Thursday, February 5, 2009

नहीं लिख पाया चांद-फिजां की दास्तां....

सुबह उठा, तो नेट कनेक्शन के थोड़ी देर की डिस्टरबनेंस ने थोड़ा चिड़चिड़ा बना दिया था। यह एहसास हुआ कि ब्लागिंग या कहें नेट सरफिंग नशे के जैसा है। जब नेट ठीक हो गया, तो चांद और फिजां के विवादों के समुद्र में डूबे मीडिया पर मन मार कर लिखना शुरू किया, फिर सोचा, क्या इस टॉपिक को छूना सही है। छोड़ दिया। क्योंकि वैसे भी कोई राष्ट्रीय मसला नहीं, जिससे हजारों लोगों की जिंदगी प्रभावित हों। हम तो वैसे भी रुचि लेने से रहे।
मूड आया कवि बन जाऊं और लिख डाली एक कविता चाय पीते हुए चाय पर। शायद जमा नहीं। ब्लागवाणी से अतिथि लोग ज्यादा नहीं पधारे, कोई बात नहीं, अपना काम तो कमॆ किये जाना है।
शाम में डिजिटल कैमरे की खोज में निकला। लेकिन भैया पांच हजार से नीचे का कैमरा आता नहीं और मैं महंगा खरीदता नहीं। मन की डांवाडोल स्थिति को किसी तरह संभाला और आ गया घर। डिजिटल कैमरा क्यों खरीदना चाहता हूं, ये भी दिलचस्प है। मेरी दिलचस्पी इधर यूं ही फोटोग्राफी में बढ़ी है। इसे ब्लागिंग की देन कहें या मेरी फितरत। अच्छा लगता है कोई तस्वीर देखकर। जिंदगी के हर पहलू को छूती नजर आती है। अपनी बेटी की जिंदगी को तस्वीरों में उतारने की ख्वाहिश है। देखता हूं, कब खरीद पाता हूं।
आज का दिन बिना कुछ पाये बीत गया। इधर देर शाम ब्लाग लिखने बैठ गया। फिर कुछ टॉपिक नहीं सुझा। तब ध्यान आया, क्या मैं अपनी आज की आपबीती नहीं लिख सकता। लिखने बैठ गया। मेरे मन में एक चिंता श्रीलंका में तमिल मुद्दे को लेकर तमिलनाडु में उभरे विवाद से प्रभावित हुए उत्तर भारतीय छात्रों को लेकर भी है। खैर, इसे लेकर ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। समय के साथ ये भी बीत जायेगा।
अब फिर अगली पोस्ट में काफी कुछ।

3 comments:

संगीता पुरी said...

बहुत समस्‍याएं है देश के सामने......अच्‍छा किया नहीं लिखा.......चांद फिजा की दास्‍तां कोई ऐसा मुददा नहीं.....जिसे मीडिया ने इतना महत्‍वपूर्ण बना रखा है।

Richa Joshi said...

कामना है कि आपके हाथों में जल्‍द से जल्‍द डिजीटल एसएलआर कैमरा आए।

Kishore Choudhary said...

मेरी भी शुभकामनायें है और उम्मीद कि आपके चित्रों से समझू दुनिया को जल्द ही

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