Sunday, June 14, 2009

टूटते सपनों को बुनने को वक्त

सुना है सपनों के भी पंख होते हैं
हमने भी देखा था सपना कुछ बनने का
अब ३० पार की इस उम्र में
यथार्थ का सामना करते हुए
पाता हूं खुद को असहाय
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एक अच्छा इंसान बनने का सपना टूट गया
छूट गये रिश्ते, छूट गये खींचते वे डोर
अब सिर्फ प्लास्टिक की मुस्कान के साथ
बतकही करते वक्त गुजरता है
जिन रिश्तों की गर्माहट
महसूस होती थी हर वक्त
मिलते थे दो-तीन दिन पर जो हर बार
वे अब मिलते हैं फेसबुक और मोबाइल पर
तरंगों पर सवार होकर करते हैं दुनिया की सैर
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जो किसी की छुअन के लिए तरसते हैं
वे ही हमारे रिश्तों की कब्र खोद
खुद मिट्टी डाल रहे उस पर
हौले-हौले, गरम-गरम मिट्टी
जिसके नीचे अब सिसकती जिंदगी भी बंद हो जायेगी
क्योंकि बदलते वक्त के साथ
रिश्ते बुनने का सपना टूट गया
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टूटते सपनों को बुनते हुए
हम अब संजो रहे फ्लैट का सपना
जहां रहेंगे सिर्फ तीन जन
हम, पत्नी और मेरी बेटी
दुनिया से नहीं होगा मतलब
क्योंकि सपना तो टूट गया
वो तो हमसे रूठ गया
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सपनों को बिखरने मत दो
उसको अब उलझने मत दो
क्या बदलाव की उम्मीद करें हम?
कहीं किसी कोने से
क्योंकि एक बदलाव की उम्मीद से
जगती है आशा
भागती है निराशा
बस एक प्रयास भरकर
टूटते सपनों को बदल डालो
हाथों के कटोरे में गिरते ओस की बूंदों को संभाल लो

4 comments:

अजय कुमार झा said...

मैं वही सोच रहा था की प्रभात जी ने इतनी नकारात्मक....मगर अंतिम पंक्तियों ने कविता में जान दाल दी..और मुझे में भी..अच्छा लगा आपका ये अंदाज भी..

Udan Tashtari said...

सपनों को बिखरने मत दो
उसको अब उलझने मत दो
क्या बदलाव की उम्मीद करें हम?
कहीं किसी कोने से
क्योंकि एक बदलाव की उम्मीद से
जगती है आशा
भागती है निराशा
बस एक प्रयास भरकर
टूटते सपनों को बदल डालो
हाथों के कटोरे में गिरते ओस की बूंदों को संभाल लो


-ये बात एकदम सही कह दी!! बधाई!!

गिरीन्द्र नाथ झा said...

कितने दिनों के बाद ऑरिजनल पढ़ने को मिला। मैं कुछ नहीं कहूंगा बस....यह ऑरिजनल है

stranger said...

हाथों के कटोरे में गिरते ओस की बूंदों को संभाल लो ......
shabd nahi kahne ko...

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