Saturday, September 5, 2009

टीचर्स डे के बहाने शिक्षक समुदाय के उत्थान की बात तो की जाये,

टीचर्स डे, यानी यादों के खजानेवाले डे। एक सुखद अहसास जगानेवाला। तोतलानेवाले दिन से आजतक गाइड की तरह रहनेवाले गुरुजनों को याद कर उन्हें याद करनेवाला डे। लेकिन इस डे को औपचारिक बनानेवाले तमाम लोग अब क्या पहले जैसे ही सक्रिय रहते हैं। शिक्षकों की हालत को तो देखिये, उनके लिए सरकार या अभिभावकों में किस तरह का सम्मान है? जब प्राइमरी या हाइस्कूल के टीचर्स को शिक्षा से ज्यादा अन्य कामों में मशगूल देखते हैं,तो ये सवाल उठना लाजिमी है कि ये गुरु आखिर बच्चों को कितना समय दे पाते हैं।

भारतीय फिल्मों में गुरु या शिक्षक को एक मार्गदर्शक के रूप में दिखाया जाता रहा है। ऐसा होता भी रहा है, लेकिन इसी समुदाय के साथ कितना न्याय हो पाया है या इस समुदाय के लोगों का कितना योगदान रहता या रहना चाहिए, इस पर क्या कभी गंभीर मंथन होता है? टीचर्स डे की औपचारिकता के साथ ये सवाल सबको घेरते हैं।

एक नया कान्सेप्ट पारा शिक्षकों का आया है। बेरोजगार, अद्धॆबेरोजगार युवकों को चार-पांच हजार रुपये में शिक्षक नियुक्त करके आज-कल सरकार इतिश्री कर ले रही है। प्रभावित होती जा रही शिक्षा की गुणवत्ता को देखनेवाला कोई नहीं है।



अब मिड डे मील के नाम पर स्कूलों में जो हिसाब-किताब का खेल हो रहा है,
उसमें शिक्षक समुदाय कई पेचीदगियों में उलझकर रह गया है। वह बच्चों को पढ़ाये या खिचड़ी और अन्य सरकारी कामों को महत्व दे। जागरूकता की कमी, शिक्षकों को महत्वहीन समझने की प्रक्रिया, जुगाड़ तकनीक और पास कराने का दबाव सारा कुछ गुरुजनों के मनोबलों को तोड़कर रख दे रहा है।

वे करें भी तो क्या, जहां उनके समक्ष एक सम्मानजनक जीवन जीने की चुनौतियां मुंह बाये खड़ी रहती है, वहीं कोई विकल्प नजर नहीं आता है। टीचर्स डे पर सिर्फ शिक्षक समुदाय को सम्मान देकर और त्याग की अपेक्षा कर देने से काम खत्म नहीं हो जाता है। जरूरत इस कम्युनिटी की जरूरतों और उसकी दिक्कतों को समझने की भी है।


विश्वविद्यालय से लेकर प्राइमरी स्तर तक राजनीति की घुसपैठ ने पूरे हालात को बिगाड़ कर रख दिया है।
निजी और सरकारी स्कूलों में अलग-अलग मापदंड भी शिक्षा को दो भागों में बांट दे रहा है। इससे पनप रहा असंतोष एक अलग चुनौती है। निजी स्कूलों में भी शोषण की बातें सामने आती रहती हैं। मामला ये है कि निशाने पर टीचर्स कम्युनिटी ही रहता है। जिस पर इस शिक्षा प्रणाली को जिंदा रखने का दायित्व है। कम से कम टीचर्स डे के बहाने शिक्षक समुदाय के उत्थान की बात तो की जाये, ये सबसे अहम है।

वैसे तमाम गुरुओं को मेरा प्रणाम।

1 comment:

संगीता पुरी said...

आपने सही समय पर सटीक बात की है !!

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