Friday, December 19, 2008

मंदी की मार या कंपनियों की रणनीति

मंदी की आड़ में न जाने कितने लोगों की नौकरियां खतरे में पड़ गयी हैं। हर दिन लोग भगवान को प्रणाम कर घर से निकलते हैं और अगले दिन की चिंता लिये घर आते हैं। शायद कंपनियों का प्रबंधन भी खुद को बचाये रखने के लिए जद्दोजहद कर रहा हो, लेकिन एक सवाल जो मन में कौंधता है, वो ये है कि मंदी की मार के नाम पर कहीं कंपनियां जानबूझ कर ऐसा कदम तो नहीं उठा रही हैं। यह एक विचारनीय मुद्दा है, क्योंकि ऐसी कोई मजबूरी नहीं है कि कम से कम छह महीने तक धीरज न रखा जा सके। शायद अगले फिनांशियल इयर तक दृश्य कुछ बदल भी जाये। शायद कंपनियां मंदी की आड़ में अपने अनचाहे कमॆचारियों से छुटकारा पाने के लिए रणनीति अपना रही हैं। जिस प्रकार से जेट एयरवेज में शुरुआत में छंटनी की गयी थी, उससे एक खतरे का अहसास उसी समय हो गया था। ज्यादातर जगहों पर इसे हौले-हौले अंजाम दिया जा रहा है। लेकिन हमें यह याद रखना चाहिए कि वक्त बदलता है और जो मेहनत करते हैं, मेहनती हैं, उनकी हर जगह पूछ है। इस समय सबसे बड़ी जरूरत सकारात्मक सोच रखने की है। अगर कंपनियां कमॆचारियों में विश्वास व्यक्त करते हुए उनसे नौकरियां न छीन कर कंपनी के हित में कुछ त्याग करने की बात करे, तो शायद ये उचित होगा। उन हजारों परिवारों के बारे में सोचिये, जिनके कमानेवाले नौकरी खो जाने से बेरोजगार हो गये हैं। इनएफिशिएंसी एक शब्द या मायने हटाने के लिए हो सकते हैं, लेकिन ये सब क्या इसी समय किया जाना उचित है, यह एक अहम सवाल है। जिस बड़े पैमाने पर कठोर निणॆय कंपनियां ले रही हैं, उससे देश में एक अविश्वसनीय माहौल बन रहा है। सरकार कम से कम इस दिशा में जरूर कठोर कदम उठाये।

1 comment:

j k jain said...

आपने सही लिखा है कम्पनियां मंदी की आड में अपने कर्मचारियों को निकाल रही है। जबकी पिछले दिनों 95 प्रतिशत कम्पनियों के तिमाही परिणाम में फायदा ही दिखाया है। जब फायदा हुआ है तो मंदी कहां है ? कैसे है ?
जयन्त कुमार जैन

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