Sunday, February 22, 2009

रहमान का संगीत, हमारी टुच्ची मानसिकता, वास्तविकता को नकारती बहस

स्लमडॉग मिलिनेयर की आस्कर में धूम है। जय हो, जय हो की धूम पर थिरकते कदम झूमते थक नहीं रहे। एआर रहमान का संगीत जब बांबे फिल्म में सुना था, उसी समय से फैन था। अब रहमान ने अपनी संगीत के जादू से पूरे पश्चिमी जगत के साथ आस्कर अवार्ड समारोह को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। कोई कितना भी बहस कर ले कि स्लमडॉग मिलिनेयर में भारतीय परिदृश्य को गलत तरीके से पेश किया गया है, लेकिन अब इस बहस ने पूरी तरह छद्य देशभक्ति का रूप ले लिया है। क्या आपका भारतीय मीडिया उन गांव, कच्ची गलियों और टूटी-फूटी सड़कों की खैर खबर लेता है। जिस पर कम से कम ६० से ७० फीसदी आबादी हर रोज गुजरती है या रहती है? देशभक्ति के उद्वेग में सिर्फ गाली दे देने से स्लमडॉग मिलिनेयर का महत्व खत्म नहीं हो जाता है।

एक सवाल पूरी बहस में उठती है कि क्या प्रतिभा, कला या सिनेमा को देश, प्रांत और समय की सीमा में बांधकर रखा जा सकता है। इस फिल्म में जब आप छोटे बच्चों को खुश होकर ताली बजाते और उमंग के साथ धमाचौकड़ी करते या बस यूं ही ट्रेलर में देखते हैं, तो आप खुद को उल्लास के चरम बिंदु पर पहुंचने से रोक नहीं पाते।

एक ब्लाग पर बहस चलाने के दौरान फिल्म के पूरी तरह से भारतीय होने के मुद्दे को कुरेदा गया। लेकिन क्या कला को भारतीयता की सीमारेखा में आप-हम तौलेंगे? इस टुच्ची मानसिकता से हम किसका भला कर रहे हैं। अगर हॉलीवुड की फिल्में आपको खींचती हैं, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वे अमेरिका में बनती हैं। बल्कि इसलिए कि हालीवुड की फिल्मों ने खुद को देश, भाषा या खास दायरे में कैद कर नहीं रखा है। यही कारण है कि आप किसी भी हॉलीवुड एक्टर को अपने ही देश में सर आंखों पर बैठाते हैं।

आजादी के ६० सालों तक सिर्फ गांधीवाद पर बहस करते रहे, लेकिन एक विदेशी नागरिक आपके देश में रहकर गांधीवाद का अध्ययन, परिश्रम कर गांधी पर फिल्म बनाता है। कुएं के मेढक की भांति दायरों में बंधकर हम बहस की जुगाली करते हुए कब तक सच्चे भारतीय होने का ढोल पीटते रहेंगे। स्लमडॉग मिलिनेयर हमें इस बार इस बात का एहसास करा गया है।

वैसे अभी तो जय हो, जय हो के रहमान की धुन पर झूमिये।
जह हो रहमान, जय हो

1 comment:

अविनाश वाचस्पति said...

किसी ने यह क्‍यूं नहीं कहा

यह भोले का प्रताप है

शिवरात्रि पर।

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