Thursday, February 11, 2010

थ्री इडियट्स का रैंचो रुला जाता है..



थ्री इडियट्स का रैंचो रुला जाता है। किताबी दुनिया से अलग सीखने की सलाह देनेवाला रैंचो। दोस्तों के सुख-दुख में साथ देनेवाला रैंचो। रणछोड़ दास यानी आमिर खान फिल्म में गहरी छाप छोड़ जाते हैं। रैट रेस में जुटे छात्र, शिक्षक और उससे उपजती सौ समस्याएं न जाने कितनी प्रतिभाओं को रौंद डाल रही हैं। कहते हैं कि हर मनुष्य के भीतर नैसर्गिक प्रतिभा है और जरूरत उसे उभारने की है। मैकॉले द्वारा कायम शिक्षा पद्धति और उसके बाद इंजीनियरिंग या डॉक्टर की डिग्री के लिए नहीं हटनेवाली जिद ने एक पूरी पीढ़ी को बदल डाला है। आज परिस्थिति ऐसी है कि व्यक्ति कोई वैकल्पिक मार्ग अख्तियार नहीं कर सकता और करना चाहता है, तो उसे पूंजी चाहिए। यह पूरी तरह क्रिकेट गेम की तरह हो गया है। जैसे सिर्फ पैसे के लिए आज क्रिकेट के सामने दूसरे खेलों को दोयम दर्जे का बना दिया गया है, वैसे ही हालात आज के दौर में कला, जेनरल साइंस और अन्य विषयों की है। हालात कुछ ऐसे हैं कि छात्रों पर बढ़ता दबाव उन्हें उन कदमों को उठाने को बाध्य कर रहा है, जो उन्हें नहीं करना चाहिए। समस्याएं तो कई हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या, जो थ्री इडियट्स देती है, वह ये है कि शिक्षा प्रणाली में बदलाव हो। साथ ही जिंदगी का लक्ष्य कुछ सीखने का होना चाहिए, जो काबिल बनाए। साथ ही आदमी कुछ नया दे। हमारे देश में पुरानी पद्धति के आधार पर ही अनुसंधान हो रहे हैं या पश्चिमी शिक्षा या तकनीक पर ही खोज जारी है। यहां इसका अपना क्या है, ये अहम सवाल है। कहते हैं कि जीरो का आविष्कार इसी भारत में हुआ। नक्षत्र विग्यान तक में हम आगे थे। आज ऐसा क्या हो गया कि हम कुछ दे नहीं पा रहे। थ्री इडियट्स में रैंचों का ये कहना कि  तकनीकी कॉलेजों में सबसे अहम सवाल कैसे अमरिका में अच्छी नौकरी पायी जाए, रहती है। अपना देश, अपनी मिट्टी, यहां के लिए कोई जोर नहीं रहता। शायद स्लो डाउन से कुछ प्रभाव पड़ा हो। सच्चाई ये है कि बड़े प्रतिष्ठित संस्थानों के  अधिकांश छात्र विदेशों की ओर रुख कर जाते हैं। क्या इन बड़े संस्थानों का निर्माण सिर्फ तकनीकी छात्रों की फौज खड़ी करने के लिए हुआ है? हमारी गलत मानसिकता को दर्शाती फिल्म कई गहरे सवाल छोड़ जाती है। फिल्म में नाटकीयता तो है, लेकिन उसके साथ उसमें दोस्ती के लिए जान दे देने की तमन्ना को भी बखूबी दर्शाया गया है। हममें आपमें कुछ विशेष है। हम अगर चाह लें, मन से कुछ भी कर सकते हैं। हमारे कई दोस्त जो काबिलियत रखते थे, आज दस से १२ घंटे की नौकरी में हताशा के शिकार हैं। उनमें कुछ अलग करने की गुंजाइश थी। वे कुछ कर सकते थे, लेकिन वे कर नहीं पाए। वैसे फिल्म के लिहाज से ब्लाग भी हिट होने की श्रेणी में रखा जा सकता है, क्योंकि यहां हमेशा कुछ नया लिखने का अवसर रहता है। ये आप पर रहता है कि आप इस वर्चुअल स्पेस का उपयोग कैसे करते हैं। फिल्म का संदेश यही है कि रैट रेस में मत रहो, काबिल बनो, कुछ नया दो। एकदम नया....


.हमारा बच्चा जो बनना चाहे, उसे बनने दो। उस पर दबाव मत डालो। लेकिन इसके साथ ऐसा सिस्टम भी तैयार करना होगा, जहां पढ़ाई का मकसद सिर्फ रोजी-रोटी तक नहीं रहे, बल्कि जानकारी हासिल करना हो। यहां इस देश में इंटर पास करते ही जहां भविष्य की चिंता सताने लगती है, वहां ये भाषण भी बेकार हो जाती है। इसलिए थ्री इडियट्स के बाद वह फिल्म भी बननी चाहिए, जहां ये बताया जाए कि कैसे ये सिस्टम बने या बनाया जा सकता है। क्या आमिर इस पर अगली फिल्म बनाएंगे?

3 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बस यही है लाख टके का सवाल जो आपने आखिरी पैराग्राफ में उठाया है

Udan Tashtari said...

इसलिए थ्री इडियट्स के बाद वह फिल्म भी बननी चाहिए, जहां ये बताया जाए कि कैसे ये सिस्टम बने या बनाया जा सकता है। क्या आमिर इस पर अगली फिल्म बनाएंगे?

-सटीक प्रश्न!

S B Tamare said...

जनाब !
बाते तो आपने पत्ते की पुरे दिल से की है और फिल्म का मशविरा भी पुरजोर साफ़ -सुथरा है मगर जोर-जबरदस्ती पर उतारू मुहाफिजो की मगज में समाये तब तो बात बने गी ना / बांकी एक अच्छी भली पोस्ट के लिए शुक्रिया !

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