चलिये आ गया नया शिगूफा। पाकिस्तान ने भारत पर बलूचिस्तान तथा ‘अन्य इलाकों’ में ‘दखलंदाजी’ करने का आरोप लगाया है।
अपनी धार को भारत की ओर मोड़ना पाकिस्तान जानता है। भारत जैसा शरीफ आदमी अब हाथ उठाकर ओ माइ गॉड, ओ माइ गॉड कह रहा है।
कहते रहो और पाकिस्तान उधर अपने शातिर दिमाग में इतनी चालें बैठा चुका होगा कि मुंबई हमले की बरसी के समय आप फिर से आग उगलते रहना-पाकिस्तान को उसकी औकात बता देंगे।
नवंबर, दिसंबर, जनवरी, फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई, जून और अब जुलाई बीत चला, औकात तो बता नहीं पाये, हां बलूचिस्तान मामले पर अपनी सफाई पेश कर रहे हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि भारत का बलूचिस्तान से कोई लेनादेना नहीं है और उन्होंने आश्चर्य जताया कि आखिर भारत ऐसा क्यों करेगा जब उसकी पाकिस्तान से सटी सीमा पर कई समस्याएं हैं.
चिदंबरम ने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस भारत-पाकिस्तान संयुक्त वक्तव्य के मुद्दे पर सरकार के साथ रहेगी जब अगले सप्ताह संसद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस बारे में अपनी बात रखेंगे. उन्होंने कहा कि सिंह संसद में दस्तावेज का ‘सही अर्थ’ बतायेंगे और यह ब्योरा देंगे कि उसमें बलूचिस्तान का जिक्र कैसे आया.
भारत एक सीधे और सज्जन व्यक्ति की भूमिका में याचना करता फिर रहा है। चारों ओर से घिरते जा रहे देश को लेकर क्या कोई गंभीरता नजर आ रही है? शायद नहीं। चीन की भूमिकाओं को लेकर रिपोर्ट पढ़ते ही रह रहे हैं। पाकिस्तान अपने उद्देश्य में सफल रहा है। उसने इतना समय भारत से ले लिया कि वह दुनिया का ध्यान अन्य मुद्दों की ओर ले जाये।
हम हर अंतराल के बाद बस आतंकवादियों को दंड देने की मांग करते रह रहे हैं। सवाल ये है कि आखिर ये सिलसिला कब तक चलेगा। कब तक? जिस देश में सच का सामना करने के लिए टीवी प्रोग्राम की जरूरत आन पड़ी है, वहां यथार्थ का सामना करने के लिए तैयारी कब होगी।
मन हर बार मरता है, जब भी किसी पाकिस्तानी प्रतिनिधि को चालू बनते हुए अपनी गलती को भारत के सिर पर डालते हुए पाता हूं।
अंत में एक ही तुकबंदी बोलने को जी करता है--- सरजी ये पाकिस्तान तो बड़ा चालू है।
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Saturday, July 25, 2009
Thursday, January 29, 2009
क्या मीडिया डाक्टर इसका इलाज खोजेंगे?
जब ओबसेशन शब्द से टकराता हूं, तो मन में काफी विचार उमड़ते-घुमड़ते हैं। इतने कि सोच भी नहीं सकते। है एक शब्द, लेकिन इतने सूत्र का समावेश है कि मन विचलित हो उठे। वैसे में मीडिया और भारतीय समाज को ओबसेशन के सही मायने में फिट पाता हूं। पाता हूं कि मीडिया और भारतीय समाज पाकिस्तान के प्रति ओबसेस्ड है। पाकिस्तानी संगीत, पाकिस्तनी संस्कृति, वहां की क्रिकेट, अपराध, तालिबान या यूं कहें पाकिस्तान की राजनीति से तो सौ प्रतिशत गहरा लगाव यानी ओबसेशन है। भड़ास निकालनी है, तो गरिया डालिये पाकिस्तान को। तुलना करनी हो, तो वहां की सैन्य, सांस्कृतिक और आरथिक विकास से तुलना करिये, यानी हर चीज में प्लस-माइनस पाकिस्तान के साथ ही करिये।
अब जरा इसे मोटे तौर पर समझिये, क्या ये हमारा नुकसान नहीं कर रहा? मीडिया में नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश की रिपोटॆ सूचनाभर रहती है। भारतीय परिवेश पाकिस्तान से कहीं ज्यादा इनसे प्रभावित है। अब मीडिया बेचारा भी क्या करे, वह हमारी सनक पहचान गया है और जब चाहे तब टीआरपी बढ़ाने के लिए तालिबान का राग अलापना शुरू कर देता है। श्रीलंका मामले में जानकारी भरी रिपोरटिंग की मीडिया से अपेक्षा करना बेकार ही है। नेपाल और चीन के मामले में तो भगवान का ही आसरा है। इस पूरी प्रक्रिया में हमें लगता है कि हमारी स्थिति कुएं के मेढक की तरह हो गयी है। जो एक खास दायरे के बाहर देखना पसंद नहीं करता। पाकिस्तान की बात करें, तो अमेरिका कहां छूटेगा। विदेश नीति के विशेषग्यों का समय भी अमेरिकी प्रशंसा करने में बीत जाता है। अब पाकिस्तान को तो हम समझाने से रहे। लेकिन पाकिस्तानी ओबसेशन का जो असर हमारे ऊपर पड़ रहा है, उसका क्या किया जाये?
भले ही सत्यम असत्यम हो जाये, लेकिन ओबामा, ओबामा की रट नहीं छोड़ेंगे। ओबामा ने ये क्या, वो क्या, पूरी पत्रिका रंग डालेंगे। हर पन्ना ओबामा के अभिवादन में रंगा रहेगा। लेकिन देश के उन गरीबों की ओर कोई नहीं झांकेगा, जो अमेरिकी बाजार की तंगहाली का शिकार होकर मरने को विवश हैं। हमारी पूरी अमेरिका-पाकिस्तान के सेंट्रल प्वाइंट पर घूम रही है। रूस, चीन, अफ्रिका यानी कहें, तो विश्व के बचे हुए शेष देशों से मीडिया का लगाव खत्म होता प्रतीत होता है। साफ तौर पर ये हमारी और हमारे देश की मीडिया का ओबसेस्ड होने को इंगित करता है। अब इसका मीडिया डाक्टर कौन सा हल निकालेंगे। ये तो वही जानें।
हम तो पाकिस्तान ओबेसेशन खुद को मुक्त करने की पहल कर चुके हैं। अब आप लोग क्या करते हैं, ये देखना बाकी है।
अब जरा इसे मोटे तौर पर समझिये, क्या ये हमारा नुकसान नहीं कर रहा? मीडिया में नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश की रिपोटॆ सूचनाभर रहती है। भारतीय परिवेश पाकिस्तान से कहीं ज्यादा इनसे प्रभावित है। अब मीडिया बेचारा भी क्या करे, वह हमारी सनक पहचान गया है और जब चाहे तब टीआरपी बढ़ाने के लिए तालिबान का राग अलापना शुरू कर देता है। श्रीलंका मामले में जानकारी भरी रिपोरटिंग की मीडिया से अपेक्षा करना बेकार ही है। नेपाल और चीन के मामले में तो भगवान का ही आसरा है। इस पूरी प्रक्रिया में हमें लगता है कि हमारी स्थिति कुएं के मेढक की तरह हो गयी है। जो एक खास दायरे के बाहर देखना पसंद नहीं करता। पाकिस्तान की बात करें, तो अमेरिका कहां छूटेगा। विदेश नीति के विशेषग्यों का समय भी अमेरिकी प्रशंसा करने में बीत जाता है। अब पाकिस्तान को तो हम समझाने से रहे। लेकिन पाकिस्तानी ओबसेशन का जो असर हमारे ऊपर पड़ रहा है, उसका क्या किया जाये?
भले ही सत्यम असत्यम हो जाये, लेकिन ओबामा, ओबामा की रट नहीं छोड़ेंगे। ओबामा ने ये क्या, वो क्या, पूरी पत्रिका रंग डालेंगे। हर पन्ना ओबामा के अभिवादन में रंगा रहेगा। लेकिन देश के उन गरीबों की ओर कोई नहीं झांकेगा, जो अमेरिकी बाजार की तंगहाली का शिकार होकर मरने को विवश हैं। हमारी पूरी अमेरिका-पाकिस्तान के सेंट्रल प्वाइंट पर घूम रही है। रूस, चीन, अफ्रिका यानी कहें, तो विश्व के बचे हुए शेष देशों से मीडिया का लगाव खत्म होता प्रतीत होता है। साफ तौर पर ये हमारी और हमारे देश की मीडिया का ओबसेस्ड होने को इंगित करता है। अब इसका मीडिया डाक्टर कौन सा हल निकालेंगे। ये तो वही जानें।
हम तो पाकिस्तान ओबेसेशन खुद को मुक्त करने की पहल कर चुके हैं। अब आप लोग क्या करते हैं, ये देखना बाकी है।
Wednesday, December 3, 2008
लग्गी लगा फुनगी पर बैठने की तैयारी (हिंसा-राजनीति, हमारे दल-भाग ३)
देश में आजादी के बाद अगर किसी दल ने कांग्रेस के वचॆस्व को चुनौती दी है, तो वह भाजपा ही है। लेकिन दोनों ने भारतीर राजनीति में धुंध को पसरने देने में मदद की। हालात ये हैं कि मुंबई में आतंकी हमले के बाद सबकी जुबान बंद थे। जब खुले, तो इनके तथाकथित बड़े नेता मुद्दे को छोड़ कर अनाप-शनाप बयानबाजी करने लगे। कोई इसे छोटा-मोटा हादसा कहता है, तो कोई नेताओं के विरोध को बकवास करार देता है।
ज्यादातर समय भाजपा को कांग्रेस पर निशाना साधने के नाम पर सोनिया गांधी ही दिखती रहीं। उनकी नागरिकता पर सवाल उठता रहा, जबकि उन्होंने जीवन का अहम हिस्सा यहां गुजार लिया है। हम एक भारतीय या अश्वेत के अमेरिका में राष्ट्रपति बनने की अपेक्षा करते हैं, लेकिन जब अपने देश में ऐसा कुछ होने का मौका आता है, तो भारतीयता को मुद्दा बनाकर बवाल कर उसे शमॆसार कर देते हैं। इधर कांग्रेस भाजपा को हिंदुवादी दल करार देते हुए एक विशेष वगॆ की पैरोकार बनी रही।
अभी इनके सहयोगी दल बने समाजवादी पाटीॆ के अमर सिहं बाटला हाउस के बाद जांच पूरी होने से पहले ही बयानबाजी कर पुलिसिया कारॆवाई को ही कठघरे में खड़ा करने लगे। कांग्रेस की दोहरी नीति जगजाहिर है। इसकी नीतियों पर यदि रिसचॆ किया जाये, तो दोहरापन अपनाने के मापदंड पर एक किताब लिखी जा सकती है। झारखंड राज्य में जब कोड़ा की सरकार थी, तो अजय माकन कांग्रेस के राज्य प्रभारी हुआ करते थे। कमाल की बात ये थी कि अजय माकन का दल कांग्रेस कोड़ा सरकार को समथॆन दे रहा था। और वही माकन सरकार की नीतियों और शासन की घोर आलोचना करते रहे। सवाल वही था कि जब उनके दल द्वारा समथिॆत सरकार खराब काम कर रही है, तो समथॆन वापस क्यों नहीं लिया गया। सामने कुछ और, फिर बाहर कुछ और की तजॆ पर जनता के साथ-साथ मीडिया को भी धोखे में रखा गया।
ऐसा लग रहा था कि आतंकी हमले से पहले देश के नेताओं के सामने कोई मुद्दा नहीं बच गया था। इन आतंकियों ने कम से कम आतंकवाद जैसे मुद्दे पर पूरे देश को एक कर दिया है। क्योंकि इसने मुंबई से लेकर कन्याकुमारी तक हर व्यक्ति को प्रभावित किया है।
राज ठाकरे को मराठी-बिहारी विवाद से फुरसत नहीं थी और यहां बम विस्फोट के बाद लालू प्रसाद के साथ शिवराज पाटिल सिफॆ सूट पहने या नहीं, इसी के विवाद में फंसे रह गये। जब विचार और तनाव चरम पर होती है, तो ये नेता ऐसे जुमलों का इस्तेमाल करेंगे कि पूरा मामला गड्ढे में चला जायेगा। हाल में केरल के सीएम द्वारा दी गयी टिप्पणी और नकवी साहब का बयान ऐसा ही उदाहरण है। धन्य है यह मीडिया भी, जिसे आंतक जैसे महत्वपूणॆ मुद्दे को छोड़ कर इन्हीं बयानों को लेकर टीआरपी बढ़ाने की फिक्र लगी हुई है। भारतीय राजनीति को आज देश की सुरक्षा की चिंता लगी हुई, लेकिन ये वही नेता हैं, जो कल तक सेना तक को भी निशाने पर रखने लगे थे।
ज्यादातर समय भाजपा को कांग्रेस पर निशाना साधने के नाम पर सोनिया गांधी ही दिखती रहीं। उनकी नागरिकता पर सवाल उठता रहा, जबकि उन्होंने जीवन का अहम हिस्सा यहां गुजार लिया है। हम एक भारतीय या अश्वेत के अमेरिका में राष्ट्रपति बनने की अपेक्षा करते हैं, लेकिन जब अपने देश में ऐसा कुछ होने का मौका आता है, तो भारतीयता को मुद्दा बनाकर बवाल कर उसे शमॆसार कर देते हैं। इधर कांग्रेस भाजपा को हिंदुवादी दल करार देते हुए एक विशेष वगॆ की पैरोकार बनी रही।
अभी इनके सहयोगी दल बने समाजवादी पाटीॆ के अमर सिहं बाटला हाउस के बाद जांच पूरी होने से पहले ही बयानबाजी कर पुलिसिया कारॆवाई को ही कठघरे में खड़ा करने लगे। कांग्रेस की दोहरी नीति जगजाहिर है। इसकी नीतियों पर यदि रिसचॆ किया जाये, तो दोहरापन अपनाने के मापदंड पर एक किताब लिखी जा सकती है। झारखंड राज्य में जब कोड़ा की सरकार थी, तो अजय माकन कांग्रेस के राज्य प्रभारी हुआ करते थे। कमाल की बात ये थी कि अजय माकन का दल कांग्रेस कोड़ा सरकार को समथॆन दे रहा था। और वही माकन सरकार की नीतियों और शासन की घोर आलोचना करते रहे। सवाल वही था कि जब उनके दल द्वारा समथिॆत सरकार खराब काम कर रही है, तो समथॆन वापस क्यों नहीं लिया गया। सामने कुछ और, फिर बाहर कुछ और की तजॆ पर जनता के साथ-साथ मीडिया को भी धोखे में रखा गया।
ऐसा लग रहा था कि आतंकी हमले से पहले देश के नेताओं के सामने कोई मुद्दा नहीं बच गया था। इन आतंकियों ने कम से कम आतंकवाद जैसे मुद्दे पर पूरे देश को एक कर दिया है। क्योंकि इसने मुंबई से लेकर कन्याकुमारी तक हर व्यक्ति को प्रभावित किया है।
राज ठाकरे को मराठी-बिहारी विवाद से फुरसत नहीं थी और यहां बम विस्फोट के बाद लालू प्रसाद के साथ शिवराज पाटिल सिफॆ सूट पहने या नहीं, इसी के विवाद में फंसे रह गये। जब विचार और तनाव चरम पर होती है, तो ये नेता ऐसे जुमलों का इस्तेमाल करेंगे कि पूरा मामला गड्ढे में चला जायेगा। हाल में केरल के सीएम द्वारा दी गयी टिप्पणी और नकवी साहब का बयान ऐसा ही उदाहरण है। धन्य है यह मीडिया भी, जिसे आंतक जैसे महत्वपूणॆ मुद्दे को छोड़ कर इन्हीं बयानों को लेकर टीआरपी बढ़ाने की फिक्र लगी हुई है। भारतीय राजनीति को आज देश की सुरक्षा की चिंता लगी हुई, लेकिन ये वही नेता हैं, जो कल तक सेना तक को भी निशाने पर रखने लगे थे।
बुलंद रहिये, देश बंटनेवाला नहीं है ( छह दिसंबर, हिंसा, भारतीय राजनीति (भाग-२))

मैंने पिछली पोस्ट छह दिसंबर, बाबरी मसजिद, हिंसा, भारतीय राजनीति (भाग-१) में भारतीय राजनीति में व्याप्त विरोधाभास का जिक्र किया था। एक दोस्त ने इसी सिलसिले में भविष्य में भारत के एक और विभाजन होने की बात टिप्पणी में कही। जहां तक इस देश के धमॆ के नाम पर बंटने का सवाल है, तो उसके लिए हमारे यहां आजादी के बाद से अब तक वो माइंड सेट नहीं बना है और न ही बनेगा। क्योंकि विभाजन के कहर को झेलने और उसके बाद उत्पन्न हुए हालातों ने इस देश को समस्याओं के गतॆ में धकेल दिया है। अब तक हम उनसे बाहर निकलने के लिए छटपटा रहे हैं। आज पाकिस्तान हमारे लिये नासूर बन चुका है। प्रणव मुखरजी को सारी रिश्तेदारी छोड़ पाकिस्तान को आतंकियों को सौंपने की बात स्पष्ट और जोर देकर कहनी पड़ रही है। ये वही पाकिस्तान है, जो इस भारत से अलग होकर बना। आज जो युवक यहां गोलियां बरसाते हुए आये थे, उनके दादा, परदादा दिल्ली और मुंबई की उन्हीं गलियों में बड़े हुए होंगे। परवेज मुशरॆफ भले ही तानाशाह रहे हों पाकिस्तान के, लेकिन उनका पुश्तैनी मकान भारत में है। उनकी भावनाएं भारत से जुड़ी हैं। सियासत करते हुए भारत के खिलाफ भले ही कड़वे बोल बोलते हों, लेकिन उनकी आत्मा भी इस मामले में गवाही देने से इनकार करती होगी। एक और विभाजन की बात इतनी आसानी से हम इसलिए करते हैं, क्योंकि विभाजन के बाद होनेवाले ददॆ को हमने नहीं झेला है। किसी धमॆ का पक्ष लेकर बोलना कभी-कभी ठीक होगा। लेकिन हर बार हिंदू होने का प्रश्न उछाल कर मुसलमानों की देशभक्ति पर उंगली उठाना भी कहां की समझदारी है। (ऐसा ज्यादातर हमारे अधिकांश ब्लागर बंधु करते हैं)। ये सवाल दागना सीधे-सीधे देश के ३० करोड़ मुसलमानों को कठघरे में खड़ा करने जैसा है। दो महीने पहले कश्मीर में धमॆ के नाम पर राजनीति ने उस राज्य को दो भागों में बांट दिया था। कोई भी धमॆ हिंसा अपनाने की बात नहीं करता। दुख इस बात का है कि पेट भर जाने के बाद हम भगवान को अपने हिसाब से विभिन्न हिस्सों में बांट देते हैं। याद रखिये, सबका खून एक ही रंग का है और सारे लोगों के लिए एक ही भगवान होता है। इस धमॆ के नाम पर छाये जुनून ने देश में कई दंगे कराये। हद तो तब हो गयी, जब देश की मीडिया से लेकर राजनेता तक आतंकवाद को भी धमॆ में बांट कर देखते हैं। अफजल चाकू मारता है, तो मुसलिम आतंकवादी हो जाता है और श्याम मारता है, तो हिंदू आतंकवादी। ये कौन सा तरीका है। जो लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, उनसे सीधा पूछता हूं कि वे देश जोड़ने की बात क्यों नहीं करते हैं। सबसे बड़ी जरूरत भावना से ऊपर उठकर हेल्दी माइंड सेट तैयार करने की है।
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गांव की कहानी, मनोरंजन जी की जुबानी
अमर उजाला में लेख..