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Saturday, March 6, 2010
ये संस्कृति, वो संस्कृति, आइ डोंट केयर...
भारतीय नारी, भारतीय पुरुष, हमारी धरती, हमारा देश......। ये क्या हमारा-तुम्हारा लगा रखा है। कैसी नारी, कैसा पुरुष, कैसा धरती, कैसा देश. आइ डोंट केयर। आइ वांट ओनली मनी। आइ वांट टू राइज एबव आल। ये लफ्फाज हम-आप मन में रोज दोहराते हैं। फेसबुक या ब्लाग पर कमेंट्स लिखते हुए महान बनने के मुगालते में नहीं रहे। एक-दूसरे को जूते की माला पहनाते, चिकोटी काटते, गरियाते, धर्म की अंधी गलियों में भटकने की सलाह देते हुए संस्कृति और संस्कार की बात करते हैं। नहीं जंचता। नहीं मन मानता है। मन करता है ब्लाग के सेटिंग में जाकर डिलीट बटन को दबा दें और सारा लफड़ा खत्म। न ब्लाग होगा और हम वैचारिक क्रांति के अग्रदूत बनेंगे। मेरे लिये संस्कृति मेरी दिनचर्या है। २४ घंटे में मेरे जीवन के १८ घंटे संघर्ष में बीत जाते हैं। मैं अपनी संस्कृति के बारे में नहीं जानता। संस्कृत की किताबों के दर्शन किये दशक बीत गये। दो मरे-चार घायल से फुर्सत नहीं मिलती। और अब ये टिपियाने की लत। ऐसी जिंदगानी मेरे उन लाखों युवा भाइयों की है, जो नौकरी कर रहे हैं या जिंदगी की गाड़ी संभाल रहे हैं। मुझे सही मायने में कहें, तो ऐसे महिला-पुरुष दोस्त चाहिए, जिनमें बदलाव लाने की ऊर्जा हो, जो संस्कृति के नाम पर बदलाव की प्रक्रिया को रोकें नहीं। असीमित ऊर्जा के स्रोत मेरे साथी मुझे ताकत दें। वे वैचारिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक स्तर पर कार्यों को अंजाम देनेवाले हों। गरीबी को दूर करने के लिए पैसे चाहिए और ये पैसा मुझे संस्कृति की पुरातन विचारधारा को कायम रखते हुए नहीं मिल सकता। मैं उस संस्कृति को मानने से इनकार करता हूं, जो मेरी खुशियां मुझसे छीन ले। मैं चिल्लाना चाहता हूं। रोड पर चलते हुए जोर की सीटी बजाना चाहता हूं। सामनेवाले किसी पर गरियाते हुए भड़ास निकालना चाहता हूं। ऐसी ऊर्जा चाहता हूं, जो मुझे मेरे लक्ष्यों को पाने की ताकत दे। मैं लफ्फाजों से बचना चाहता हूं। उस माइंड सेट से बचना चाहता हूं, जो ये बताये कि सुबह सिर झुकाये निकलो और शाम को सिर झुकाये घर में घुस जाओ। मैं आंख में आंख भिड़ाकर ललकारना चाहता हूं कि सामनेवाली की औकात क्या है। मुझमें उससे आगे बढ़ने की ताकत है। मैं लंबी लंकीर खींचने में विश्वास करता हूं। ये संस्कृति, वो संस्कृति, आइ डोंट केयर....।
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अमर उजाला में लेख..