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Wednesday, December 3, 2008

लग्गी लगा फुनगी पर बैठने की तैयारी (हिंसा-राजनीति, हमारे दल-भाग ३)

देश में आजादी के बाद अगर किसी दल ने कांग्रेस के वचॆस्व को चुनौती दी है, तो वह भाजपा ही है। लेकिन दोनों ने भारतीर राजनीति में धुंध को पसरने देने में मदद की। हालात ये हैं कि मुंबई में आतंकी हमले के बाद सबकी जुबान बंद थे। जब खुले, तो इनके तथाकथित बड़े नेता मुद्दे को छोड़ कर अनाप-शनाप बयानबाजी करने लगे। कोई इसे छोटा-मोटा हादसा कहता है, तो कोई नेताओं के विरोध को बकवास करार देता है।

ज्यादातर समय भाजपा को कांग्रेस पर निशाना साधने के नाम पर सोनिया गांधी ही दिखती रहीं। उनकी नागरिकता पर सवाल उठता रहा, जबकि उन्होंने जीवन का अहम हिस्सा यहां गुजार लिया है। हम एक भारतीय या अश्वेत के अमेरिका में राष्ट्रपति बनने की अपेक्षा करते हैं, लेकिन जब अपने देश में ऐसा कुछ होने का मौका आता है, तो भारतीयता को मुद्दा बनाकर बवाल कर उसे शमॆसार कर देते हैं। इधर कांग्रेस भाजपा को हिंदुवादी दल करार देते हुए एक विशेष वगॆ की पैरोकार बनी रही।

अभी इनके सहयोगी दल बने समाजवादी पाटीॆ के अमर सिहं बाटला हाउस के बाद जांच पूरी होने से पहले ही बयानबाजी कर पुलिसिया कारॆवाई को ही कठघरे में खड़ा करने लगे। कांग्रेस की दोहरी नीति जगजाहिर है। इसकी नीतियों पर यदि रिसचॆ किया जाये, तो दोहरापन अपनाने के मापदंड पर एक किताब लिखी जा सकती है। झारखंड राज्य में जब कोड़ा की सरकार थी, तो अजय माकन कांग्रेस के राज्य प्रभारी हुआ करते थे। कमाल की बात ये थी कि अजय माकन का दल कांग्रेस कोड़ा सरकार को समथॆन दे रहा था। और वही माकन सरकार की नीतियों और शासन की घोर आलोचना करते रहे। सवाल वही था कि जब उनके दल द्वारा समथिॆत सरकार खराब काम कर रही है, तो समथॆन वापस क्यों नहीं लिया गया। सामने कुछ और, फिर बाहर कुछ और की तजॆ पर जनता के साथ-साथ मीडिया को भी धोखे में रखा गया।

ऐसा लग रहा था कि आतंकी हमले से पहले देश के नेताओं के सामने कोई मुद्दा नहीं बच गया था। इन आतंकियों ने कम से कम आतंकवाद जैसे मुद्दे पर पूरे देश को एक कर दिया है। क्योंकि इसने मुंबई से लेकर कन्याकुमारी तक हर व्यक्ति को प्रभावित किया है।

राज ठाकरे को मराठी-बिहारी विवाद से फुरसत नहीं थी और यहां बम विस्फोट के बाद लालू प्रसाद के साथ शिवराज पाटिल सिफॆ सूट पहने या नहीं, इसी के विवाद में फंसे रह गये। जब विचार और तनाव चरम पर होती है, तो ये नेता ऐसे जुमलों का इस्तेमाल करेंगे कि पूरा मामला गड्ढे में चला जायेगा। हाल में केरल के सीएम द्वारा दी गयी टिप्पणी और नकवी साहब का बयान ऐसा ही उदाहरण है। धन्य है यह मीडिया भी, जिसे आंतक जैसे महत्वपूणॆ मुद्दे को छोड़ कर इन्हीं बयानों को लेकर टीआरपी बढ़ाने की फिक्र लगी हुई है। भारतीय राजनीति को आज देश की सुरक्षा की चिंता लगी हुई, लेकिन ये वही नेता हैं, जो कल तक सेना तक को भी निशाने पर रखने लगे थे।

बुलंद रहिये, देश बंटनेवाला नहीं है ( छह दिसंबर, हिंसा, भारतीय राजनीति (भाग-२))


मैंने पिछली पोस्ट छह दिसंबर, बाबरी मसजिद, हिंसा, भारतीय राजनीति (भाग-१) में भारतीय राजनीति में व्याप्त विरोधाभास का जिक्र किया था। एक दोस्त ने इसी सिलसिले में भविष्य में भारत के एक और विभाजन होने की बात टिप्पणी में कही। जहां तक इस देश के धमॆ के नाम पर बंटने का सवाल है, तो उसके लिए हमारे यहां आजादी के बाद से अब तक वो माइंड सेट नहीं बना है और न ही बनेगा। क्योंकि विभाजन के कहर को झेलने और उसके बाद उत्पन्न हुए हालातों ने इस देश को समस्याओं के गतॆ में धकेल दिया है। अब तक हम उनसे बाहर निकलने के लिए छटपटा रहे हैं। आज पाकिस्तान हमारे लिये नासूर बन चुका है। प्रणव मुखरजी को सारी रिश्तेदारी छोड़ पाकिस्तान को आतंकियों को सौंपने की बात स्पष्ट और जोर देकर कहनी पड़ रही है। ये वही पाकिस्तान है, जो इस भारत से अलग होकर बना। आज जो युवक यहां गोलियां बरसाते हुए आये थे, उनके दादा, परदादा दिल्ली और मुंबई की उन्हीं गलियों में बड़े हुए होंगे। परवेज मुशरॆफ भले ही तानाशाह रहे हों पाकिस्तान के, लेकिन उनका पुश्तैनी मकान भारत में है। उनकी भावनाएं भारत से जुड़ी हैं। सियासत करते हुए भारत के खिलाफ भले ही कड़वे बोल बोलते हों, लेकिन उनकी आत्मा भी इस मामले में गवाही देने से इनकार करती होगी। एक और विभाजन की बात इतनी आसानी से हम इसलिए करते हैं, क्योंकि विभाजन के बाद होनेवाले ददॆ को हमने नहीं झेला है। किसी धमॆ का पक्ष लेकर बोलना कभी-कभी ठीक होगा। लेकिन हर बार हिंदू होने का प्रश्न उछाल कर मुसलमानों की देशभक्ति पर उंगली उठाना भी कहां की समझदारी है। (ऐसा ज्यादातर हमारे अधिकांश ब्लागर बंधु करते हैं)। ये सवाल दागना सीधे-सीधे देश के ३० करोड़ मुसलमानों को कठघरे में खड़ा करने जैसा है। दो महीने पहले कश्मीर में धमॆ के नाम पर राजनीति ने उस राज्य को दो भागों में बांट दिया था। कोई भी धमॆ हिंसा अपनाने की बात नहीं करता। दुख इस बात का है कि पेट भर जाने के बाद हम भगवान को अपने हिसाब से विभिन्न हिस्सों में बांट देते हैं। याद रखिये, सबका खून एक ही रंग का है और सारे लोगों के लिए एक ही भगवान होता है। इस धमॆ के नाम पर छाये जुनून ने देश में कई दंगे कराये। हद तो तब हो गयी, जब देश की मीडिया से लेकर राजनेता तक आतंकवाद को भी धमॆ में बांट कर देखते हैं। अफजल चाकू मारता है, तो मुसलिम आतंकवादी हो जाता है और श्याम मारता है, तो हिंदू आतंकवादी। ये कौन सा तरीका है। जो लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, उनसे सीधा पूछता हूं कि वे देश जोड़ने की बात क्यों नहीं करते हैं। सबसे बड़ी जरूरत भावना से ऊपर उठकर हेल्दी माइंड सेट तैयार करने की है।

Friday, September 19, 2008

टारगेट हो-टोटल एलिमिनेशन आफ टेररिज्म।

दिल्ली में फिर मुठभेड़, एक इंस्पेक्टर की शहादत और दो आंतकियों का मारा जाना देश के लिए सबसे बड़ी खबर थी। खबरिया चैनलों ने आंतकवाद यानी टेररिज्म के खिलाफ जंग छेड़ने का आह्वान किया। हर कोई पूछ रहा-आखिर कब तक आतंकवाद का ये घिनौना खेल जारी रहेगा? टारगेट हो-टोटल एलिमिनेशन आफ टेररिज्म। चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े।
पर सबसे पहले यहां सिस्टम को चलानेवालों की आत्मा को जगाना जरूरी है। आप-हम चाहें लाख चिल्ला और तड़प लें, अंत में सारी बातें इन सिस्टम चलानेवालों के पास आकर ही खत्म होती हैं। इस व्यवस्था में आम आदमी सिफॆ सहयोग कर सकता है। सिस्टम को बांध नहीं सकता, चला नहीं सकता। आतंकवाद के खिलाफ धारदार रणनीति का अभाव और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने इन चंद राष्ट्रविरोधियों के हौसलों को मजबूत कर दिया है। बात पूरे सिस्टम की चेंजिंग की होनी चाहिए। सिफॆ जमीर जगाने की बात करने से क्या होगा? जरूरत पूरे सिस्टम को मजबूत बनाने की है। इस मुद्दे को डिसास्टर मैनेजमेंट की शक्ल के रूप में देखना जरूरी है। आंतकवाद आज ऐसा घाव बन गया है, जो लाख दवा के बावजूद पूरे देश में फैल रहा है। बात यह देखने की है कि आखिर कमी किस जगह है। धमॆ और भाषाई दीवारों को लांघ कर ही इस सिस्टम को मजबूत कर सकते हैं। हर आतंकी घटना के दो-चार दिन बाद लोगों में उसे भूलने की बीमारी घर करती जा रही है। जरूरत इस अंसवेदनशीलता को खत्म करने की है। राज्यों के आपसी मतभेद और केंद्र का एकतरफा रवैया खत्म हो। पॉलिसीमेकर एकमत हों और उनका टारगेट टोटल एलिनिमेशन आफ टेररिज्म हो, तभी रुकेगा आतंकवाद का पहिया। जब अपनी बाजुओं में ही ताकत नहीं होगी, तो आपकी कमजोरी दूसरे की ताकत बन जाती है। जरूरत बाजुओं को मजबूत करने की है, चाहे उसके लिए कितनी भी कसरत क्यों न करनी पड़ी। जब पंजाब में आंतकवाद का खात्मा हो सकता है, पं बंगाल में नक्सलवाद पर लगाम कसी जा सकती है, तो इस आतंकवाद को क्यों नहीं खत्म क्या जा सकता है? जाहिर है, बात फिर उसी सिस्टम और उसको मजबूत करने पर आकर टिक जाती है।

Wednesday, September 17, 2008

थैंक्स विक्रम-एक भेंट, जो दिल को छू गया

बिहार में बाढ़ आयी। जज्बातों का सैलाब उमड़ पड़ा। लाखों हाथ मदद को बढ़े। पर १६ सितंबर को रामकृष्ण विद्यापीठ, देवघर के १४ वर्षीय विक्रम आदित्य की पहल हमेशा के लिए यादगार बन गयी। झारखंड राज्यस्तरीय साइंस सेमिनार में टॉपर बने विक्रम ने पुरस्कार स्वरूप मिले ५० हजार रुपये बिहार के बाढ़ पीड़ितों के नाम दान कर दिये। विक्रम यह राशि अपने स्कूल के माध्यम से भेजेगा।
सबने कहा-थैंक्स विक्रम। हमें नाज होना चाहिए कि विक्रम जैसे लोग हैं। ये हमें रास्ता दिखाते हैं। सकारात्मक सोच के साथ विपत्ति से लड़ने का हौसला प्रदान करते हैं। यहां बात भेंट से ज्यादा इस बच्चे के दिल में उमड़े जज्बात की है। बेहतर जज्बात, अच्छी सोच और कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश ही इंसान को बेहतर करने को प्रेरित करती है। शायद यही वह चीज है, जो आगे भी विक्रम को एक सफल इंसान बनने को प्रेरित करेगी।

जब खुद को मजबूत करोगे, तभी डरेंगे आतंकी

आंतकवाद का मुद्दा इंटरनेशल मुद्दा है। सबकी जुबां पर है। कोई हौले से, तो कोई जोर देकर इसका विरोध कर रहा है। वल्डॆ में अमेरिकी राजनीति भी इसी आतंकवाद के मुद्दे की चारों ओर घूमती है। अपनी कुंठा और दबी चाहत को हिंसा के सहारे आतंकवादी बताना चाहते हैं।

कोई भी धमॆ इस आतंकवाद का समथॆन नहीं करता, लेकिन आज आतंकवाद एक खास तबके से जुड़ गया है। इसे लेकर राजनीति भी खूब हो रही है। माननीय नेता इसे लेकर खुलकर राजनीति करते हैं। फिर मुद्दे से हटकर बात मंत्रीजी के सूट पर अटक जाती है। कहने का अथॆ यह है कि समस्या की जड़ तक जाने की कोशिश नहीं हो रही।

इंडिया में आतंकवाद का स्वरूप नाथॆ-ईस्ट में कुछ है, तो शेष भारत में कुछ और। कट्टरतावाद आज सभी जगह हावी है। कोई समुदाय ग्रुप बनाकर आतंकी हमला कर अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रहा है, तो कोई राजनीतिक हिंसा के सहारे। जानें दोनों में जा रही हैं। नुकसान देश और दुनिया को दोनों से हो रहा है।

इतिहास उठाकर देख लिजिये, सबसे बड़ी ट्रेजेडी ये रही है कि यह दुनिया हमेशा इन आतंकी बहानों के कारण झुकती, टूटती रही है। रावण को राम ने मार दिया था, लेकिन ये आज भी आदमी के मन और दिमाग में हावी है। बात यहां इस आतंकवाद के पनपने के कारणों की होनी चाहिए।

हम अपने ही देश में कमजोर सुरक्षा तंत्र, लगातार बयानबाजी और दिशाहीन नेतृत्व के कारण इसके शिकार हो रहे हैं। इंडिया में हर चीज में राजनीति है। जब बात आतंकवाद से लड़ने की होनी चाहिए, तब गृह मंत्री, मीडिया और अन्य लोग सूट विवाद में फंसे नजर आते हैं। गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार और मौकापरस्त नेताओं ने देश को जितना नुकसान पहुंचाया है, उससे ज्यादा शायद किसी ने नहीं पहुंचाया।

पड़ोसी मुल्क अपनी चालों से आपकों परास्त करते हैं। दुख देते हैं, पर आप हैं कि रिएक्ट नहीं करते। डिप्लोमेसी के नाम पर बस मौन धारण किये रहते हैं। बिहार में बाढ़ आया, लाखों की तबाही हुई। लेकिन उसके पीछे कारण कमजोर तंत्र, करप्शन और अक्षम पदाधिकारियों का ही होना है। आयी बाढ़ ने लाखों घर और जिंदगियां बरबाद कर दीं। आतंकवादी आपको हिंसात्मक तरीके से नुकसान पहुंचाते हैं, पर यहां हमारा कमजोर तंत्र खुद की कमजोरी से खुद को और आम जनता को नुकसान पहुंचाता है।

दो शब्दों में अपनी कमजोरी को दूरकर ही इस आतंकवाद का मुकाबला किया जा सकता है। खुद को हम क्यों न इतना मजबूत करें कि दूसरे हम पर वार करने से पहले दस बार सोचें।

Wednesday, September 3, 2008

सिंगुर में सपनों को नहीं टूटने दें

आदमी सपने देखता है समृद्धि का,लेकिन कुछ लोग इन सपनों को अपनी जिद की वजह से पूरा नहीं होते देखना चाहते हैं। शायद पश्चिम बंगाल में ममता और उनकी पारटी का यही रवैया है। जब सारा देश छोटी कार नैनो के आने का इंतजार कर रहा है। उसके लिए उनके मन में एक नया उत्साह है और प. बंगाल में सिंगुर जैसी जगह पर टाटा द्वारा लगाये गये प्लांट में कार उत्पादन शुरू होने का काम होने जा रहा था, तब ममता के नकारात्मक रुख ने ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दी है कि टाटा प्लांट को दूसरी जगह राज्य से बाहर ले जाने पर विचार कर रहा है। बंगाल ने देश की आजादी के दौरान पूरे देश को रौशनी और नयी राह दिखायी थी। क्रांतिकारी विचारधाराओं का सूत्रपात भी यहीं से हुआ। पर समय के चक्र में इस आंदोलन और क्रांति के स्वरूप की मौकापरस्तों ने गलत व्याख्या कर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कीं कि राज्य में उद्योग धंधे बंद होते चले गये।
आज राज्य के मुख्यमंत्री से लेकर शासक दल के लोग संभावनाओं को तलाशते हुए औद्योगिक घरानों को निवेश का निमंत्रण दे रहे हैं। यहां यह माना कि ममता का आंदोलन जमीन के लिए है। पर शायद वह यह भूल रही हैं कि जिस जमीन के लिए उनका यह आंदोलन चल रहा है, उसी जमीन पर खड़े हो रहे प्लांट से जितने अवसर, नौकरी और माहौल का निमाॆण होगा, वह सिंगुर और पं बंगाल राज्य की पूरी छवि को दुनिया में बदल कर रख देगा। टाटा पूरे देश और दुनिया में अपने बेस्ट मैनेजमेंट और सेक्योर माहौल के लिए जाना जाता है। यहां झारखंड में जमशेदपुर सिफॆ और सिफॆ टाटा की देन है। हमें गवॆ है टाटा की उपलब्धियों पर।



यहां एक सवाल खड़ा होता है कि ममता ने आंदोलन की गति भी उस समय तेज कर दी, जब प्रोजेक्ट नैनो अपने अंतिम चरण में है। जिन सवालों को लेकर आंदोलन किया जा रहे है, वे सवाल कारखाना या प्लांट की स्थापना प्रक्रिया के शुरू होने के पहले भी होंगे। उस समय ममता ने अपने आंदोलन को उग्र रूप क्यों नहीं दिया? अब जब टाटा ने हजारों करोड़ रुपये का निवेश कर दिया है, तब ममता ने क्यों अड़ियल रुख अपना लिया है?
साफ तौर पर टाटा का नैनो ममता और सत्तारूढ़ दल के बीच जारी वचॆस्व की लड़ाई में फंस गया है। इस समय हजारों लोगों के सपने इस प्लांट के साथ जुड़े होंगे। लेकिन टाटा का प्लांट दूसरी जगह पर ले जाने का प्रस्ताव उन सपनों को तोड़ने जैसा होगा। तीन सितंबर को एक पिता ने इसलिए आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसे अपने पुत्रों के नौकरी छूटने का भय सताने लगा था।
हमारा मानना है कि ममता द्वारा अपनी मनवाने के लिए भी जिस तरह के रुख का प्रयोग किया जा रहा है, वह कहीं से उचित नहीं है। समस्याओं को बातचीत और सहज संवाद के जरिये भी सुलझाया जा सकता है। आज यह देश अगर विकासशील होने की बात कह रहा है, तो वह उन कारखानों और उद्योगों के बल पर कह रहा है, जो आज से २० से ४० साल पहले यहां स्थापित किये गये। उस समय भी विस्थापन हुआ। विवाद आज भी है। लेकिन कहीं भी विकास की राह में रोड़े अटका कर अपनी बात मनवाने का काम नहीं किया गया।
पं बंगाल से यदि टाटा का जाना होता है, तो यह वहां होने जा रहे निवेश में रुकावट पैदा करने जैसा होगा। आखिर आक्रामक रुख अपना कर इस प्रजातांत्रिक देश में राजनीतिक दलों के लोग जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं, पता नहीं। आज अगर पश्चिम और उत्तर-पूवीॆ भारत में आथिॆक असमानता दिखती है, तो इसके पीछे कारण यहां के राजनीतिक दलों की गलत सोच और रुख ही है। कम से कम ममता बनजीॆ का वतॆमान रवैया तो गलत ही प्रतीत होता है। अवसरों को ठुकराना मुसीबतों को दावत देना ही है। हाथ में आयी उपलब्धियों को बातचीत के जरिये नहीं मनवा कर जिद और बंद के जरिये मनवाने का लगातार प्रयास ममता कर रही हैं। ऐसा माहौल बना कि टाटा अपने प्लांट को ही वहां से हटाने का विचार करने लगा है।
रोड जाम, बंद और आंदोलन एक इनसेक्योर एटमोसफेयर बना रहे हैं। समस्या समाधान के लिए बातचीत की जा सकती है। एक एजेंडा तैयार कर उसका सवॆसम्मत हल निकाला जा सकता है। लेकिन सत्ता की चाह ने शायद इन दलों की आंखों पर पट्टी बांध दी है। सरवे के अनुसार बंगाल के भी अधिकांश लोग प्लांट लगाने का समथॆन करते हैं। क्योंकि यहां कम तकनीकी योग्यतावाले भी काम कर सकते हैं। मेरा तो यही मानना है कि टाटा का आप स्वागत करिये। हां, अगर कोई विवाद है, तो उसे बातचीत के जरिये हल करने का प्रयास करें, न कि आक्रामक रुख अख्तियार कर गलत तरीके से।

कौन तय करेगा इस सिस्टम की जिम्मेदारियां?

बिहार के बाढ़ पीड़ितों की मदद को हजारों हाथ बढ़ चले हैं। शहरों, गांवों और कस्बों में धन संग्रह का काम किया जा रहा है। पानी का स्तर कम हुआ। लेकिन इसके साथ ही घटना के पीछे के कारणों का भी खुलासा होना शुरू हो गया है। बांध बनने के बाद से इसके रखरखाव में बरती गयी अनियमितता और सराकारी उदासीनता की पोल खुल गयी है। खबर है कि बांध मरम्मत के समय मजदूरों ने कुछ पैसों के लिए काम करने से मना कर दिया था। बिहार सरकार के इंजीनियरों की टीम भी इस बात को मामूली मानकर चलती रही। जो परिणाम आया और उसने जो तस्वीर पेश की है, उससे हमारी रूह कांप उठी है। ये सरकार, ये प्रशासन, ये अधिकारियों का जत्था और कमॆचारियों की फौज किसके लिए है? यह सवाल बार-बार बिहार का आम जनमानस पूछ रहा है। रही-सही कसर बिहार के दो दिग्गज नेताओं के आपसी आरोप-प्रत्यारोप ने पूरी कर दी है। हो रही है सिफॆ बहस और बहस, काम कुछ भी नहीं। शायद चचिॆल ने आजादी के समय ऐसे ही नहीं भारतीय नेताओं की कैपेबिलिटी पर उंगली उठायी थी। हमारी देशभक्ति उस समय त्राहि-त्राहि कर उठी थी। लेकिन अब शायद ६० साल बाद हम देशवासी इसको काफी हद तक सही मानने लगे हैं। करप्शन का घुन इस सिस्टम के अंदर तक लग चुका है। बिहार में आयी बाढ़ ने पांच जिलों में जीवन को छिन्न-भिन्न करके रख दिया है। पता नहीं, कितने दिन पूरी व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने में लगेंगे। इस बार की बाढ़ ने कम से कम इस सवाल और बहस को जन्म दिया है, ये जो हमारा सिस्टम है, हमारे ही खिलाफ क्यों काम करता है? इसकी जिम्मेदारियां तय करने का समय आ गया है?

Sunday, August 31, 2008

आइये करें दुआ सबकी सलामती की

बचपन में ईश्वर द्वारा अवतार लेकर प्रलय और हादसों से बचाने की कहानी पढ़ा करते थे। बिहार में फिर से प्रलयंकारी बाढ़ को आया देख मन बार-बार ईश्वर से पूछ रहा है कि आप क्यों अभी तक चुप हैं? उन लाखों लोगों की चीख, पुकार, चित्कार आपके मन को क्यों नहीं झकझोर रही है? उन लाखों लोगों के कष्टों को जानने के लिए क्यों नहीं ऐसी शक्ति का अवतार हो रहा है या होता है, जिससे इस प्रलय का सामना कर सकें। मानवीय पुरुषाथॆ, उसका अहं, दपॆ और प्रकृति को नियंत्रित करने के सारे उपाय आज विफल साबित हो रहे हैं। कहीं न कहीं फिर उसी ईश्वर का सहारा लेना पड़ता दिख रहा है, जिसे शायद इस मनुष्य ने भुला दिया है। अखबारों के दफ्तरों में फोन आ रहे हैं, हमें बचा लीजिये। हम यहां फंसे हैं। मोबाइल पर हेल्प मी जैसे संदेशों की भरमार है। लेकिन सारी व्यवस्था बेदम, बेबस और मौन नजर आती है। कल्पाना कीजिये २५-३० लाख की आबादी बाढ़ में फंसी है और उन्हें निकालने के लिए दो-तीन सौ नावें लेकर जुटा है प्रशासन और उसकी फौज। सिफॆ बाढ़ की मत सोचिये, सोचिये उसके बाद उत्पन्न होनेवाले हालात के बारे में। जैसी कहर बरपी है, उसमें महामारी, बीमारियों का पनपना और विनाश से उत्पन्न होनेवाले साइकोलॉजिकल प्रेशर की। फिर से सृजन के लिए पूरी ताकत लगानी होगी। बुढ़े-बुजुगॆ सभी कह रहे हैं-यह तो प्रलय है, न तो ऐसी बाढ़ कभी देखी और न सुनी। नेपाल की ओर से शायद फिर पानी छोड़ा गया है। प्रलय के १४ दिन होने को हैं। जो बाढ़ पीड़ित हैं, उनकी मदद को हाथ भी बढ़े हैं। मन बार-बार इन मदद करनेवालों को शत-शत नमन करता है और सलामी देता है उन जांबाजों को, जो जान पर खेलकर इस त्रासदी में फंसे पीड़ितों की मदद कर रहे हैं। उन पत्रकारों को भी, जो इस समय बाढ़ पीड़ितों की समस्याओं को जान रहे हैं, देख रहे हैं और सारी जानकारी हम-आप तक पहुंचा रहे हैं। आइये सबकी सलामती की दुआ करें।

Friday, August 29, 2008

क्या लौटेंगे भारतीय हॉकी के सुनहरे दिन ?


आपने चक दे इंडिया फिल्म देखी होगी। काफी खुश हुए होंगे। थिएटर से निकलने के बाद जुनून सवार होगा, भारत को हॉकी में चैंपियन बनते देखने का। लेकिन महोदय, हकीकत जानकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जायेगी। क्योंकि जब जड़ ही मजबूत नहीं है, तो पेड़ों में हरियाली देखने का जज्बा भला हम क्यों और कैसे पाल लें। २९ अगस्त को अखबार में भारतीय हॉकी के जादुगर मेजर ध्यानचंद के संस्मरण में लेख छपा। अच्छी यादों को पढ़ कर बेहतर लगता है। लेकिन बरियातू हॉकी सेंटर, जिसने कई अंतरराष्ट्रीय महिला हॉकी खिलाड़ियां दिये, की बदहाली की रपट पढ़ कर मन दुखी हो गया। क्योंकि हम इस सेंटर को अपने स्कूल के जमाने से देखते आये हैं। यह सेंटर झारखंड की राजधानी रांची में स्थित है। इस सेंटर ने यशमनी सांगा, विश्वासी पूतिॆ, दयामनी सोय और न जाने कितने अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी दिये।
हॉकी हमारी शान थी। हम २९ अगस्त को खेल दिवस मनाते हैं। यह हमारा राष्ट्रीय खेल भी है। अच्छी बात है। लेकिन यादों के सहारे आप कब तक अच्छी फसल काट पायेंगे। छपी रपट के अनुसार बरियातू हॉकी सेंटर की लड़कियों को डायट के रूप में सिफॆ ४० रुपये प्रतिदिन मिलते हैं। हाल में विजेंद्र, सुशील और अभिनव ने ओलंपिक में पदक हासिल किये, तो उन पर जैसे रुपये की बरसात होने लगी। जरा पीछे मुड़ कर उनके संघषॆ की कहानी भी जानिये। कैसे उन्होंने खुद के बल पर परिश्रम कर इन बुलंदियों को छुआ है। कुछ दिनों पहले मीडिया में भारतीय हॉकी संघ के बारे में जब खबरें आ रही थीं, तो लग रहा था, ये कोई खेल महासंघ नहीं, बल्कि राजनीति का अखाड़ा है।
ओलंपिक में चीन ने सारे रिकाडॆ तोड़ डाले। हम सबने चीन की तैयारियों के बारे में हाल में देखा और जाना भी था। उनकी तैयारियों के बारे में काफी कुछ बताया गया था। बताया गया था कि कैसे उन्होंने विदेशी तकनीक को देशज तकनीक में बदला। सिरमौर बनने के लिए पूरी तैयारी की। हर कोने से। देश के हर हिस्से से बेहतर खिलाड़ियों का चयन किया। उनमें जीत का जज्बा भरा। तकनीकी मदद, साइकोलॉजिकल प्रिपरेशन और जीतने के लिए अदम्य इच्छा पैदा की। हमने देखा, कैसे फिर वे सिरमौर बन गये। पूरी दुनिया के खेल जगत में आज उनका पताका लहरा रहा है। जाहिर है, हमारा देश भी विफलताओं से सबक लेकर कुछ तो बेहतर करे।

Wednesday, August 27, 2008

रुको, देखो, संभलो और फिर चलो

पहले जम्मू और अब उड़ीसा। हिंसा और द्वेष का उठता बवंडर। उड़ीसा में पहले वीएचपी नेताओं की हत्या हुई और फिर नन को जिंदा जला दिया गया। आज इस देश में हिंसा और द्वेष ने आम जनमानस को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया है। वह तिलमिलाता है, लेकिन रोटी-कपड़े के लिए नहीं, बल्कि उन मुद्दों के लिए, जो कि सहज संवाद से सुलझाया या समझा जा सकता है। हमारे लोग लड़ते हैं, आपस में ही, बिना किसी कारण या वजह के। हम एक ही ईश्वर की संतान हैं। हमारा खून, हमारा चिंतन और हमारे विचार एक हैं। ये सब चीजें हम सब समझते हैं, जानते हैं। लेकिन जैसे कभी-कभी कुछ हो जाता है। भटकाव के प्रवाह में खोकर हिंसा का नंगा नाच इस देश को उस चौराहे पर खड़ा कर देता है, जहां हमारा सिर शमॆ से झुक जाता है। जेहन में १९८४, १९९२ और गुजरात के दंगे ताजें हो जाते हैं। शायद यहां के लोगों ने इन घटनाओं से अब तक सीख नहीं ली है। राजनेताओं को रोटी-कपड़ा और मकान की फिक्र नहीं दिख रही। देश में महंगाई का मुद्दा दो महीने पहले उठा तो था, लेकिन परमाणु करार मुद्दे की धार में जैसे एक कोने में खो गया। न बहस हो रही है और न उसे सुलझाने के लिए कोई ठोस कदम उठाये जा रहे हैं। हम इतने असंवेदनशील हो गये हैं कि उस गरीब की आह नहीं महसूस कर पा रहे हैं, जो दो जून की रोटी के लिए हर वक्त संघषॆ कर रहा है। धमॆ के मुद्दे पेट की भूख के आगे गौण हो जाते हैं। जम्मू में एक महीने से जारी बवाल थम नहीं रहा है कि उड़ीसा में एक नया सिलसिला चालू हो गया। धमॆ को मुद्दा बनाकर इस देश को विनाश की ओर कितने दिनों तक धकेला जाता रहेगा, पता नहीं। एक आम आदमी को क्या चाहिए, रोटी-कपड़ा और मकान। पहले हमारे समाज के अंतिम व्यक्ति तक को ये तीन चीजें मिल तो जायें। एक बात तो हैं, हमारे देश की व्यवस्था कुछ मायनों को काफी बेहतर है, लेकिन हमारा गलत चिंतन और उसे बिगाड़ने के लिए तूला रहता है। कम से कम अब तो भाई धमॆ के नाम पर मत खेलो, रुको, देखो, संभलो और फिर चलो।

Tuesday, August 26, 2008

उत्तर बिहार में बाढ़ का कहर

भागलपुर-पूणिॆया का रास्ता, रास्ते में मिलती कोसी नदी, दूर तक फैले खेत और तेज हवा। शायद यह किसी उपन्यास के अंशों का हिस्सा लगे, लेकिन यही है मेरी यादें। बिहार के अंदर के इलाकों में उतना नहीं घूम पाया हूं, लेकिन अपना मूल स्थान बिहार में होने के कारण उसकी मिट्टी की सुगंध और अपने गांव में बिताये गये पल हमेशा बरबस याद आ जाते हैं। खबर है कि कोसी ने राह बदल दी है। लेकिन इससे ज्यादा बड़ी खबर यह थी कोसी ने रौद्र रूप धारण कर लिया है। लाखों की आबादी घर-द्वार छोड़कर मंदिरों, ऊंची बिल्डिंगों और सेक्योर जगहों पर जिंदगी और मौत के बीच दिन गुजार रही है। पटना और अन्य जगहों पर लोग मोबाइलों पर मदद के संदेश रिसीव कर रहे हैं। टीवी चैनलों पर आ रही तस्वीरें भी रूह कंपा देनेवाली है। उत्तर बिहार रो रहा है। मधेपुरा डूब चुका है। सारी व्यवस्था तहस-नहस हो चुकी है। कोसी की धाराओं ने हमेशा कहर बरपाया है, लेकिन इस बार इसने कुछ ज्यादा ही प्रभावित किया है। बिहार के मुख्यमंत्री भी कोसी के इस लाचार रूप के आगे बेबस नजर आ रहे हैं। वैसे जरूर सरकारी मशीनरी अपने स्तर से लोगों की मदद का प्रयास कर रहा है। रेल मंत्री ने भी प्रधानमंत्री से मिलकर बिहार में सेना भेजने की मांग की है।
हम सोचते हैं कि इन महाप्रलयों या यू कहें, इन आपदाओं से निपटने में हम इनएफिशिएंट क्यों हैं? हर मुसीबत, हर कहर झेलने को विवश बिहार की जनता बार-बार यह सवाल पूछ रही है, क्यों इन मामलों में सिस्टम कौलेप्स करता नजर आता है। कहीं न कहीं हर समस्या का समाधान है। इसमें ज्यादा कुछ नहीं, बस इतना ही कहना चाहूंगा कि सरकार इन आपदाओं से निपटने के लिए आगे कुछ ठोस कदम जरूर उठाये।
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