Monday, January 18, 2010

कुकुर सदस्यों का प्रकोप


रात की चुप्पी में स्कूटर चलाकर आना रोमांचकारी नहीं रहता है। हनुमान जी का नाम लेकर घर की ओर निकल पड़ते हैं, लेकिन उसी दौरान कुकुर प्रजाति के कई सदस्य स्वागत को तैयार खड़े रहते हैं। उन्हें दूर से नमस्कार कर किनारे से निकलने की चेष्टा होती है। शुरुआती दौर में कुछ कुकुर प्रजाति के सदस्य हमें अपनी नापसंदगी बताते हुए झपट पड़ते थे। किसी तरह नये स्कूटर को गियर लगा बच निकलने की कोशिश होती थी। एक बार तो टांग टूटते-टूटते बची। रात में आपको झुंड के झुंड मंत्रणा करते हुए कुकुर प्रजाति के सदस्य मिल जाएंगे। उनकी बढ़ती आबादी को रोकने के लिए न तो स्थानीय प्रशासन ही कोई उपाय करता है और न सरकार ही। हालात ये हैं कि जहां-तहां किसी को भी काट डालते हैं। रात को आनेवाले दो-तीन भाई बंधु तो टांग भी तुड़वा बैठे हैं। अब जिस शार्टकट से हम आते थे, वहां पर उनकी विशेष मेहरबानी रहती थी, इसलिए लांग कट का सहारा लेना पड़ता है। कहते हैं न, जान बचेगी, तो लाखों कमाएंगे, इसलिए जान के लिए पचास रुपए के पेट्रोल की कुर्बानी मंजूर है। कुछ कुकुर सदस्य कार या वैन के साथ गजब की रेसिंग लगाते हैं। हमला तो ऐसे करते हैं, मानो ले ही बैठेंगे। वैसे अस्पतालों में एंटी रेबिज इंजेक्शन कम रह रहे हैं। कई केस कुकुर के काटने के आते हैं और आ रहे हैं। जमशेदपुर में तो आवारा कुकुर सदस्यों के हमले में एक बच्चे की जान भी गयी थी कुछ सालों पहले। बड़ा ही दर्दनाक हादसा था। कुकुरों की आबादी सीमित करने के लिए कई उपाय होंगे, लेकिन इस मसले पर गंभीरता कम ही दिखती है। मैं तो हमेशा बचकर ही निकलता हूं। शायद आपका भी यही प्रयास होगा।

1 comment:

Ram N Kumar said...

Serious issue funny andaaz...

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