Monday, September 21, 2009

हमारे ब्लाग पर अपनी कुंठा का प्रदर्शन न करें।

सुना था कि एक अच्छा व्यक्ति वही है, जो दूसरों के लिए प्रेरक बने। एक साल की इस अवधि में ज्यादा कुछ नहीं, तो इतना जरूर कहना चाहूंगा कि व्यंग्य सधा टिप्पणियां करने का दौर चल पड़ा है। विवाद अपनी जगह है। बातें अपनी जगह हैं। लेकिन टोन, लहजा और उसके साथ अभिव्यक्त करने का अंदाज कुछ ऐसी टीस मन में छोड़ जा रहा है कि इस पोस्ट को लिखने के लिए बाध्य होना पड़ा। व्यक्तित्व विकास की अवधारणा के अनुसार दूसरे को क्षमा करने की आदमी में योग्यता होनी चाहिए। इस लिहाज से मैंने ऐसे ही एक टिप्पणी को (यहां उसे लाना मैं उचित नहीं समझता) पिछली एक पोस्ट में हटा दिया था। इसके बाद भी फिर उन श्रेष्ठ जन ने व्यंग्य कसा टिप्पणी दे मारा। हमें ये आपत्ति नहीं कि कोई मेरी बातों से असहमत रहता है। लेकिन शिष्टाचार के लिहाज से थोड़ी सी इतनी इंसानियत तो होनी चाहिए कि अगले व्यक्ति के धीरज और संयम का सम्मान किया जाये। हमने कमेंट्स मॉडरेशन नहीं लगाया है। मैं इस पक्ष में हूं कि हर कोई खुलकर बहस में भाग ले और हर टिप्पणी को खुले तौर पर देखे। लेकिन फिर कहना चाहूंगा कि ब्लागिंग करते हुए निजी कुंठाओं को इस्तेमाल करने का जो चलन पा रहा हूं, उसे हितकर नहीं मानता। ऐसे में जब अगले को हमारी या अन्य किसी की भावना की कद्र नहीं है, तो क्या ये उचित नहीं कि कमेंट्स मॉडरेशन की व्यवस्था को चालू कर दिया जाये और जैसा चाहें, वैसे कमेंट्स को प्रकाशित होने दिया जाये। लेकिन ये कदम दुश्मनों के मन को भी दुखी करनेवाला होगा। कोई भी कार्य सकारात्मक सोच से ही सफल हो सकता है। यहां हम किसी दंगल में भाग नहीं लेते, जहां सिर्फ हार-जीत का ही फैसला होना होता है। हम यहां विचार पढ़ते और मनन करते हैं। अपने व्यक्तित्व विकास के लिए हम इसे जरूरी मानते हैं। लेकिन इसमें भी अगर कुंठा से ग्रसित होकर हतोत्साहित करनेवाले कमेंट्स देखने को मिलें, तो इसे क्या कहा जाये। इसी सिलसिले में एक बात कहना चाहूंगा कि ब्लाग जगत का मसीहा समझने का भ्रम पालनेवाले कृपा करके हमारे ब्लाग पर अपनी कुंठा का प्रदर्शन न करें। न तो हम कभी किसी की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का पक्षधर हैं और न ही ऐसा करने की इजाजत देना उचित समझते हैं। यहां आइये, तो गपशप करिये, विचारों को आगे बढ़ाइये। श्रेष्ठ जनों से भी आगे बढ़कर एक-दूसरे की इज्जत करने की बातों को प्रश्रय देने की अपेक्षा करता हूं। अगर आपको हमारी बातों से इनकार है, तो उसे उचित शब्दों में रखें। व्यंग्यात्मक टिप्पणियों को न तो मैं सही मानता और न ही ये करने की किसी को इजाजत देने की सोचता हूं।

6 comments:

Arvind Mishra said...

प्रभात गोपाल जी ,न जाने क्यूं आपके संवेदना के तंतु मुझसे बार बार उलझ रहे हैं ! कितने ब्लॉग है मैं नहीं पढ़ पाता अनेक कारणों से मगर आपके ब्लॉग का पन्ना सहज ही खुल जाता है आँखों के सामने -इसलिए की आप में बहुत पोटेंशियल दीखता है टिप्पणियों को खेल भावना से लीजिये -ये अक्सर सहज और स्वयंस्फूर्त होती हैं -हाँ आपको चिढाती हैं तो केवल इस आस से की आपसे बड़ी अपेक्षाएं हैं !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप ने निश्चित रूप से बहुत प्रगति की है। व्यंग्य भी अभिव्यक्ति का माध्यम है और हर प्रकार के लेखन में इस का समावेश कुछ न कुछ होता रहता है। कभी कभी यह स्वाभाविक होता है। और जिस के पास जो होगा वह वही तो छोड़ेगा

बी एस पाबला said...

अगली बार यदि आपके ब्लॉग तक पहुंच कर टिप्पणी का मन हो पाया तो आपकी भावनायों को याद करने की कोशिश की जाएगी

अपनी भावनाएँ ब्लॉग जाहिर करने हेतु आभार

बी एस पाबला

Udan Tashtari said...

चलिये, यह अच्छा रहा कि आपने अपनी भावनाओं से सभी को अवगत करा दिया. शुभकामनाएँ.

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

व्यंगात्मक टिप्पणी की समस्या तो है ही |

वैसे हिंदी ब्लॉग्गिंग धीरे धीरे time pass वाले रास्ते पे ही जा रहा है |

S C Mudgal said...

Dear Prabhat Jha Ji,
It is true that comments may be Positive or Negative. Some persons have sufficient words for expressing their views but some have not and express themselves in their language. It shows their ability or inability and not of yours. We cannot make a line between the persons capable or incapable.
Similar problem is with our leaders. If any honest person decides to work in politics then will we all close in saying that politicians are most dishonest persons? In these circumstances, should that person comes outside the politics. If, on hearing this, he will come out from politics then who will clean the politics.
These are the pros and cons of our Democratic System. We can do something only by avoiding the comments come from here and there. The Suggestion is only that your conscious should be in support of your act.
Satish Mudgal

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