Thursday, December 17, 2009

मनुष्य के ईश्वर होने की अभिलाषा का अंत कहां होगा?

कन्हैया लाल के चश्मों के नीचे से साजिश रचती आंखें आज तक डराती हैं। प्राण की आंखों की नफरत (परदे की) कंपाती हैं। कुछ ऐसे ही दिलीप साहब का व्यक्तित्व जादुई अहसास करा जाता है। पुराने दिनों की सब चीजें नेचुरल हैं। कल या परसों पढ़ रहा था कि कृत्रिम तरीके से आपरेशन कराकर सुंदरता पायी जा रही है। हम जो परदे पर देख रहे हैं,वह नकली है। असली नहीं। जिन नैन नक्श के दीवाने बनकर हम भवकाल मचाए फिर रहे हैं, वे सब आर्टिफिशियल हैं। ये सब देखकर चिमकी चढ़े लड्डू की याद हो आयी। गजब हो गया, अजब हो गया। जो असली चीज है, वह परदे के पीछे है। हम आधुनिकता का चोला पहनकर बेवकूफ बनते फिर रहे हैं। हम भी बौराए फिरते हैं। मैग्जीनों की रंगीन तस्वीरों में दीवानगी ढूढ़ते, मन को भरमाते टाइम पास करते हैं। अब पार्टनर में, अपने दोस्त में, उसी छद्य प्रतिरूप को ढ़ूढते हैं। आंखों से गिरते ग्लिसरीन की आंसुओं के पीछे छिपे नकली अहसास को दूसरों में देखना चाहते हैं, जो कि कब का मर गया है। संवेदनशीलता के अंत होने की जो प्रक्रिया ३० साल पहले शुरू हुई थी, वह आज चरम पर है। सुंदर, अद्भुत, झक्कास या कहें आंखों को लुभाने की हर कोशिश बाजार का महत्वपूर्ण पहलू बन चुकी हैं। ऐसे में जो असली है, जो असली अहसास है, उसे आप कितने दिनों तक मारते रहेंगे। क्या मौत के बाद भी जश्न मनती है? यहां हमारी और आपकी संवेदना की मौत हो रही है। ये जानना जरूरी है कि हमेशा सबकुछ अच्छा नहीं रहता। समय के पास बुढ़ापा, जवानी और बचपन का आना जरूरी है। हमारा जाना भी जरूरी है। सुना है कि जवानी बरकरार रखने का रास्ता खोज लिया गया है। उस परिस्थिति के बारे में सोचिए, जब दादा-दादी, मां-बाप, मामा-मामी अपने बच्चों, पोतो और भतीजों, भगीनों के साथ जवान ही बन रहेंगे। ऐसे में कैसा समाज और कैसी संवेदना का निर्माण होगा। कैसा समाज रचा जाएगा। मानवीय रिश्तों का अनोखा अहसास मर जाएगा। हम खुद अमरत्व से घबराएंगे, क्योंकि जवान बने रहने की दीवानगी उसी धीमे जहर की तरह होगी, जो लगती मीठी है, लेकिन हर पल मारती जाती है। मनुष्य के ईश्वर होने की अभिलाषा का अंत कहां होगा? क्या आपके पास इसका जवाब है।

3 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सही कह रहे हैं.

कुश said...

सीरत पर सूरत भारी हो रही है.. इंसान भगवान बनना चाह रहा है..

डॉ टी एस दराल said...

असली पर नकली की परत, सिर्फ़ तन पर ही नही, मन पर भी चढ़ गई है।
अच्छा मुद्दा उठाया है आपने।

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