Sunday, September 27, 2009

नक्सल समस्या कोई एक दिन में तो आयी नहीं

नक्सल को लेकर बहस और बयानबाजी के बीच एक बात भूल जाते हैं कि सारे लोग सिस्टम का हिस्सा हैं। राजतंत्र ब्लाग के राजकुमार जी बयान जारी करने की बात को हास्यास्पद करार देते हैं। देखिये, बात बयानबाजी या स्ट्रैटेजी की नहीं है, बल्कि मामले की तह तक जाकर समस्या को सुलझाने की है। एक बात साफ है कि परिस्थितियों के हिसाब से किसी के पास भी साफ और सही नजरिया नहीं है। नक्सल की हिंसात्मक लड़ाई को फोर्स के सहारे मिटाया जा सकता है, लेकिन उसके कारणों के पीछे जानने की कोशिश नहीं होती। ये जानने का प्रयास नहीं होता है कि आखिर ये नक्सली इतनी आसानी से पिछले २०-२५ सालों में इतना कैसे फैल गये? झारखंड बनने के पहले यहां जो नौ या दस राज्य ही नक्सली हिंसा से औसतन ग्रस्त थे, उनकी संख्या अब १५ से ऊपर जा चुकी है। अब जब साझा कार्रवाई की बात की जा रही है, तो उसमें नक्सलियों को हल्के तौर पर तो कतई ही नहीं लेना चाहिए। ये जाहिर तौर पर पते की बात है कि नक्सलियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की बयानबाजी सरकार की रणनीति का ही हिस्सा होगा।
नक्सलियों की ओर से किसी भी प्रकार की कार्रवाई नहीं होगी, ये भी कल्पना से परे की बात है। समस्या विचारधारा की भी है। नक्सल समस्या कोई एक दिन में तो आयी नहीं और न ही राज्य सरकार के पास बल की कमी है। सवाल यही है कि इसके लिए एकीकृत इच्छाशक्ति की जो जरूरत है, वह अभी तक आयी क्यों नहीं? जब पानी सिर से गुजर रहा है, तो सरकार जाग रही है। रेड कोरिडोर की बात एक दशक से की जा रही है। खुद अपने ही देश में असुरक्षित होते जा रहे लोग, सरकार की ओर देखते हैं। लेकिन सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार, कमजोर पुलिस बल, सूचना तंत्र की ढीली तार और संवादहीनता की स्थिति में पंगु साबित हो रहा है। झारखंड में जो पिछला संसदीय चुनाव हुआ, उसमें जो हिंसा हुई, वह पूरे तरीके से सरकार के ढीले रवैये का नतीजा था। यदि सरकार चाहती, तो नक्सलियों की हिंसात्मक रणनीति को टाल सकती थी उन्हें जबरदस्त मुकाबला देकर। लेकिन एक साथ पूरे राज्य में चुनाव करा कर नक्सलियों को कमजोर सुरक्षा इंतजामात के कारण हिंसा के लिए मौका दे डाला गया। सोचनेवाली बात ये है कि अब नक्सलियों के हाथ उस स्तर तक पहुंच चुके हैं, जहां हर कोई असुरक्षित नजर आ रहा है। वैसे इस बाबत गंभीर और सामयिक रूप से विवेचना करने की भी जरूरत है।
आज शासन तंत्र इस पर गंभीर है, तो उसे गंभीर बनने देना चाहिए। नक्सलबाड़ी से उपजे इस आंदोलन को प्रारंभ से लेकर आज तक समझने की जरूरत है। हमें अपने सिस्टम को भी विकसित करना होगा। हमारी कहां खामियां हैं। हमारी रणनीति क्यों कमजोर है, इसे भी समझना होगा। ये एक दिनी कार्य नहीं है और न ही ब्लाग पर सिस्टम को गरिया देने से ठीक होगा। सरकार बयान जारी करे, लेकिन कठोर कार्रवाई भी सुनिश्चित होनी चाहिए। यहां बैठकर बतकही करना आसान है। लेकिन हमें उन लोगों की पीड़ा को भी समझना होगा, जो कि नक्सलग्रस्त क्षेत्रों में रह रहे हैं। साथ ही जो नक्सल हिंसा से शिकार हुए हैं। देश के भीतर से उपजा ये संघर्ष हमें खुद को फिर से तैयार होने का संकेत भी दे रहा है।

2 comments:

jitendra said...

bahut hi prabhavi
kya is bloog ko apke naam se prakashit ki ijjajat hain
plz emailo kare
jjitanshu@yahoo.com

Anil Pusadkar said...

प्रभात जी म्झे इस मामले कुछ कहना नही चाहिये क्योंकि आपने राजकुमार की पोस्ट पर सवाल उठाये हैं।बयान जारी करने पर राजकुमार की आपत्ति जायज है।अगर आपको नक्सलियो पर हमला नवंबर मे करना है तो नवंबर आने दिजिये,सितंबर से ही चिल्लाने की क्या ज़रूरत है।मै मानता हूं एण्टी गुरील्ला वारफ़ेयर मे प्रोपेगण्डा का बहुत महत्व होता है लेकिन ये खुद की रणनीति इस तरह जगजाहिर नही की जाती।आखिर वार मे सरप्राईज़ एक महत्वपूर्ण फ़ेक्टर होता है।प्रोपेगण्डा का मतलब खोखली बयानबाज़ी नही होती।ऐसा करके सिर्फ़ नक्सलियों को उकसा ही सकती है जैसा कि हुआ और सांसद बलिराम कश्यप के पुत्र तानसेन को नक्सलियो ने मौत के घाट उतार दिया।तानसेन का एक भाई राज्य सरकार का मंत्री है।उसके साथ घायल हुआ उसका भाई विधायक रह चुका है।बस्तर के इस प्रभावशाली परिवार पर हमला करके नक्स्लियो ने बयानबाजी से बनाये जा रहे खोखले जवाब का मुंह्तोड जवाब दे दिया।इस वारदात मे किसे क्या मिला पता नही पर बलिराम दादा का एक पुत्र दुनिया मे नही है।अन्यथा न लिजियेगा,छत्तीसगढ मे लोग नेताओ के बयानो से त्रस्त हो गये हैं।नक्सलियों को बख्शा नही जायेगा।नक्सलियो पर चौतरफ़ा हमले किये जायेंगे।पुलिस सिर्फ़ लाश नही गिनेगी?आदि-आदि।तो अब पुलिस क्या कर रही है लाश ही तो गिन रही है।

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