Tuesday, January 26, 2010

अंजुम जी फेसबुक पर सवाल उठाते हैं, वर्तमान पीढ़ी साहित्य से दूर क्यों है?



वर्तमान पीढ़ी साहित्य से दूर क्यों है? उसे साहित्यकारों की जानकारी नहीं? वे नहीं जानते कि महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, निराला या प्रेमचंद कौन हैं। अंजुम जी फेसबुक पर सवाल उठाते हैं। वे सवाल करते हैं.. जरा अपने बच्चों से पूछ कर देखिए क्या उन्होंने महादेवी वर्मा , निराला ,पंत , दिनकर , सुभद्रा कुमारी चौहान , जयशंकर प्रसाद जैसे महान कवियों -साहित्यकारों का नाम सुना भी है... मुझे तो आज निराशा हुई , जब मैंने दिल्ली के अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े कई बच्चों से इस बारे में बातचीत की . जेक एंड जिल से शुरु हुए ये बच्चे हिन्दी की विभूतियों के नाम भी नहीं जानते . जरा सोचिए ... बीस साल बाद इन्हें कौन याद रखेगा ? उन सवालों में सबने भागीदारी की। 


खुद देखिये क्या चर्चा हुई........
Abyaz Khan Ye haalat Vakai Sharmnak hai.. Hindi to Vaise bhi apne hi ghar me Dar-Dar ki Thokren kha rahai hai.. 11 hours ago  


Ajit Anjum आज मैंने बीस बच्चों से बातचीत की . कुछ बच्चे दिल्ली के अंग्रेजी स्कूलों से पढ़कर निकले हैं , कुछ नौकरी करने की तैयारी कर रहे हैं . इनमें से ज्यादातर के लिए ये सभी नाम मंगलग्रह पर किसी अजन्मे जंतु के नाम की तरह हैं . जब निराला , पंत , महादेवी वर्मा को नहीं जानते तो बाकी कवियों और साहित्यकारों की तो बात ही छोड़ दीजिए . अंग्रेजी स्कूलों में पहले ही दिन से हिन्दी से दुश्मनी का रिश्ता कायम करना सिखाया जाता है . उसी का नतीजा है ये सब . तैयार रहिए आने वाली पीढियां पूछेंगी कि प्रेमचंद क्या बेचते थे और निराला - पंत किस खेत की मूली थे ... 11 hours ago 




Pradeep Sharma Sir aapne bilkul sahi kahaa but sir aap jaraa sochiye ki agar ham log surru se hi convent school main naa padhen toh hamari english kamjor reh jaati hai jo ki aaj k time main hamare liye haanikarak ban jaata hai or hamen naukri k liye dar dar ki thokren khaani padti hai ..keval enlish k karan... 11 hours ago Nikhil Anand Aapka Channel Kitne Aur Kin Mahan Kavi Lekhako Ki Jayanti Par Kya Dikhata Hai. Is Globalisation Ke Daur Me Celebrity Se TRP Milti Hai Aapko Na. Seminaar Me Bolne Ke Liye Aur Blog Pe Post Karne Tak To Thik Hai....Kuchh Amal Me Lane Ki Koshish Niji Taur Par Aapne Ki Hai...Par Tasvir Badle Iski Koshish Ho...Ye Kisi Bhi Hindi News Channels Ko Dekh Kar To Nahi Lagta Hai. Chaliye...Aapki Chinta Ke Liye Shukriya. Kam Se Kam Aap Ek Editor Ke Taur Par Achchha- Bura Kahne Sunne Ke Liye Public PlatForm Par To Aa Rahe Hai Lagatar. All The Best. Keep It Up. Regards. 11 hours ago 


Anuranjan Jha सर इन बच्चों को छोड़ दीजिए...एक बार न्यूज रूम में घूमकर पूछिए वहां भी कई सारे लोग ऐसे मिल जाएंगे...जो शायद सिर्फ नाम ही जानते होंगे आस-पास के लोगों से सुनकर। जिनके नाम आपने लिए उनकी पांच-पांच रचनाएं पूछ लीजिए बहुत कुछ साफ हो जाएगा। 11 hours ago 


Piyush Pandey अंग्रेजी स्कूल के ज्यादातर बच्चे इन महाकवियों का नाम नहीं जानते होंगे। ये तय है। लेकिन, क्या हिन्दी स्कूल के बच्चों ने वास्तव में इन कवियों को पढ़ा है? स्कूल की किताब में शामिल एक-दो कविताओं को पढ़ने या उनका नाम भर सुनने से क्या हासिल हो जाएगा? जब पूरे माहौल से ही साहित्य नदारद है और साहित्य स्वान्त: सुखाय रह गया है तो बच्चों को क्यों दोष दिया जाए। वैसे,हिन्दी स्कूलों के बच्चों के बीच एक सर्वे जरुरी है ताकि पता चल सके पाठ्यक्रम से इतर कितने बच्चे साहित्य में झांक कर आए हैं। 11 hours ago  


Ajit Anjum अंग्रेजी जानना जरूरी है . दुनिया को समझने के लिए . दुनिया के साथ कदमताल करने के लिए . जिंदगी में आगे बढ़ना है , दुनिया की रफ्तार से दौड़ना है तो बिना अंग्रेजी के मुश्किल है लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि हिन्दी को दुत्कार दें . हिन्दी को घर के चौखट से बाहर निकालकर तड़ीपार कर दें . अंग्रेजी को अपनाने का ये मतलब तो नहीं कि हिन्दी को दफन कर दें . 11 hours ago 


Ravikant Thakur सर, स्कूलों की बात तो दूर है हिन्दों चैनलों में कई ऐसे लोग हैं हिंदी की गिनती तक नहीं जानते ...इनमें कई एंकर भी हैं चैक कर लिजिएगा.. 11 hours ago Nabeel A. Khan @ I agree Mr Pandey 11 hours ago  


Piyush Pandey सवाल यह है कि बच्चों को कौन बताएगा? आखिर,साहित्य उनकी भागती-दौड़ती जिंदगी के बीच मुख्य जरुरत नहीं है। अपना एक उदाहरण दूं तो मैंने राग दरबारी पहली बार 12वीं में पढ़ी। वो इसलिए क्योंकि मेरे बड़े भाई ने कहा कि व्यंग्य लिखना है तो शुरुआत यहीं से होगी। लेकिन,ग्रेजुएशन के बाद पत्रकारिता के कोर्स में एक सहपाठी ने व्यंग्य लेखन की बात कही तो मैंने राग दरबारी का राग छेड़ा। दोस्त को राग दरबारी का नाम तक नहीं मालूम था। उरई के उस खांटी हिन्दी भाषी दोस्त को मैंने राग दरबारी भेट की....सवाल ये बच्चों को साहित्य से परीचित कौन कराएगा? 11 hours ago 


Nalini Tewari बहुत सारे रिपोर्टस और एंकर भी नहीं जानते होगें। लेकिन अब थोडा रूक कर इनके बारे में पूछिएगा क्योंकि कल सब पढ़ कर आएंगे। एसाइन्मेंट डेस्क के बहुत सारे लोग तो अभी से ही काम (रटने) में लग गए होंगे। 10 hours ago  


Ashish Kumar Deshprem ki saari baatein hume gantantra divas yaa fir kisi aise mauke par hi kyu yaad aati hai..kisi bhi badlab k liye ek nirantar prayas ki jarurat hoti hai..fark itna hai badlab ki disha hi kuch aur ho gayi hai.. 10 hours ago  


Anuranjan Jha कुछ वाकया बताता हूं .. अभी पिछले दिनों राहुल जी कुछ लोगों का इंटरव्यू ले रहे थे अपने चैनल के लिए... तकरीबन 20 लोग थे.. बारी बारी से सबसे एक ही सवाल था अज्ञेय किस पत्र-पत्रिका के संपादक थे ... टाइम्स ऑफ इंडिया से लेकर पंजाब केसरी तक का नाम लोगों ने बता दिया...एक ने सही बताया और उसे नौकरी मिल गई। ये इसी महीने की घटना है। बहुत बुरा हाल है सर!!! 10 hours ago 


Ajit Anjum पीयूष जी , बहुत हद तक सही कह रहे हैं आप लेकिन मेरी थोड़ी असहमति है . मैं तो समान्य ज्ञान की बात कर रहा हूं . जरूरी नहीं कि हर आदमी साहित्य पढ़ - पढ़ कर साहित्यकार हो जाए . आर्टस - साइंस - कामर्स तो पहले से अलग हैं . कहने का मतलब ये है कि लोग नाम भी न जानें ...बचपन में पढ़ी हुई कविताएं - कहानियां वैसे भी हिन्दीदां लोगों को भी याद नहीं रहती फिर किसी और को क्यों रहे . फिर घूमकर मैं वहीं आ रहा हूं मैं साहित्य में डूबने -उतराने की बात नहीं कर रहा . मैं समान्य ज्ञान की बात कर रहा हूं .न्यूनतम जानकारी की बात कर रहा हूं . 10 hours ago 


Ajit Anjum अनुरंजन जी , इस सवाल पर नौकरी कर रहे ज्यादातर लोग भी फेल हो जाएंगे . मैं फिर कह रहा हूं कि अज्ञेय नवभारत टाइम्स के संपादक थे , ये न जाने तो भी चलेगा लेकिन अज्ञेय नाम के कोई सज्जन इस देश में पैदा हुए थे , लोग ये भी जानने को तैयार नहीं हैं भाई . 10 hours ago  


Anuranjan Jha जब मैं जी न्यूज में था बाबा नागार्जुन का निधन हुआ था, किसी ने न्यूज रूम में कहा नागार्जुन नहीं रहे - एक महिला एंकर जो अब किसी बड़े चैनल में हैं नाम बताना उचित नहीं जोर से चीखीं- व्हाट हैपेन्ड-- कितना हैंडसम और यंग था, कितनी कम हिंदी फिल्में आई थी उसकी अभी तक ... क्या करेंगे सर कुएँ में ही भांग मिली हुई है। 10 hours ago  


Ashish Kumar @Anuranjan jha...Sir mass communicators hi disha heen ho chuke hai..jinhone duniya ko communicate karne ka theka le rakha hai..news room me newsman kam news manager jyada milenge.. 10 hours ago 


Piyush Pandey सर, आपकी बात सही है, लेकिन सामान्य ज्ञान बच्चों का बढ़ाएगा कौन? आपका-हमारा और कुछ मित्रों का साहित्य के प्रति रुझान है,इसलिए हमें बच्चों की अज्ञानता चौंकाती है। दरअसल,आपके वक्त में, और कुछ हद तक मेरे वक्त में भी हमारे घर परिवार में साहित्य चर्चा हुआ करती थी। कुछ पत्रिकाएं घर में आती थीं-भले पढ़े न जाएं। तो सामान्य ज्ञान बढ़ता रहता था। वरना, अपने मित्र का उदाहरण मैंने इसलिए ही दिया.....कि हाल सभी जगह खराब है। 10 hours ago 


Madhurendra Kumar ek ghatna mujhe bhi yaad aa rahi hai.waqya pichle dino ka hai . mujhe mere ek mitra ne meri kitab Tyagpatra wapas di.mai us waqt jin logo ke saath tha we log hindi ke top news channels me kaam karte hai.mujhse sawal pucha gaya ki jainendra kumar kaun se lekhak the. 10 hours ago  


Ajit Anjum नई पीढ़ी के लिए गालिब को तो गुलजार और जगजीत सिंह ने जिंदा कर दिया , वरना बल्लीमारान की गलियों से कभी निकल कर भी नहीं आते . 10 hours ago  


Ashish Kumar @Ajit sir..hum industry ki demand k according chal rahe hai..aaj k media me shashakt hindi ki jarurat hi nahi hai... 10 hours ago 


Ajit Anjum आशीष जी , यहां तो मीडिया की बात ही नहीं हो रही है . हम तो हिन्दी की बात कर रहे हैं . 10 hours ago  


Vineet Kumar लेकिन इन रचनाकारों को पढ़ाने वाले माटस्सा लोग अकड़ जाते हैं कि वो दुनिया में साहित्य के जरिए क्रांत ला रहे हैं। आनेवाली पीढ़ी इस साहित्य के ध्रुव से फिसलकर कितनी दूर चली गयी है,इसके बारे में कोई बात नहीं करता।. 10 hours ago 


Nikhil Srivastava इन कवियों का नाम आज भी संस्कृत पाठशाला कहे जाने वाले सरस्वती शिशु मंदिर जैसे स्कूलों में ही लिया जाता है सर. वह भी बड़े गर्व से. लेकिन कितने ऐसे हैं जो अपने बच्चों को कॉन्वेंट शिक्षा नहीं दिलाना चाहते. कॉन्वेंट ही पढ़ लीजिये या इन विभूतियों को पढ़ लीजिये. जैक एंड जिल ही तो होगा. 10 hours ago


Anuranjan Jha आशीष जी थोड़ी असहमति है आपसे - इंडस्ट्री की डिमांड भी तो हम ही ने बनाई है..शशक्त हिंदी क्या होती है- हिंदी तो हिंदी होती है भाई 10 hours ago  


Nikhil Srivastava दूसरी बात यह भी है कि कितने अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे इन विभूतियों को पढ़ें. सच तो ये है कि ये पीढ़े सिर्फ उतना ही करना चाहती है जिससे उसे फायदा हो. मार्क्स मिले बस, उतना ही पढना है. अभिभावकों को भी रिपोर्ट कार्ड में ९९% नंबर चाहिए. वो खुश, बच्चे भी खुश. भाड़ में गया साहित्य. वैसे एक बात और है, ये पीढ़े अंग्रेजी के भी साहित्यकारों के नाम नहीं जानती है. शेक्सपियर के अलावा शायद ही कोई. 10 hours ago 


-Ranjan Rituraj हिंदी साहित्य पढ़ने का चलन हमारे 'मिडिल क्लास' ने ख़तम कर दिया ! 'सारिका' जैसी पत्रिका बंद हो गयी ! कितने घर है - जहाँ कोई 'हिंदी' पत्रिका आती है ? अगर पत्रिका की जगह ' टी वी न्यूज़ चैनल' ने ले लिया है ..तो क्या इनसे कुछ अपेक्षा नहीं की जा सकती की ये लोग 'महादेवी वर्मा' ,'दिनकर' ,'निराला' या कुल हिंदी साहित्य पर मात्र ३० मिनट का एक शो रखें ..? विशेष , हम दर्शक अपनी अवकात जानते हैं ! अपने बल पर हमें जो करना होगा - वो हम करेंगे ! अगर आप मीडिया वाले कुछ मदद कर दें तो ' जैक एंड जिल' वाले बच्चे खेल खेल में कुछ सिख जायेंगे ! 10 hours ago  


-Ranjan Rituraj मीडिया वाले माई बाप लोग - बॉलीवुड पर रोज कई घंटे का कार्यक्रम बन सकता है - फिर 'हिंदी साहित्य' पर आधे घंटा का कार्यक्रम क्यों नहीं ? अरे , मै रोज की बात नहीं कर रहा हूँ ...सिर्फ सप्ताह में एक दिन ...जैसे आप लोग ' लम्बा-लम्बा' गाडी पर कार्यक्रम बनाते हैं ...बिल्डर के फ्लैट्स दिखाते हैं ...वैसे एक कार्यक्रम ..'कविता-पाठ' पर ! मेरा यह मानना है की ...'दिनकर' की कविता शायद की कोई ऐसा होगा जो सुनना नहीं पसंद करेगा ! आपका कार्यक्रम बेजोड़ हिट करेगा ! आप के न्यूज़ रूम वाले लोग भी 'नागार्जुन' के बारे में जान जायेंगे ! कुछ ..कुछ सोचिये ...! बस ३० मिनट सप्ताह में ! 10 hours ago


Nikhil Srivastava रंजन जी, सारी जिम्मेदारी तो मीडिया की ही है. जैसे कि महादेवी वर्मा का कोई शो आएगा और अभिभावक बच्चों को बैठा कर दिखाने लगेंगे. ये महज़ ब्लेम गेम है. एक बात और बताएं, मिडिल क्लास अगर हिंदी साहित्य नहीं पढता तो क्या झुग्गियों और महलों में रहने वाले लोग पढ़ते हैं. एक को शायद ही पढना आता है और दूसरे का स्टेटस हिंदी से मेल नहीं खता... 10 hours ago  


Harsh Vardhan Education system is unfortunately producing all kinds of professionals but not better,honest citizens and humanbeings.That's why we have not produced another Swami Vivekananda again after independence. 9 hours ago  




Ranjan Rituraj निखिल जी , जिम्मेदारी तो सिर्फ और सिर्फ अभिभावक की ही बनती है - या वो भी नहीं ! मै मीडिया पर ब्लेम नहीं कर रहा हूँ ...एक सुझाव दे रहा हूँ - आप इसे कचरे के बक्से में डाल दिगिये ..किसने रोका है ? टी वी किसी भी तरह के 'प्रचार' या 'आन्दोलन' का एक अत्यंत सुलभ माध्यम है ...शायद आप कुछ कर सकते हैं - ऐसा मेरा मानना है ! एक छोटा 'प्रयोग' करने में क्या बुराई है ? 9 hours ago  




Nikhil Srivastava सुझाव का स्वागत है . 9 hours ago  




Mansa Anand आने वाले समय में केवल अ से अमिताभ ओर ल से लालु ओर तीस होगा जो इनका प्रचार करेगा। सब इन्हीं के चारो तरफ घुम रहे है। सालो पहले मालगुडी डे, तमस जैसी साहित्य रचनाओ पर कार्यक्रम बनता था। क्या समय के साथ आदमी का आई क्यु कम होता जा रहा । या उसमें तमस बढती जा रही है। 4 hours ago  


Naveen Joshi सचमुच हालात चिंताजनक हैं लेकिन इसका सीधा रिश्ता स्कूल-कालेज़ से न होकर हमारे घर के माहौल से है. इसका ज़िक्र ऊपर कुछ मित्रों ने किया भी है. आज कितने घरों में हिन्दी के साहित्यकारों की चर्चा होती है, कविताओं-कहानियों का ज़िक्र होता है, हिन्दी की पत्रिकाएं पढी जाती हैं ? बच्चे इसी से सीखते है...उन्हें क्या दोष दिया जा सकता है. about an hour ago 


Chandan Pandey isme galti bachcho ki hargij nahi hai. yah aparaadh unke maa-baap, unke teachers, unke aas paas kee breking news waali media ki hai.i 51 minutes ago  


Ashish Jain उन बच्चों को उन साहित्यकारों का नाम बेशक याद न हो ,पर उन्होंने चेतन भगत की कई अंग्रेजी पुस्तकें कई बार पढ़ी होंगी ,यह दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है ?मैंने खुद देखा है प्रेमचंद को क़िलों के भाव बिकते हुए .....हम 1st hand हिन्दुस्तानी के बजाय 2nd अमेरिकी बनना ज्यादा पसंद करते है...ऐसे मे उन बच्चों का क्या दोष जिनके सामने उदहारण बदल रहे है ...परम्पराए नए दौर में है ,नाम में लोग मज़हब खोज लेते है .....बस यहीं कही तो है अपना हिन्दुस्तान ....सॉरी सर .....अपना इण्डिया ....अंग्रेजी वाला है ना 27 minutes ago  


Prabhat Gopal Jha साहित्य पर इतनी चिंता! मैं ये कहना चाहूंगा कि चैनलों पर कितने समय और कब साहित्यकारों पर कार्यक्रम किए जाते हैं। टीआरपी का डर हमेशा छाया रहता है। कम से कम प्रिंट मीडिया तो साहित्यकारों की चर्चा करता रहता है। अंजुम, सर आप तो चैनल के हेड हैं। क्या आपके स्तर से चर्चा की शुरुआत करने की पहल नहीं हो सकती। जिस दिन हिन्दी के चैनल फिल्मों की जगह साहित्यकारों पर २० मिनट का समय भी चर्चा में जाया करेंगे, तो उद्धार हो जाएगा। पहले खुद से तो पहल हो... 20 minutes ago ·  


Narvijay Yadav Ap itni adhik apeksha kyun rakhte hain? Aj ke adhikansh kids ko Hindi me ginti hi nahi aati. They don't know what is Sattais or Chauntis or Baawan...! Next generation kayi maayano me vichitra hogi. Ye bachche sirf electronic gadgets ke kshetra me hum sabse kaafi tej honge. Lekin ye bachche aage chal kar apni santaano ko maths ya Hindi bilkul nahi padha payenge, yeh bhi pakka hai. Sun ne me azeeb lagta hai, par aisa hi hai, aur aap inse Niraala aur Mahadevi Verma ki ummeed lagaaye baithe hain..!



पूरी बहस देखने के बाद निष्कर्ष तो यही निकलता है कि हिन्दी प्रिंट मीडिया तो साहित्यकारों की चर्चा कर देता है, लेकिन हिन्दी चैनल क्यों नहीं चर्चा करते। 

2 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

साहित्य महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है कि क्या वर्तमान पीढ़ी चरित्र को अहमियत देती है या व्यक्तित्व/ग्लैमर को!

संतोष कुमार "प्यासा" said...

Sahity aur aur sankrati hi samaj ko
bure vysano se bachati hai. Rahi vartman pede ki baat, to aaj ki jyada tar yuwa peedi saahity se door hoti ja rahi hai, jiska kaaran saayd pashchimi sabhyta ka hamare desh me prawesh hai.
Aise me hume mil kar vartman peedi aur apne bhai bahno ko sahi disha dikhana chahie, taaki vo apne desh ki samaj ki sanskrati aur saahity ko bacha saken

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