Tuesday, June 7, 2011

बाबा रामदेव को गुस्सा क्यों आता है..

दिल्ली में पुलिसिया जुल्म के बाद बाबा रामदेव की रोनी सूरत देख कर दया आ गया. मन दया से भर गया. याद आता है नौ-दस साल पहले का दौर. बाबा जी योगाभ्यास कराते टीवी पर नजर आते थे. धीरे-धीरे लोकप्रियता का ग्राफ कुछ ऐसा चढ़ा कि अनुयायियों की संख्या बढ़ती चली गयी. बाबा जी के पास अकूत धन भी आ गया, पतंजलि योग की स्थापना हुई. और भी न जाने क्या, क्या.

अब  मूल बात कर लेते हैं. बाबा करप्शन से परेशान हैं. विदेशों में जमा काला धन वापस लेने का हल्ला मचा रहे हैं. बाबा ने अब पूरी तरह राजनीति का चोला भी पहन लिया है. बाबा के साथ वो तमाम लोग आगे-पीछे जुड़ते गए, जिन्हें इजी पब्लिसिटी मिल गयी या मिलती रही. ऐसे ही अन्ना हजारे के साथ तमाम सिविल सोसाइटी के लोग भी जुड़ते गए. सिविल सोसाइटी के लोग सरकार से लोकपाल मुद्दे पर बातें कर रहे हैं. हम ये कहते हैं कि ये जो भी कमेटी है या बाबा के साथ ये जो भी कुछेक हजार या लाख लोग जुड़े हैं, वो किस हद तक सिस्टम को सपोर्ट करते हैं. लालू जी का ये कहना कि बाबा आपको राजनीति करनी है, तो पूरी तरह समर्पित होकर कीजिए, गलत नहीं है. बाबा को सचमुच में अगर बदलाव चाहिए, तो बाबा स्कूल के लेवल पर नए प्रोजेक्ट शुरू कर योग क्रांति की शुरुआत कर सकते हैं.

 सबसे बड़ी बात ये है कि काला धन वापसी का विषय सबसे आसान है. हल्ला मचाओ, शोर करो और समर्थन जुटाओ. ऐसे में बॉलीवुड से लेकर विदेश में एयरकंडीशन में बैठे तमाम लोग भी उनके सपोर्ट में आ जाते हैं. बाबा ने करप्शन के मुद्दे को पीछे कर अब भाजपा, कांग्रेस का मुद्दा सामने खड़ा कर दिया है. जब कपिल सिब्बल मनमोहन को बाबा रामदेव से बड़ा संत बोलते हैं, तो मामला समझ लीजिए कि कहां तक चला गया है. बाबा कहते हैं कि पूरे देश में क्रांति आएगी,. लेकिन हमें तो टीवी के स्क्रीन के अलावा कहीं भी क्रांति के लक्षण नहीं दिखते. बाबा रामदेव अब चुप रहकर योग क्रांति करते रहें, यही कामना है. सरकार के पुलिसिया एक्शन को उचित भी नहीं कहा जाएगा, लेकिन बिना बात अराजकता अगर हावी होने लगे, तो आखिर में क्या रास्ता बचा रह सकता है. किसी भी देश या राज्य को यूं ही कहीं किसी के हवाले नहीं किया जा सकता है.,

बाबा ने लगातार से आक्रामक बयानबाजी कर केंद्र सरकार को एक मौका दे दिया. वैसे हमें बाबा अन्ना हजारे से प्रतियोगिता करते ज्यादा नजर आए. बाबा अगर सिर्फ बाबा बनकर रहें. किसी कुटिया में आजीवन रहने का संकल्प लेकर, मुफ्त में यानी बिना पैसा लिये योग सिखाने का वादा करते हुए करप्शन फ्री इंडिया का हुंकार भरें, तो मां कसम मैं उनके साथ चलनेवाला सबसे पहला आदमी होऊंगा.

वैसे अगर अभी वोटिंग हो, तो सहानुभूति वाला वोट पाकर बाबा आराम से एमपी बन सकते हैं. बाबा को पैसा भी चाहिए. एयरकंडीशन टेंट भी और चेलों की फौज भी. बाबा ने योग को बिजनेस को बना दिया. इसमें वो सक्सेसफुल भी रहे, लेकिन राजनीतिक रूप से बाबा फेल हो गए. उनके सत्याग्रह का यूपीए सरकार ने जो इनकाउंटर किया, उसने हर उस जुबां पर ताले लगा दिए, जो बाबा के साथ थे.

समय का तकाजा ये है कि सरकार के साथ संवाद का स्तर लगातार बनाया जाता रहे. अपनी मर्जी थोपनेवाली आदत कहीं भी सही नहीं है. वैसे भी कोई भी मामला कितना भी सही हो, कुछ चंद लोग ११५ करोड़ लोगों की सही आवाज को रिप्रजेंट नहीं कर सकते. अन्ना हजारे भी नहीं. सरकार ही जिम्मेदार बने. वही तय करे कि काला धन कैसे वापस आए. तमाम अंतरविरोधों से और किसी की नहीं, हमारे देश की ही छवि धूमिल होती है. अगर ऐसा नहीं होता तो यूपी के नोएडा में भी बाबा को सत्याग्रह का मौका मिल जाता. भाजपा शासित राज्य में ही सिर्फ अनुमति मिलना बाबा की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करता है.

3 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

आपने सही लिखा है । उम्मीद है कि बाबा के दिमाग से पी एम बनने का भूत अब उतर चुका होगा ।
वास्तव महत्कांक्षाएं और बुरे साथी कहीं का नहीं छोड़ते ।

uday said...

ati sarvatra varjayet yani ati se hamesh bachen yunhi nahi kaha gaya hai. kal ke vyapari yogi kal pm banane ke sapne dekhane lage the. toot gaye mungeri lal ke sapne. vaise bhrastachar ka mudda galat nahi. udhar congress apane chal, charitra me fir saf-saf dikhi. pahle lolypop nahi mane to lathi-danda.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

आपके मत से सहमति नहीं. बाबा को योग सिखाना जारी रखना चाहिये और पूरी ताकत से अपने कार्यकर्ताओं को राजनीति में उतारना चाहिये. राजनीति से दूर रहकर देश में बदलाव नहीं लाया जा सकता..

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