Saturday, January 10, 2009

गजनी, गजनी, गजनी..... अब आप गरियाइये या तारीफ करें, फकॆ क्या पड़ता है?

गजनी फिल्म की कुछ लोग प्रशंसा करते हैं। कुछ गरियाते हैं। कुछ आसिन के अभिनय की तारीफ करते हैं। हर कसीदा कढ़ा जाता है। गजनी, गजनी, गजनी.........। यानी हर कोई बेताब है उसे देखने, समझने और नुक्ताचीनी करने को। अब भारतीय फिल्म के परिप्रेक्ष्य में, सफलता-असफलता के मापदंड पर और हर कोण से आप-हम उसे बांचने में लगे हैं। यानी एक फिल्म की मारकेटिंग हो रही है जबरदस्त। और यही गजनी फिल्म की सफलता की कहानी है। पांच दिन में सौ करोड़ कमाना कोई हसी-ठठ्ठा नहीं है। आपकी उंगली टिपियाती है, सबकुछ कहने-लिखने के बाद कि गजनी जाये भाड़ में। लेकिन जनाब आप तो उसे देख चुके हैं, ब्लाग पर परोस चुके हैं विवेचना के साथ। अचार और मसाला डालकर। यानी जो न देखना चाहे, जो न जानता हो, वह भी एक बार देखेगा। यही नहीं दुनिया के उस अंतिम छोर पर बैठा एक अफ्रिकी भी देखना चाहेगा, जो कि ट्रांसिलेटर की सहायता से आपक ब्लाग को पढ़ रहा होगा। यानी गजनी को मिल गया है वल्डॆवाइड फेम। फिर वही हमने गजनी की जोरदार मारकेटिंग कर दी है आलोचना करते हुए, तारीफों के पुल बांधकर। गजनी पर संपादकीय तक लिख डाला गया है। किसी भी फिल्म या कला की आलोचना या समालोचना ही उसे हिट या फेल बनाती है। हम देखते हैं। उसके लिए पैसे देते हैं और बाजार में पैसे कमाने के हिसाब से एक हीरो का दरजा दिला देते हैं। इन सब चीजों के बाद सवाल यही है कि अब जब गजनी सरीखी बेहतर कही जानेवाली फिल्म हिट हो जाती है, समाज का हर तबका गहरी सांसें लेकर गजनी का आनंद ले रहा है, तो गजनी को गरियाने से क्या होगा? गजनी तो सौ करोड़ कमा, नया रिकाडॆ बना चल निकली है अपनी राह पर। जहां अगले पचास साल तक उसकी विवेचना होती रहेगी और भारतीय हिन्दी फिल्मों में एक मानक के तौर पर मानी जाती रहेगी।

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