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Tuesday, September 4, 2012

आम आदमी, बंद और राजनीतिक तमाशा

हमारे देश में जिस आम आदमी के लिए हमारे राजनीतिक दल संघर्ष का ऐलान करते हैं या आंदोलन करते हैं, वो आम आदमी आज कहां है, किस हालत में है, ये सोचने की फिक्र किसी को नहीं है. कल रांची में झाविमो का सचिवालय घेराव आंदोलन था. पुलिस ने भी आंदोलन को कूचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी और आंदोलनकारियों ने भी जमकर बवाल किया. जानकारी के लिए अखबार में छपी तस्वीरों को आप देख सकते हैं. इस पूरे प्रदर्शन में एक आम आदमी यूं ही मारा गया. हो सकता है कि वह एक कार्यकर्ता भी रहा हो. लेकिन आंदोलन के इस तेवर को अपनाने से पहले हमारे लीडर आम आदमी के बारे में कुछ नहीं सोचते. ये जो आम आदमी है, वह भी तनाव में जाने-अनजाने एक भीड़ का हिस्सा बन जाता है. फिर हालात बिगड़ने पर खुद शिकार भी. इधर रांची में ही कुछ न कुछ सवालों को लेकर आए दिन बंद का आह्वान हो रहा है. सुरक्षा, नगड़ी से लेकर महंगाई तक का मुद्दा हो, दल या ग्रुप तत्काल बंद का आह्वान कर रहे हैं. बीच में रुक गया सिलसिला फिर से चल पड़ा है. बंद के दिन स्कूल, कॉलेज तो पहले से ही अब अपने गेट पर ताला लगाकर बैठ जाते हैं और पब्लिक छुट्टी मूड में आ जाती है. लेकिन इससे  कितना नुकसान पहुंच रहा है, ये किसी को समझ में नहीं आ रहा. शुरू में जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन के जरिए सामूहिक संघर्ष की जो ताकत दिखाई, वह बंद के रूप में आज एक परंपरा या कहें नासूर बन चुका है. इस बंद वाले दिन मरीज को गाड़ी नहीं मिलती और एग्जामिनी को सेंटर पर जाने के लिए सवारी. शायद लोग भी अभ्यस्त हो गए हैं. हमारी मीडिया भी इन सब सवालों से अलग रहती है. उसे राज ठाकरे की बयानबाजी नजर आती है, लेकिन इस गंभीर मसले का जिक्र करना उचित नहीं लगता. सवाल यही है कि ये आम आदमी जाए, तो जाए कहां. न तो उन्हें स्टेट के सीएम राहत देने की बात करते हैं और न कंट्री के पीएम. रांची जैसे छोटे शहर में भी हालत ये है कि एक सप्ताह में अगर आपने सातों दिन कोई न कोई काम तय किया है, तो समझ लें कि चार दिन आपका काम नहीं होगा. क्योंकि किसी न किसी कारणवश शहर में ऐसा कुछ जरूर हो जाता है कि पब्लिक को घर में रहना ही ज्यादा बेहतर नजर आता है. इस छोटी सी राजधानी का जब ये हाल है, तो बड़े शहरों के आम आदमी की बात ही कुछ और होगी. वैसे एक आम आदमी किसी आंदोलन में बिना कसूर के बेमौत मरे, इससे शर्मनाक बात शायद ही कुछ और हो.

Thursday, July 30, 2009

जो आज का यथार्थ है, उसे स्वीकार क्यों नहीं करते?

चलिये खुलकर बातें करते हैं। पूरे देश की राजनीति में तीन चीजें महत्वपूर्ण हैं।

  1. भाजपा का बतौर राष्ट्रीय पार्टी कमजोर होना
  2. कांग्रेस का पूरे देश में अप्रत्याशित जीत के साथ उभरना
  3. क्षेत्रवाद की आंधी का पूरे देश में बहाव

देश में क्षेत्रवाद की जो अंधी आंधी बह रही है। उसमें कैसे नेतृत्व की जरूरत है, ऐसा नेतृत्व जो पूरे देश को समूह के रूप में एक करके ले चल सके। यहां इस समूह में सारे वर्ग और लोग आते हैं।

(यहां ये उल्लेख जरूरी है कि भाजपा ने चुनाव के समय जो आतंकवाद का कार्ड खेला था, वह सफल नहीं हुआ। क्योंकि उसे उस बहुसंख्यक वर्ग का समर्थन नहीं मिला, जिसकी उसे अपेक्षा थी। भाजपा जाहिर तौर पर देश के खास वर्ग का विश्वास जीतने में सफल नहीं रही।
वरुण गांधी आये, थोड़े दिनों के लिए पूरे देश में मीडिया के बलबूते छाये रहे और फिर अप्रभावी साबित हुए। नरेंद्र मोदी भी खासे प्रभावित नहीं कर पाये)

हमें ये समझना होगा कि भारत में सिर्फ एक वर्ग के लोग नहीं रहते हैं। यहां पर जो आबादी का मिश्रण है, उसमें एक खासा संतुलन बनाये रखने की जरूरत है।
पूरे देश में जो क्षेत्रवाद की आंधी बह रही है। जहां रोज एक नया क्षेत्रीय दल उभरता है। जहां एक राज्य के व्यक्ति के साथ दूसरे राज्य में दोयम दर्जे का व्यवहार होता हो। साथ ही पूरे देश में जब अलगाववाद, आतंकवाद और नक्सल जैसी समस्याएं उभर कर सामने आ रही हों, तो उनसे मुकाबला करने के लिए सशक्त केंद्रीय नेतृत्व की जरूरत महसूस होती है। ये एक पार्टी को पूरा जनादेश मिले बिना संभव नहीं है। अब जब राजनीतिक परिस्थितियों पर नजरें गड़ाते हैं, तो भाजपा की परिस्थिति को देख थोड़ा संशय जरूर होता है।

अब राहुल, सोनिया से इतर आप यदि कांग्रेस को देखते हैं, तो कांग्रेस को भी भाजपावाली स्थिति में ही पायेंगे। क्योंकि अति महात्वाकांक्षी नेताओं की फौज वहां भी है। इससे ज्यादा जोगी मठ उजाड़वाली कहावत लागू हो जायेगी। आज राहुल गांधी के यथार्थ को स्वीकार करना हमारी-आपकी मजबूरी है। ये अब आप गाकर या रोकर स्वीकार करें, या मौन रहकर।

झारखंड में पूर्ण जनादेश नहीं मिलने के कारण पूरी सरकार निर्दलीयों पर निर्भर रही। आज झारखंड बेहाल है। विकास के मामले में झारखंड पिछड़ कर रह गया है। गंठबंधन की राजनीति का इससे गिरा स्वरूप और कुछ नहीं हो सकता। वामपंथी पार्टियों द्वारा पिछली सरकार में दिये गये चोट को कोई अभी भी भूला नहीं होगा। वैसे फिर बहुमत साबित करने के नाम पर जो नौटंकी हुई, उसने गत और भी गिरा दिया

देश को पूर्ण जनादेश चाहिए। अब समय के क्रम में कोई तीसरी धारा सामने आये, तो बात अलग है। लेकिन राहुल के तौर पर जो विकल्प है, उसी के सहारे देश को आगे बढ़ना होगा। ये बात जाहिर है कि कांग्रेस की आनेवाली रणनीति राहुल गांधी के इर्द-गिर्द ही बनेगी या बिगड़ेगी। वैसे में पूरी राजनीति को उनसे अलग कर देखना मजाक करने की बात होगी। आज का यथार्थ यही है।

कम से कम कांग्रेस का मामला भाजपा से तुलनात्मक रूप से हर वर्ग में थोड़ा साफ-सुथरा लगता है। वंशवाद और गांधीज्म से इतर बात करें, तो मामला साफ और पेंच रहित है। दूसरा, ये तो जनादेश पर निर्भर करेगा कि वह किसे चुनता है।

मैं यहां एक बात कहना चाहूंगा कि ब्लागर बंधु ये न पूछें कि राहुल गांधी में क्या गुण हैं? हम यहां व्यक्तिगत टीका टिप्पणी करने नहीं आये, बल्कि मामले को सही परिप्रेक्ष्य में रखने की कोशिश की है। यहां राजनीतिक परिस्थिति की विवेचना कर रहे हैं। उसके अलावा और कुछ नहीं।

Thursday, July 16, 2009

रिश्तों की गली में पॉलिटिक्स का भूलभुलैया

हम लोग बचपन में कटिस-कटिस करते खेलते थे। यानी कि किसी से पलभर के लिए दोस्ती तोड़नी हो, तो उंगली लड़ाकर कटिस लगा लेते थे। हमारी आपस में बातचीत बंद हो जाती थी। फिर दूसरे दिन शायद रातभर में भूलकर फ्रेश मूड में दोस्ती कर लेते थे। खेलना-कूदना शुरू हो जाता था। बचपना को यादकर हम सब खुश हो जाते हैं। निजी जिंदगी में रिश्तों का बनन और बिगड़ना दोनों होता रहता है। वैसे राजनीतिक दांव-पेंच के बीच जब पॉलिटिशियन दोस्ती और दुश्मनी करते है, तो उसी कटिसवाले खेल की याद आती है।

कहते हैं राजनीति में कोई दोस्त और दुश्मन नहीं होता। इसी कारण कल तक दोस्ती निभानेवाले आज दुश्मन नजर आते हैं। लेफ्ट की कल तक कांग्रेस से पटती थी, आज नहीं पटती। लालू जी से अपने रूठ चले हैं। नीतीश जी से विकास के दावे और तस्वीर के बलबूते एक शक्तिशाली शख्सियत बनते जा रहे हैं। राजनीति की पूरी पटकथा में रिश्तों की बानगी को देखने के बाद लगता है कि आम जनता को हर पार्टी या तो बेवकूफ समझती है या कुछ और। जिस लालू प्रसाद को रेलवे की उपलब्धि को लेकर बधाइयों का तांता लगा रहा, उन्हें मैनेजमेंट गुरु तक की उपाधि दी जाती रही, उन्हीं पर अब ममता जी के कार्यकाल में कई बार उंगली उठायी जाती है।

कहते हैं कि राजनीति की चाल को समझने के लिए महीन बुद्धि चाहिए। अब उस महीन बुद्धि के लिए ज्यादा जोर लगाने की जरूरत नहीं है। कटिस-कटिस के खेल को याद कीजिए। जब जरूरत पड़ी, तो कर ली दोस्ती और जब जरूरत नहीं पड़ी, तो हो गए नाराज। ईश्वर तेरी महिमा अपरंपार है।....

Saturday, January 10, 2009

राहुल गांधी का विरोध क्यों?


राहुल गांधी हम लोगों की उम्र के हैं। हम भी पद और प्रतिष्ठा पाने की इच्छा रखते होंगे। इसके साथ ही वे लोग भी जो कि इस पोस्ट को पढ़ रहे होंगे। लेकिन राहुल का सबसे बड़ा दुरभाग्य या सौभाग्य उनका गांधी परिवार से जुड़ा होना रहा है। यह सही है कि राहुल गांधी को पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण एक ऐसा प्लेटफामॆ मिला है, जो सबको नहीं मिलता। लेकिन उनके साथ एक ऐसा युवा राजनीतिक वगॆ भी जुड़ता चला गया है, जो कि देश की राजनीति में गहरी पैठ रखता है। बात अगर शिक्षा की करें, तो वे एक शिक्षित युवा हैं और उन्होंने देश को जानने का प्रयास किया है। शिक्षा सिफॆ किताबों से नहीं मिलती, बल्कि जिंदगी में व्यावहारिक जानकारी की भी उतनी ही जरूरत होती है, जो उनमें है। वे एक जानकार और देश की राजनीतिक परिस्थितियों को समझनेवाले युवा हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता वैसे किसी ऐसे कच्चे खिलाड़ी का नाम लेकर नहीं बोलेंगे, जिनसे उनका वजन कम हो। युवा कांग्रेस और एनएसयूआइ को बेहतर नेतृत्व प्रदान कर राहुल गांधी ने दिखा दिया है कि उनमें एक काबिलियत है। वे एक मुखर वक्ता हैं। जहां तक रह-रह कर हो रहे विरोधों की बात है, तो मैं ये बार-बार कहूंगा कि ये विरोध पूवाॆग्रह से ग्रसित होकर किये जा रहे हैं। नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने इस देश को क्या नहीं दिया। आज के बड़े उद्योग नेहरू की देन है। इंदिरा ने एक मजबूत नेता के रूप में पूरे विश्व में भारत को सम्मान दिलाया और राजीव ने उदारीकरण के पूवॆ टेलीकम्युनिकेशन और मोटर उद्योग की नींव डालकर क्रांति की शुरुआत की। इस देश में एक कमजोरी है कि ये अपनी मजबूती को नहीं पहचान पाता है। अमेरिका में ओबामा रंग, जाति से अलग पसंद किये जाते हैं। उन्हें राष्ट्रपति बनाया जाता है। लेकिन यहां सिफॆ पारिवारिक पृष्ठभूमि का बहाना बनाकर विरोध का मंच तैयार किया जात है। राहुल का विरोध क्यों हो? सिफॆ इसलिए कि वे गांधी परिवार से जुड़े हैं। राहुल के व्यवहार में एक खास तरह की विनम्रता का आभास हमेशा होता है। उन्होंने कभी भी ऐसे उदाहरण पेश नहीं किये, जहां से अभिमान की झलक मिलती हो। एक खास तरह की सादगी का एहसास होता है। प्रधानमंत्री बनने के लिए और क्या चाहिए? हमें एक ऐसा नेता चाहिए, जो साफ छविवाला हो और हमारे मन में बसा हो। आप मानिये या न मानिये, आपके मन में भी राहुल गांधी की स्वच्छ छवि जरूर होगी। वैसे भी राहुल ने पिछले साल अपनी सशक्त राजनीतिक भागीदारी से बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गजों के चेहरे पर शिकन के भाव जरूर ला दिये हैं। राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस एक मजबूत दल के रूप में उभरेगी, जो इस देश को अगले ३० सालों तक सबल नेतृत्व प्रदान कर सकती है। वैसे भी कांग्रेस को हाल ही जीत मिली है, तो इसके पीछे उसकी बेहतर नीतियां ही हैं। भाजपा का प्रभाव लोगों के जेहन से धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। इसे मानना होगा। इस देश को विकास चाहिए और वह सिफॆ स्थिरता से ही मिल सकता है। ये और कोई नहीं, बल्कि राहुल गांधी के नेतृत्व में ही आनेवाले दिनों में मिल सकता है।

Thursday, December 4, 2008

क्षेत्रीय राजनीति ने पकड़ा जोर (भारतीय राजनीति और हमारे दल-४)

साफ तौर पर भारतीय राजनीति ने दो सबसे बड़े दलों के कमजोर होने का खामियाजा भुगता है। इन दो दलों कांग्रेस और भाजपा के कमजोर होने के कारण क्षेत्रीय दल मजबूत हुए। देश में क्षेत्रीय राजनीति ने जोर पकड़ा। हालात ये हैं कि किसी भी राज्य में किसी एक दल को बहुमत काफी मुश्किल से ही नसीब हो रहा है। झारखंड जैसे राज्य में सरकार निदॆलीयों पर निभॆर हैं। झारखंड में पहले निदॆलीय मुख्यमंत्री मधु कोड़ा बने। गंठबंधन की राजनीति ने फायदे से ज्यादा इस देश को नुकसान ही पहुंचाया है। देश में क्षेत्रीय राजनीति के बढ़ने का ही प्रभाव है कि राज ठाकरे मराठा बनाम बिहारी की राजनीति करते हैं और असम में भी बिहारियों पर हमले होते हैं। इधर गंठबंधन की राजनीति करते हुए सरकार को अपना वजूद बचाने के लिए वह सब करना पड़ा, जो कि उचित नहीं है। संसद ने ऐसे-ऐसे उदाहरण देखे कि इस पर जितनी कम चरचा की जाये, कम होगी। बढ़ती महंगाई हो या देश की सुरक्षा का मसला, हर निणॆय के लिए सरकारें सहायक दलों की सहमति के भरोसे रहती है। जरूरी है कि देश को कांग्रेस और भाजपा में ही ऐसा कुशल नेतृत्व मिले, जो इसे सशक्त राजनीति की ओर मोड़े। जिससे एक सशक्त नेतृत्व में देश आगे बढ़ सके।

Wednesday, December 3, 2008

लग्गी लगा फुनगी पर बैठने की तैयारी (हिंसा-राजनीति, हमारे दल-भाग ३)

देश में आजादी के बाद अगर किसी दल ने कांग्रेस के वचॆस्व को चुनौती दी है, तो वह भाजपा ही है। लेकिन दोनों ने भारतीर राजनीति में धुंध को पसरने देने में मदद की। हालात ये हैं कि मुंबई में आतंकी हमले के बाद सबकी जुबान बंद थे। जब खुले, तो इनके तथाकथित बड़े नेता मुद्दे को छोड़ कर अनाप-शनाप बयानबाजी करने लगे। कोई इसे छोटा-मोटा हादसा कहता है, तो कोई नेताओं के विरोध को बकवास करार देता है।

ज्यादातर समय भाजपा को कांग्रेस पर निशाना साधने के नाम पर सोनिया गांधी ही दिखती रहीं। उनकी नागरिकता पर सवाल उठता रहा, जबकि उन्होंने जीवन का अहम हिस्सा यहां गुजार लिया है। हम एक भारतीय या अश्वेत के अमेरिका में राष्ट्रपति बनने की अपेक्षा करते हैं, लेकिन जब अपने देश में ऐसा कुछ होने का मौका आता है, तो भारतीयता को मुद्दा बनाकर बवाल कर उसे शमॆसार कर देते हैं। इधर कांग्रेस भाजपा को हिंदुवादी दल करार देते हुए एक विशेष वगॆ की पैरोकार बनी रही।

अभी इनके सहयोगी दल बने समाजवादी पाटीॆ के अमर सिहं बाटला हाउस के बाद जांच पूरी होने से पहले ही बयानबाजी कर पुलिसिया कारॆवाई को ही कठघरे में खड़ा करने लगे। कांग्रेस की दोहरी नीति जगजाहिर है। इसकी नीतियों पर यदि रिसचॆ किया जाये, तो दोहरापन अपनाने के मापदंड पर एक किताब लिखी जा सकती है। झारखंड राज्य में जब कोड़ा की सरकार थी, तो अजय माकन कांग्रेस के राज्य प्रभारी हुआ करते थे। कमाल की बात ये थी कि अजय माकन का दल कांग्रेस कोड़ा सरकार को समथॆन दे रहा था। और वही माकन सरकार की नीतियों और शासन की घोर आलोचना करते रहे। सवाल वही था कि जब उनके दल द्वारा समथिॆत सरकार खराब काम कर रही है, तो समथॆन वापस क्यों नहीं लिया गया। सामने कुछ और, फिर बाहर कुछ और की तजॆ पर जनता के साथ-साथ मीडिया को भी धोखे में रखा गया।

ऐसा लग रहा था कि आतंकी हमले से पहले देश के नेताओं के सामने कोई मुद्दा नहीं बच गया था। इन आतंकियों ने कम से कम आतंकवाद जैसे मुद्दे पर पूरे देश को एक कर दिया है। क्योंकि इसने मुंबई से लेकर कन्याकुमारी तक हर व्यक्ति को प्रभावित किया है।

राज ठाकरे को मराठी-बिहारी विवाद से फुरसत नहीं थी और यहां बम विस्फोट के बाद लालू प्रसाद के साथ शिवराज पाटिल सिफॆ सूट पहने या नहीं, इसी के विवाद में फंसे रह गये। जब विचार और तनाव चरम पर होती है, तो ये नेता ऐसे जुमलों का इस्तेमाल करेंगे कि पूरा मामला गड्ढे में चला जायेगा। हाल में केरल के सीएम द्वारा दी गयी टिप्पणी और नकवी साहब का बयान ऐसा ही उदाहरण है। धन्य है यह मीडिया भी, जिसे आंतक जैसे महत्वपूणॆ मुद्दे को छोड़ कर इन्हीं बयानों को लेकर टीआरपी बढ़ाने की फिक्र लगी हुई है। भारतीय राजनीति को आज देश की सुरक्षा की चिंता लगी हुई, लेकिन ये वही नेता हैं, जो कल तक सेना तक को भी निशाने पर रखने लगे थे।

बुलंद रहिये, देश बंटनेवाला नहीं है ( छह दिसंबर, हिंसा, भारतीय राजनीति (भाग-२))


मैंने पिछली पोस्ट छह दिसंबर, बाबरी मसजिद, हिंसा, भारतीय राजनीति (भाग-१) में भारतीय राजनीति में व्याप्त विरोधाभास का जिक्र किया था। एक दोस्त ने इसी सिलसिले में भविष्य में भारत के एक और विभाजन होने की बात टिप्पणी में कही। जहां तक इस देश के धमॆ के नाम पर बंटने का सवाल है, तो उसके लिए हमारे यहां आजादी के बाद से अब तक वो माइंड सेट नहीं बना है और न ही बनेगा। क्योंकि विभाजन के कहर को झेलने और उसके बाद उत्पन्न हुए हालातों ने इस देश को समस्याओं के गतॆ में धकेल दिया है। अब तक हम उनसे बाहर निकलने के लिए छटपटा रहे हैं। आज पाकिस्तान हमारे लिये नासूर बन चुका है। प्रणव मुखरजी को सारी रिश्तेदारी छोड़ पाकिस्तान को आतंकियों को सौंपने की बात स्पष्ट और जोर देकर कहनी पड़ रही है। ये वही पाकिस्तान है, जो इस भारत से अलग होकर बना। आज जो युवक यहां गोलियां बरसाते हुए आये थे, उनके दादा, परदादा दिल्ली और मुंबई की उन्हीं गलियों में बड़े हुए होंगे। परवेज मुशरॆफ भले ही तानाशाह रहे हों पाकिस्तान के, लेकिन उनका पुश्तैनी मकान भारत में है। उनकी भावनाएं भारत से जुड़ी हैं। सियासत करते हुए भारत के खिलाफ भले ही कड़वे बोल बोलते हों, लेकिन उनकी आत्मा भी इस मामले में गवाही देने से इनकार करती होगी। एक और विभाजन की बात इतनी आसानी से हम इसलिए करते हैं, क्योंकि विभाजन के बाद होनेवाले ददॆ को हमने नहीं झेला है। किसी धमॆ का पक्ष लेकर बोलना कभी-कभी ठीक होगा। लेकिन हर बार हिंदू होने का प्रश्न उछाल कर मुसलमानों की देशभक्ति पर उंगली उठाना भी कहां की समझदारी है। (ऐसा ज्यादातर हमारे अधिकांश ब्लागर बंधु करते हैं)। ये सवाल दागना सीधे-सीधे देश के ३० करोड़ मुसलमानों को कठघरे में खड़ा करने जैसा है। दो महीने पहले कश्मीर में धमॆ के नाम पर राजनीति ने उस राज्य को दो भागों में बांट दिया था। कोई भी धमॆ हिंसा अपनाने की बात नहीं करता। दुख इस बात का है कि पेट भर जाने के बाद हम भगवान को अपने हिसाब से विभिन्न हिस्सों में बांट देते हैं। याद रखिये, सबका खून एक ही रंग का है और सारे लोगों के लिए एक ही भगवान होता है। इस धमॆ के नाम पर छाये जुनून ने देश में कई दंगे कराये। हद तो तब हो गयी, जब देश की मीडिया से लेकर राजनेता तक आतंकवाद को भी धमॆ में बांट कर देखते हैं। अफजल चाकू मारता है, तो मुसलिम आतंकवादी हो जाता है और श्याम मारता है, तो हिंदू आतंकवादी। ये कौन सा तरीका है। जो लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, उनसे सीधा पूछता हूं कि वे देश जोड़ने की बात क्यों नहीं करते हैं। सबसे बड़ी जरूरत भावना से ऊपर उठकर हेल्दी माइंड सेट तैयार करने की है।

Sunday, October 19, 2008

मुंबई की घटना के लिए सभी हैं दोषी

२००८ का अक्तूबर महीना अब पूरा होने को है। साल का दसवां महीना यानी साल भी खत्म होने को है, लेकिन २००८ भारतीय इतिहास में देश की राजनीति की पतनशीलता के लिए लगातार याद किया जाता रहेगा। लालू प्रसाद बिहार-यूपी के रेलवे परीक्षारथियों के पीटे जाने पर राज ठाकरे के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे थे। इधर राज ठाकरे इस मामले में खुल्लमखुला चैलेंज करने की मुद्रा में नजर आये। पता नहीं, यहां के नेताओं ने इस देश को क्या समझ लिया है, जिसे जब जैसा मन होता है, कर गुजरता है। न किसी की परवाह है और न किसी की फिक्र। सोचता हूं, क्या हम सही मायने में भारतीय कहलाने के हकदार हैं? ममता बनजीॆ के आंदोलन के समय से मन ऐसा खिन्न हुआ कि भारतीय राजनीति को समझने की कोशिश ही छोड़ दी। न कोई विचारधारा है और न कोई मापदंड। जब आप को लाठी-डंडे से ही बात करनी है, तो फिर साफ-सुथरी राजनीति की बात करना ही बेमानी है। भारतीय राजनीति जिस तरह की करवटें ले रही हैं, वे अच्छे संकेत नहीं दे रहे हैं। भाषाई आधार पर देश को बांटने की साजिश के जिम्मेदार सभी हैं। जब एक नामचीन फिल्मी हस्ती खुद के यूपी के होने की दुहाई देती हैं, या राज ठाकरे मराठी होने का दंभ भरते हैं। या फिर लालू प्रसाद छठ मनाने की हठ करते हैं। परत दर परत जो खोखलापन भारतीयता की भावना में घर कर रहा है, उससे मेरे जैसे सामान्य सोचवाले व्यक्ति आहत हैं। मैं खुद को भी शरमिंदा ही महसूस करता हूं। जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक देखता हूं, तो देखता हूं कि हम एक ही संस्कृति के वाहक हैं, सिफॆ स्थान परिवतॆन के कारण हमारी भाषा और रहन-सहन में फकॆ है। इसने इन साठ सालों में भारतीयता की भावना को कभी ठेस नहीं पहुंचने दिया। लेकिन चंद भारतीय नेता शायद गद्दी पाने के लिए इस देश को खंडित करने की राजनीति करने के लिए कमर कस चुके हैं। कोई भी सही सोचवाला भारतीय मुंबई में हुई घटना का विरोध और निंदा करेगा। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि राजनीति की आड़ में ये कौन सा खेल खेला जा रहा है। अगर ऐसा है, तो ये खतरनाक है और तत्काल बंद हो। भाषा, धमॆ और रंग के आधार पर राजनीति को कभी पसंद नहीं किया गया। दूसरे विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया की सोच बदल गयी। लेकिन यहां आजादी के ६० साल बाद शायद गंदी राजनीति का राक्षस फिर से सर उठाने लगा है। वक्त आ गया है कि इसे हम या आप पनपने नहीं दें। नहीं तो ये हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा। सावधान होने का वक्त आ गया है।
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