Monday, April 26, 2010

खतरनाक बनता जा रहा है फेसबुक का तिलिस्म

मैंने आते समय ट्रक के पीछे एक शेर देखा और फेसबुक पर डाला। चलती है गाड़ी, उड़ती है धूल, जलते हैं दुशमन, खिलते हैं फूल। कमेंट्स भी आ गये। फेसबुक का तिलिस्म खींचता है। हाल के दिनों में फेसबुक ऐसे द्वंद्व या दुष्प्रचार का केंद्र बन गया है, जहां से कुछ ऐसी बू आती है कि लगता है, गड़बड़ ही गड़बड़ है। आखिर फेसबुक पर बकवास बहस शुरू कर किस मर्यादा या मापदंड का पालन किया जाता है। कई लोग ऐसे हैं, जो मीडिया जगत में खासा रुतबा रखते हैं। वे ही लोग फेसबुक जैसे मंच का एक ऐसी बहस के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, जहां व्यक्तिगत भड़ास निकालना एक दस्तुर बन गया है।
हालिया जानकारी के अनुसार फेसबुक पर जिस निजता की आशा लिये आप गुफ्तगू कर रहे हैं, वे भी अब सार्वजनिक की जा रही हैं। जिन पर आप भरोसा कर अपनी पूरी सोच को सामने रख दे रहे हैं, वे आपका अपना बाजार बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। सावधान रहिये कि उगलते हुए कहीं आप कुछ ऐसा न बक दें कि आपका जीवन दुश्वार हो जाये। सोशल नेटवर्किंग साइट के बहाने थरूर और ललित जी का हाल देख चुके हैं।  आपका एक कमेंट आप पर भारी पड़ सकता है।
फेसबुक के इस तिलिस्म से सामाजिक सुधार की कवायद कम नजर आ रही है, बल्कि ये पूरा सामाजिक, यहां तक कि राजनीति को भी प्रभावित कर रहा है। कई जगहों पर दिखता है कि फेसबुक पर व्यक्ति निजी जिंदगी की हर दास्तान को तस्वीरों के सहारे बयां करने की कोशिश करता है। ये खतरनाक है। ये खतरनाक इसलिए है कि आपकी जिंदगी के कई राज अनायास ही दूसरे लोगों की जद में आ रहे हैं। शोध की दृष्टि से फेसबुक पर व्यक्तियों की उपलब्ध सूचनाएं एक हद तक बेहतर मालूम होते हैं, लेकिन ये कभी-कभी व्यक्ति के लिए नुकसानदेह भी हैं। अगर आप अपनी जिंदगी से संबंधित चीजों के बारे में कोई गलत जानकारी देते हैं, तो वे भी आपको कठघरे में खड़ा कर सकती है।
वैसे फेसबुक पर कई लोग शब्दों से खेलते दिखते हैं। अपने विचारों से किसी को भी प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। एक बात सोचनेवाली है कि अगर फेसबुक या ट्विटर जैसे साइट पर लोग तीन घंटे समय गुजारते हैं, तो तीस दिन के लिहाज से ९० घंटा का समय गुजार देते हैं। उस हिसाब से लोग सामाजिक सरोकारों के लिए भी समय नहीं निकाल पा रहे हैं।
दूसरी बात नक्सल जैसे मुद्दों पर बातचीत के दौरान जैसी सतही बातें वहां की जाती हैं, उससे एक बात तो साफ तौर पर पता चलता है कि कंप्यूटर की जानकारी रखनेवाला औसत शिक्षित व्यक्ति भी नक्सल जैसे मुद्दे पर कोई खास जानकारी नहीं रखता। संघर्ष, माओवाद और सर्वहारा का राग अलापता फेसबुक का उपयोगकर्ता अपनी खिचड़ी जानकारी के भरोसे दूसरों की जानकारियों का भी बखिया उधेड़ते चलता है। ये खतरनाक है। फेसबुक फायदे से ज्यादा नुकसान ही कर रहा है।
वैसे फेसबुक के बहाने पत्रकार बिरादरी खुद की पोल खोलने में लगी है। यहां सिर्फ एक फायदा दिखता है कि आप घर बैठे दूसरी जगहों पर कई नये दोस्त बना लेते हैं। जाहिर है कि आजादी के पंख लगाकर फेसबुक की दुनिया में उड़ने की अनोखी कोशिश होती है। ये कोशिश सामूहिक रूप से हमें किधर ले जाती है, ये देखना बाकी है।

7 comments:

Swapnil Bhartiya said...

Please refer to this one, it will help understand situation better.

http://www.katonda.com/blog/1084/facebook-playing-fire-sure-burn-fingers

Udan Tashtari said...

करीब से देख रहे हैं फेस बुक पर बनती बिगड़ती दुनिया. अच्छा चिन्तन किया आपने.

Ratan Singh Shekhawat said...

अच्छा चिन्तन

प्रवीण पाण्डेय said...

फेसबुक, ट्विटर व बज़ के बजबज से दूर ब्लॉगरों के सुरुचिपूर्ण लेखों पर समय बिताने में आनन्द आता है । पारस्परिक संवाद को अन्ततः अर्थयुक्त होना पड़ेगा ।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मैंने तो इन सोशल साइट्स का अधिक प्रयोग ही नहीं किया बस आरकुट पर कुट्कुटिया लेता हूं कभी कभी...

कविता रावत said...

Facebook ke baare mein saarthak jankari prasuti ke liye dhanyavaad.
Haardik shubhkamnayne

Suresh Chiplunkar said...

मैं भी भारतीय नागरिक जी की तरह का प्राणी हूं… हफ़्तों बीत जाते हैं फ़ेसबुक, ट्विटर, ऑरकुट के दर्शन किये… समय भी नहीं मिलता और ये भी समझ नहीं आता कि वहाँ जाकर कहें क्या? ऐसे 160-140 शब्दों में बाँधकर कोई ढंग की बात कही नहीं जा सकती…

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