Saturday, July 9, 2011

एजूकेशन सिस्टम :सरकार और दोतरफा नीति

आज कल अपनी बेटी को पढ़ाते हुए एजूकेशन सिस्टम के बारे में सोचता हूं , तो मुझे लगता है कि हम अपने बच्चों को किस स्तर पर और कैसे तैयार करें. क्योंकि पढ़ाई का जो लेवल है, वो पहले से ज्यादा आसान है. ग्रेडिंग सिस्टम है. कैसे पढाया जाए, क्या पढ़ाया जाए, इस पर ज्यादा से ज्यादा जोर है. अच्छी बात है. लेकिन क्या आप नहीं सोचते हैं कि हमारी सरकार एक तरह से दोतरफा नीति अपना रही है.जब कोई व्यक्ति एजूकेशन को खत्म कर सीधे असली दुनिया में प्रवेश करता है, तो उसे चौतरफा दबाव का सामना करना पड़ता है. ऐसे में अगर स्कूल लेवल पर फेल होने का डर ही खत्म कर दिया जाए, तो एक स्टूडेंट उस आनेवाले माहौल के लिए तैयार नहीं हो पाएगा. वैसे भी प्राइवेट एजूकेशन के लेवल पर ही इस तरह की पद्धति को शायद पूरी तरह अपनाया जा रहा है. ग्रामीण या एक बड़े भाग के स्कूल्स में अभी भी पुरानी स्टाइल में पढाई हो रही है. कम से कम झारखंड जैसे स्टेट में हम जो देख रहे हैं, उसमें तो प्राइमरी एजूकेशन का बेड़ा गर्क कर दिया जा रहा है. जो पारा शिक्षक प्राइमरी लेवल पर मास्टर के रोल में हैं, वो भी अर्द्धबेरोजगारी के शिकार हैं. वैसे में वे क्या और कैसी शिक्षा देंगे, ये सोचनेवाली बात है.कहीं न कहीं सरकार गलत रह रही है. एक तो काम्पटीशन को वो एजूकेशन लेवल पर खत्म करने की कोशिश कर रही है लेकिन वहीं ग्लोबलाइजेशन का नाम लेकर काम्पटीशन को बढ़ावा भी दे रही है. मिलाजुला कर पूरी तरह से कन्फ्यूजन का मामला है. जरूरी है कि काम्पटीशन जारी रहे, लेकिन फेल होने को लेकर जो एक भय बना रहता है, उसे लगातार काउंसलिंग के जरिए खत्म किया जाए. हमारी सरकार जिम्मेदारी लेने से लगातार हट रही है. जब सोशल सिस्टम की बात की जाती है, तो लगातार हमारी नजर सरकार की ओर ही उठती है. लेकिन हालात ये हैं कि महंगाई से लेकर पढ़ाई तक से सरकार ने हाथ खींच लिये हैं. कम से कम झारखंड में जहां पुराने टीचर लगातार रिटायर करते जा रहे हैं और नई नियुक्तियां नहीं की जा रही हैं, वहां पर यूनिवर्सिटी का बुरा हाल देखा और जाना जा सकता है. हमारी सरकार भी क्या करे, हम लोग ही इतनी जड़बुद्धि के हो गये हैं कि पिछड़ेपन का अहसास तब होता है, जब खुद पर बीतने लगती है. अफसोस की बात ये है कि हमारे नीति निर्धारक इन तकलीफो को महसूस भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि एक बड़े तबके की संताने मेट्रो या विदेशों में पढ़ाई कर रही है.ऐसे में उन्हें दूसऱों के दुख दर्द के बारे में ज्यादा क्या पता होगा, ये सोचनेवाली बात है.यानी कि जो भी भुगतना है, वो आम जनता को ही भुगतना होगा.

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

वर्तमान यदि यह है भविष्य कहाँ पहुँचेगा?

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