Monday, December 7, 2009

धरती को बचाने की पहल करने की प्रार्थना

पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग जैसी घटना को लेकर सशंकित है। हमारी धरती पर परिवर्तन के बादल यानी भारी बदलाव के संकेत दिखने लगे हैं। वैसे में डिस्कवरी पर धरती पर हुए बदलावों पर रिपोतार्ज हमें उस मायावी दुनिया की सैर कराते हैं, जो सही में यहां थे। बदलाव के उस पार देखने की कोशिश होती है। एक प्रयास होता है। पता चलता है कि आस्ट्रेलिया और भारतीय उपमहाद्वीप आपस में जुड़े थे। ये देखकर प्रमाण सहित आश्चर्य होत है कि २०० किमी की दूरी पर बसे पर्वत कभी एक-दूसरे से जुड़े थे। फियरलेस प्लानेटवाले कार्यक्रम में समुद्र के नीचे से निकलनेवाले गर्म पानी के सोतों और कभी वहां समुद्र की जगह मैदानी इलाका होने की कहानी रोमांचित करती है। बदलाव... एक ऐसा बदलाव, जिसने जीवन रचा। आज का जीवन। जिस पर हम गर्व करते हुए महाशक्तिशाली होने का स्वांग रचते हैं। हम इस दंभ में रोज धरती को नुकसान पहुंचाते हैं। प्रयोगों के नाम पर, रहने के नाम पर और विकास के नाम पर। आज भी पूरी धरती देशों के नाम पर बंटी है। उसमें भी विकसित देश, विकासशील देश और पिछड़े देश। ये सोचिये कि कभी ये देश के खंड आपस में जुड़े थे। बदलाव के बयार में ये एक-दूसरे से दूर होते चले गए। सामूहिक रूप से तो सभी धरती पर ही रहते हैं, तब फिर इस धरती के लिए ऐसा उपेक्षित एहसास क्यों? हमारा स्वार्थ एक महाविनाश को आमंत्रित कर रहा है। हमने नदी का पानी रोक दिया। समुद्र को भी बांधने की कोशिश की। हमने धरती के अंदर सुराख कर उसके दिल को चोट पहुंचाने की कोशिश की। प्लास्टिक के नाम पर कभी न खत्म होनेवाला कचड़ा फेंक कर एक नासूर पहले से दे रहे हैं। ऐसे में धरती में होनेवाले बदलाव की कहानी को सबको जानने या बताने की जरूरत है। वैसे ही जैसे ये बताया जाता है कि सच बोलना अच्छी बात और झूठ बोलना बुरी।
अगर मृत्यु के बाद कोई जीवन है या आकाश से नीचे देखने की कोई व्यवस्था है, तो हम अपनी गलती के कारण आनेवाली पीढ़ियों को कष्ट भोगते पाएंगे या देखेंगे। जरूरी है कि इस बात को पूरी तरह आत्मसात कर लें कि इस धरती को बचाने के लिए हमें देश और राज्य के अहं से ऊपर उठना होगा। ऐसा नहीं हो कि जब तक हम पूरी तरह जगें, काफी देर हो चुकी होगी।

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