- भाजपा का बतौर राष्ट्रीय पार्टी कमजोर होना
- कांग्रेस का पूरे देश में अप्रत्याशित जीत के साथ उभरना
- क्षेत्रवाद की आंधी का पूरे देश में बहाव
देश में क्षेत्रवाद की जो अंधी आंधी बह रही है। उसमें कैसे नेतृत्व की जरूरत है, ऐसा नेतृत्व जो पूरे देश को समूह के रूप में एक करके ले चल सके। यहां इस समूह में सारे वर्ग और लोग आते हैं।
(यहां ये उल्लेख जरूरी है कि भाजपा ने चुनाव के समय जो आतंकवाद का कार्ड खेला था, वह सफल नहीं हुआ। क्योंकि उसे उस बहुसंख्यक वर्ग का समर्थन नहीं मिला, जिसकी उसे अपेक्षा थी। भाजपा जाहिर तौर पर देश के खास वर्ग का विश्वास जीतने में सफल नहीं रही।
वरुण गांधी आये, थोड़े दिनों के लिए पूरे देश में मीडिया के बलबूते छाये रहे और फिर अप्रभावी साबित हुए। नरेंद्र मोदी भी खासे प्रभावित नहीं कर पाये)
हमें ये समझना होगा कि भारत में सिर्फ एक वर्ग के लोग नहीं रहते हैं। यहां पर जो आबादी का मिश्रण है, उसमें एक खासा संतुलन बनाये रखने की जरूरत है।
पूरे देश में जो क्षेत्रवाद की आंधी बह रही है। जहां रोज एक नया क्षेत्रीय दल उभरता है। जहां एक राज्य के व्यक्ति के साथ दूसरे राज्य में दोयम दर्जे का व्यवहार होता हो। साथ ही पूरे देश में जब अलगाववाद, आतंकवाद और नक्सल जैसी समस्याएं उभर कर सामने आ रही हों, तो उनसे मुकाबला करने के लिए सशक्त केंद्रीय नेतृत्व की जरूरत महसूस होती है। ये एक पार्टी को पूरा जनादेश मिले बिना संभव नहीं है। अब जब राजनीतिक परिस्थितियों पर नजरें गड़ाते हैं, तो भाजपा की परिस्थिति को देख थोड़ा संशय जरूर होता है।
अब राहुल, सोनिया से इतर आप यदि कांग्रेस को देखते हैं, तो कांग्रेस को भी भाजपावाली स्थिति में ही पायेंगे। क्योंकि अति महात्वाकांक्षी नेताओं की फौज वहां भी है। इससे ज्यादा जोगी मठ उजाड़वाली कहावत लागू हो जायेगी। आज राहुल गांधी के यथार्थ को स्वीकार करना हमारी-आपकी मजबूरी है। ये अब आप गाकर या रोकर स्वीकार करें, या मौन रहकर।
झारखंड में पूर्ण जनादेश नहीं मिलने के कारण पूरी सरकार निर्दलीयों पर निर्भर रही। आज झारखंड बेहाल है। विकास के मामले में झारखंड पिछड़ कर रह गया है। गंठबंधन की राजनीति का इससे गिरा स्वरूप और कुछ नहीं हो सकता। वामपंथी पार्टियों द्वारा पिछली सरकार में दिये गये चोट को कोई अभी भी भूला नहीं होगा। वैसे फिर बहुमत साबित करने के नाम पर जो नौटंकी हुई, उसने गत और भी गिरा दिया।
देश को पूर्ण जनादेश चाहिए। अब समय के क्रम में कोई तीसरी धारा सामने आये, तो बात अलग है। लेकिन राहुल के तौर पर जो विकल्प है, उसी के सहारे देश को आगे बढ़ना होगा। ये बात जाहिर है कि कांग्रेस की आनेवाली रणनीति राहुल गांधी के इर्द-गिर्द ही बनेगी या बिगड़ेगी। वैसे में पूरी राजनीति को उनसे अलग कर देखना मजाक करने की बात होगी। आज का यथार्थ यही है।
कम से कम कांग्रेस का मामला भाजपा से तुलनात्मक रूप से हर वर्ग में थोड़ा साफ-सुथरा लगता है। वंशवाद और गांधीज्म से इतर बात करें, तो मामला साफ और पेंच रहित है। दूसरा, ये तो जनादेश पर निर्भर करेगा कि वह किसे चुनता है।
मैं यहां एक बात कहना चाहूंगा कि ब्लागर बंधु ये न पूछें कि राहुल गांधी में क्या गुण हैं? हम यहां व्यक्तिगत टीका टिप्पणी करने नहीं आये, बल्कि मामले को सही परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशिश की है। यहां राजनीतिक परिस्थिति की विवेचना कर रहे हैं। उसके अलावा और कुछ नहीं।