Monday, March 30, 2009

मीडिया संयम क्यों न खोये, बहस जारी हैं

मेरी पिछली पोस्ट में ज्ञानदत्त पाण्डेय कहते हैं

तकनीकी विकास और उसके माध्यम से दुनियां का जुड़ाव तो रोक पाना सम्भव न होगा। पर असंयम की वृत्ति जिसने सब-प्राइम क्राइसिस और मन्दी को जन्म दिया; वह जरूर समाप्त होनी चाहिये/होगी।

प्रचार-प्रसार माध्यमों को भी असंयम बांटना बन्द करना चाहिये।


उपर्युक्त टिप्पणी में श्री पाण्डेय जी प्रचार-प्रसार माध्यमों द्वारा असंयम बरतने की बातें करते हैं।

ये सोचनेवाली बात है। आज के दौर में क्या महत्वपूणॆ है बाजार या व्यक्ति। आज बाजार व्यक्ति के ऊपर हावी नजर आता है। यानी व्यक्ति होने के मायने बदल गये हैं। जब व्यक्ति को व्यक्ति नहीं माना जाता। जब सिर्फ पैसे के दृष्टिकोण से पूरी व्यवस्था को देखना शुरू करते हैं, तो हमारे विचार बदल जाते हैं। रिश्तों में खटास आनी शुरू हो जाती है। साथ ही विचारों का प्रवाह भी रुक जाता है। जब सोच नहीं हों, तो विचार कहां से आयें। जब विचार नहीं आयें, तो आइडिया कहां से आयें।
मंथन करनेवाले लोग भी कहां से हैं। शहर से ही। कस्बों या गांवों से नहीं। जब बुनियादी जरूरतों को पूरा करनेवाला तबका ही प्रभावित नहीं होगा, तो फिर आइडिया की बातें करना बेकार है। मीडिया या संचार भी सिर्फ बाजार को ध्यान में रखकर पैसेवाले वर्ग की जरूरतों को ही निशाने पर रखता है। क्योंकि वही उसका खरीदार होता है। वैसे में मीडिया संयम क्यों न खोये? संयम तो तब आयेगा, जब मीडिया अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए उन सारे दबावों से मुक्त होगा, जिसका वह वर्तमान समय में सामना कर रहा है।
मीडिया के सामने तो खुद इतनी चुनौतियां हैं कि वह अस्तित्व की रक्षा के लिए बाजारवाद के हर हथकंडे को अपनाने के लिए मजबूर है। मीडिया को सरकारी संरक्षण मिले या नहीं, ये तो बाद की बात है, लेकिन उसे कम से कम इतनी स्वतंत्रता आर्थिक या सामाजिक तौर पर जरूर देनी चाहिए कि वह सरकार और आम जनता के बीच बेहतर संवाद का माध्यम बने। हावी बाजारवाद के सामने संयम, सामाजिकता और परंपरा का निर्वाह गैर-जरूरी चीजें लगती हैं।
मीडिया को बात-बात पर गरियानेवाले क्या यथार्थ का सामना करने को तैयार हैं। मीडिया भी तो उसी व्यवस्था का एक अंग हैं, जिसके सहारे हम जीते और गाते हैं। संयम के लिए तात्कालिक बहस से ऊपर उठकर अन्य पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा। मीडिया सिर्फ टीवी चैनल और अखबार नहीं हैं। मीडिया में एडवरटाइजमेंट से लेकर लिखे और सुने जानेवाले हर अंग का समावेश होता है। इसे समझना होगा। नहीं तो संयम या असयंम के बहस में हम सिर्फ दीवार को अपनी बातें सुनाते रह जायेंगे।

2 comments:

आशीष कुमार 'अंशु' said...

'मीडिया सिर्फ टीवी चैनल और अखबार नहीं हैं। मीडिया में एडवरटाइजमेंट से लेकर लिखे और सुने जानेवाले हर अंग का समावेश होता है। इसे समझना होगा। '

Baat Me Dam hai

Harkirat Haqeer said...

जब सिर्फ पैसे के दृष्टिकोण से पूरी व्यवस्था को देखना शुरू करते हैं, तो हमारे विचार बदल जाते हैं। रिश्तों में खटास आनी शुरू हो जाती है। साथ ही विचारों का प्रवाह भी रुक जाता है। जब सोच नहीं हों, तो विचार कहां से आयें। जब विचार नहीं आयें, तो आइडिया कहां से आयें।

aapke vichar acche lage....!!

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