुराना सिस्टम फिर से लागू होगा. ये तो अब समय ही बताएगा. हां तो पत्रकारिता के लिहाज से आप जैसी भी बातें कर लें, एक बात और हो रही है, वो हो रही है कि नयी पीढ़ी के पत्रकारों और पुराने पत्रकारों के बीच वैचारिक विमर्श की कोई गुजाईश बची हुई नहीं दिखती. इन सारे उथल-पुथल के बीच सीनियर और जूनियर पत्रकारों के बीच एक फासला करीब-करीब मिट गया है, वैसे में उनके सामने भी खुद की काबिलियत को बढ़ाने और जूनियरों के बीच खुद की काबिलियत को दिखाने की परिस्थिति आन पड़ी है.

परिवर्तन तो संसार का नियम है और जो इस परिवर्तन के हिसाब से खुद को ढालते हैं, वही जिंदा रहते हैं. ऐसे में सीधे तौर पर सवाल पत्रकारों के खुद की काबिलियत को बढ़ाने पर आ टिकता है. हमने तो संस्थानों को बिगड़ते-बनते देखा है. वैसे में कोई संस्थान तो तभी जिंदा रह सकता है, जब उसमें अपने कर्मियों के प्रति सम्मान का भाव होगा. आज के दौर में उन लोगों के प्रति संस्थानों में ज्यादा इज्जत के भाव रहते हैं, जो शायद लगातार संस्थान बदलते रहते हैं. उन लोगों के लिए नहीं रहते, जो संस्थान के लिए साल दर साल प्रतिबद्ध रहते हुए काम करते रहते हैं.

होना ये चाहिए कि कर्मियों को संस्थान में ही तरक्की के अवसर दिया जाना चाहिए. ऐसा नहीं करने पर संस्थान उन चंद अवसरवादियों के हाथों खेलते रहते हैं, जो सिर्फ स्वार्थ के लिए उनका इस्तेमाल करते हैं.संस्थान से ही देश है और जब संस्थान ही अपने उच्च मानदंडों को कायम नहीं रखेंगे, तो देश का विकास ही हाशिये पर होगा. खासकर मीडिया इंडस्ट्री दोतरफा नीति का सबसे ज्यादा शिकार है. इसलिए बेहतर पत्रकारों का टोटा होता जा रहा है. स्थिति चिंताजनक होने के साथ चुनौतीपूर्ण है.
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