Saturday, December 12, 2009

फूट न भी डालो, तो बांट दो।

अंगरेज सीखा गए-फूट डाला राज करो। इस देश पर शासन करनेवाले आज तक इसी राह पर चल रहे हैं। फूट न भी डालो, तो बांट दो। तेलंगाना विवाद करंट की माफिक निकला और लोगों के दिलों को भेदते हुए निकल गया। जब झारखंड बना था, तो आउट आफ फ्रस्ट्रेशन एक ही बात निकलती थी कि अच्छा हुआ, बिहार से अलग हुआ, नहीं तो बिहार बन जाता। आज दस साल बाद आउट आफ फ्रस्ट्रेशन फिर उलट बात निकलती है कि बेकार हुआ, नहीं तो इतना नहीं लुटाता। राज्यों के निर्माण से अनावश्यक शासन तंत्र का निर्माण होता जा रहा है, होता है। सबसे बड़ी चीज संसाधनों के उचित इस्तेमाल की ओर कोई ध्यान नहीं देता। बिहार में नीतीश कुछ हद तक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल कर विकास को तेज करने में जुटे हुए हैं।  


यहां सवाल यही है कि -- 
१. क्या छोटे राज्य विकास की गति को तेज कर देंगे..?
२. क्या मानव और खनिज संपदा का सदुपयोग हो पाएगा..? 
३. क्या छोटे शासन तंत्र से बड़ी मुश्किलों का सामना हो पाएगा..?
४.क्षेत्रीयता का जो तूफान उठ रहा है, वह क्या रुक पाएगा..?
५.उन छोटे राज्यों के भी विभाजन की बात भी आगे क्या नहीं उठेगी ? 


ये देश आखिर कितना बंटेगा? पानी का बंटवारा हो या पैसे का, राज्य लड़ते हैं। देश या राष्ट्र के स्तर पर सोचनेवाले नेता आज नहीं दिखते। रेलवे परीक्षाओं में मारपीट की घटनाओं ने क्षेत्रीयता की दुर्भावना को और उघाड़ दिया है। उसमें तेलंगाना विवाद मामले को और न बिगाड़ दे।

2 comments:

श्याम कोरी 'उदय' said...

... नये राज्यों के गठन से आर्थिक खर्चे का बोझ आता है किन्तु इसके दुरगामी परिणाम सकारात्मक ही ज्यादा रहते है !!!!

परमजीत बाली said...

यह बंटवारा देश को उथल पुथल की ओर ले जाएगा।हाँ ....इस बंटवारे से राजनिति करने वालो को लाभ जरूर पहुँचेगा....लेकिन भुगते की जनता...

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...
There was an error in this gadget
There was an error in this gadget

अमर उजाला में लेख..

अमर उजाला में लेख..

हमारे ब्लाग का जिक्र रविश जी की ब्लाग वार्ता में

क्या बात है हुजूर!

Blog Archive