Wednesday, May 13, 2009

दिशाहीन लड़ाई लड़ रहे हैं नक्सली

छत्तीसगढ़ से पत्रकार अनिलजी नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव पर चिंता जाहिर करते हैं। चिंता जायज है। चिंता इसलिए भी जायज है, क्योंकि नक्सलियों के बढ़ते प्रभाव का असर हम हालिया चुनावों में देख चुके हैं। लेकिन ये चिंता सिर्फ लेखन करने से नहीं, बल्कि हकीकत में विकास के दायरे को आम आदमियों तक बढ़ाने से दूर होगी। सही मायने में कहें, तो सरकार के पास इस समस्या को दूर करने के लिए जिस दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत होनी चाहिए, वह नहीं है। चाहे आतंकवाद का नंगा नाच हो या उग्रवादियों का तांडव, रह-रह कर सिर्फ एक रट्टा सुनाई देता है कि हम इन नक्सलियों या आतंकवादियों का मुंहतोड़ जवाब देंगे। पिछले दिनों सीआरपीएफ की भरती तक के मामले में घपला होने का खुलासा हुआ। आज ज्यादातर इलाकों में सीआरपीएफ ही उग्रवादियों से लोहा लेती है। वैसे में अगर ये संगठन ही कमजोर सिपाहियों से बना होगा, तो नक्सलियों की ताकत का मुकाबला कैसे किया जा सकेगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। सरकार और सरकार के नुमाइंदों से ज्यादा इन नक्सलियों की ताकतों को बढ़ानेवाले उन रहनुमाओं को भी सोचना होगा कि आखिर वे कैसी व्यवस्था का निर्माण करना चाहते हैं। आखिर नेपाल में किस क्रांति की शुरुआत हुई है। अराजकता, अव्यवस्था और हिंसा से भरपूर नेपाल आज कई संकटों से एक साथ जूझ रहा है। व्यवस्था पर प्रहार करनेवाले नक्सली भी हिंसा पर अमादा होते हुए अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करने लगे हैं। आये दिन की बंदी के आह्वान से आर्थिक संकट को भी बढ़ावा मिल रहा है। आज खुद कई टुकड़ों में विभाजित नक्सली अपनी विचारधारा से अलग होकर दिशाहीन लड़ाई लड़ रहे हैं।

3 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

नक्सलियों को दिशाहीन कहने से काम नहीं चलेगा। उन्हों ने तो अपना घोषित उद्देश्य राज्य और उस के बलों पर हमला करना बनाया हुआ है। यह राज्य के विरुद्ध युद्ध है। राज्य ही इस युद्ध को लड़ने में अक्षम और कमजोर साबित हुआ है। जब भी इस तरह की हिंसा होती है। राज्य कभी आत्मालोचना नहीं करता नहीं दीखता। नक्सली संकट से निपटने को कोई इच्छाशक्ति और तैयारी नजर नहीं आती। बस नक्सलियों और बिनायक सेन की रिहाई के लिए आंदोलन चलाने वालों को कोस कर कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है। बिनायक सेन ही नक्सली हिंसा के लिए जिम्मेदार है तो वह दो वर्ष से जेल में बंद है। नक्सली हिंसा उस के बावजूद बढ़ रही है। मुझे तो लगता है कि छत्तीसगढ़ की सरकार को सत्ता में बने रहने का कोई अधिकार नहीं रह गया है। मुख्यमंत्री लोकप्रिय हो सकते हैं। लेकिन ऐसी लोकप्रियता किस काम की जिस में राज्य का बल ही शिकार बनता रहे। या तो रमन सिंह समय बद्ध योजना बना कर इस समस्या से निपटें या फिर खुद को असफल मान कर सक्षम लोगों को इस समस्या को हल करने का अवसर दें। जिस तरह से नक्सली हिंसा से निपटने का काम किया जा रहा है उस से तो वह हिंसा ही राज्य की वर्तमान सरकार के विरुद्ध सही सिद्ध होने लगेगी।
आप ने इस हिंसा पर चिंता को जायज बताया है। अब चिंता करने का नहीं कुछ वास्तविक काम करने का समय है वरना पूरा छत्तीसगढ़ राज्य इस हिंसा की चपेट में आ जाएगा।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

पानी सर से ऊपर जायेगा तब ही कुछ कठोर कदम होगा। शायद अभी गर्दन तक आया है।

Anil Pusadkar said...

क्या किया जा सकता है ठोस कुछ करने के नाम पर। अब आम आदमी या पत्रकार तो बंदूक उठा कर जंगल मे जायेगा नही लक्सलियो से लड़ने के लिये।सरकार की नाकामी तो है ही इसमे किसी को शक़ भी नही है लेकिन इसका मतलब ये तो नही है कि नक्सली जो कर रहे हैं उसके खिलाफ़ कलम न उठा कर खामोश तमाशा देखा जाये।यंहा ऐसे-ऐसे लोग आ रहे है डा बिनायक सेन की रिहाई की मांग के लिये धरना प्रदर्श्न देने जिन्होने न कभी छत्तीसगढ को देखा है और न ही डा बिनाय्क सेन को। हवाई जहाज से आते है धरना देते हैं और हवाई जहाज से लौट जाते हैं।क्या कोई बता सकता है कि इस धरना प्रोग्राम के लिये रूपया कहां से आ रहा है?क्या कोई बता सकता है कि छत्तीसगढ के जंगलो मे रहने वाले के समर्थन मे सारी दुनिया मे धरना प्रदर्शन कौन करवा रहा है?क्या पुलिस वालो और निर्दोष जनता के मरने पर उन लोगो को ज़रा भी दुःख नही होता क्या?क्या सैकड़ो लोगो की असमय मौत किसी भी प्रकार से किसी के मानवाधिकार का हनन नही हैं?और भी बहुत से सवाल हैं।बाकी फ़िर कभी।

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