Tuesday, April 7, 2009

बहस से परे है मां का रिश्ता, रिश्तों के इर्द-गिर्द लड़ा जानेवाला एलेक्शन

मां की भावना को लेकर क्या बहस की जरूरत होती है? जब आदमी जन्म लेकर संसार में आता है, तो मां की ममता उसे पालती, पोसती है। दुनिया की सबसे कोमल भावना का नाम मां है।
उसे लेकर मायावती और मेनका गांधी के बीच जारी विवाद चाहे जो रंग लाये, लेकिन इसने एक बहस जरूर शुरू की है कि असली मां किसे कहेंगे, जो जन्म देती है या मां उस भावना को कहेंगे, जो हरेक स्त्री के भीतर मौजूद है। किसी छोटे बच्चे को देखकर किसी भी स्त्री का प्यार उमड़ना स्वाभाविक है। यहां उस समय ये नहीं देखा जाता है कि वह स्त्री उस बालक की जन्मदाता है या नहीं। उस भावना को आप कोई शब्द नहीं दे सकते हैं। वरुण कैसे हैं या वरुण का लालन-पालन कैसे हुआ, ये वरुण का व्यक्तिगत मामला है। इस पर बहस नहीं करेंगे। लेकिन मां जैसे रिश्ते को लेकर इस बहस ने जो स्वरूप अख्तियार किया है, वह जरूर चौंकानेवाला है।

ये एलेक्शन मुद्दों के लिए लड़ा जानेवाला नहीं याद किया जायेगा। इसे याद किया जायेगा रिश्तों की बानगी के इर्द-गिर्द लड़े जानेवाले एलेक्शन के तौर पर। एक वरिष्ठ टीवी पत्रकार इस मामले को मेनका गांधी बनाम मायावती के रूप में पेश करते हुए कहते हैं कि ये ऐसी दो महिलाओं के व्यक्तित्व का टकराव है, जिनका बैकग्राऊंड एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है। एक ही देश की दो सामाजिक परिस्थितियों को ये दोनों दर्शाती हैं। मायावती जहां नीचे से ऊपर उठकर उच्च पद तक पहुंचने की उदाहरण हैं, तो मेनका गांधी पढ़े-लिखे वर्ग से होने के साथ एक राजनीतिक परिवार से संबंध रखती हैं। ये एलेक्शन रिश्तों की नयी परिभाषा गढ़ रहा है।

जगत की पालनहार सर्वशक्तिमान स्वरूप को भी मां के तौर पर देखते हैं। उनकी पूजा करते हैं। शक्ति और धीरज आशीर्वाद के तौर पर मांगते हैं। एक मां त्याग की प्रतिमूर्ति होती है। मां कभी ये नहीं देखती है,उसकी संतान उसके त्याग और प्रेम के बदले कुछ देगी। मां जैसे रिश्ते को हम शब्दों में बयान नहीं कर सकते। और न ही इसे राजनीतिक चश्मे से देखकर इस आलौकिक भावना की तौहीन कर सकते हैं। और न ही हमें ऐसा करना चाहिए।

अगर मेनका या मायावती इस रिश्तों को लेकर बयानबाजी कर रही हैं, तो उन्हें दुनिया के मालिक के आगे कभी-कभी जवाब देना होगा। उन्होंने इस पवित्र रिश्ते को राजनीतिक चश्मे से क्यों देखा? मदर टेरेसा ने कभी इस देश में आकर इसे विदेशी या देसी धरती के तौर पर नहीं देखा। उन्हें गरीब का बालक या बुढ़ा-बीमार व्यक्ति भी उतना ही अपना लगता था, जितना कि कोई अपना अपना लगता था। लोग उनकी निःस्वार्थ भावना देखकर उनसे जुड़ते गये और उन्होंने एक बेहतरीन संस्था इस दुनिया और देश को दी। उनके योगदान को हम भुला नहीं सकते।
मदर टेरेसा उन हजारों बेसहारा बच्चों के लिए मां थीं, जिन्हें उन्होंने सहारा दिया था। मां की भावना को सिर्फ जन्म देनेवाली स्त्री की सोच से परे होकर सोचना होगा। तभी इस भावना के साथ न्याय होगा।

1 comment:

संगीता पुरी said...

बहस से परे है मां का रिश्ता, रिश्तों के इर्द-गिर्द लड़ा जानेवाला एलेक्शन ... बहुत सही कहा।

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