Showing posts with label indian politics. Show all posts
Showing posts with label indian politics. Show all posts

Tuesday, October 26, 2010

भूखे-नंगे हिन्दुस्तान का नारा एक गाली की तरह है.

हमारे जैसे लोग, जो अरुंधति राय को उनके किताब को बुकर प्राइज मिलने को लेकर जानते थे, आज उनके सनकपन लिये बयान के लिए जानते हैं. कुछ बुद्धिजीवी, कुछ विचारक, कुछ ब्लागर और कुछ तथाकथित पत्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अरुंधति का समर्थन करते हैं. हमारे देश में प्रजातंत्र का खुला स्वरूप हर उस बागी तेवर को पसंद करता है, जो इसकी धार को कम करता है. हमारे यहां सीमा पार कर रहे विचारकों का स्वागत किया जाता है. हम उन्हें हीरो बनाने में पीछे नहीं हटते हैं.

 अरुंधति के मामले में हमारे यहां की सरकार हो या हमारी मीडिया आलोचना से पीछे हट जाती है. वह आलोचना नहीं कर पाती. सत्ता के केंद्र से चंद किमी की दूरी पर राष्ट्रविरोधी मुद्दों पर सेमिनार किया जाता है, लेकिन उसे कुछ यूं गुजरने दिया जाता है, जैसा सामान्य सभा हो. अरुंधति जब कहती हैं  कि आई एम डिसोसिएटिंग माइसेलेफ फ्राम हालो सुपर पावर इंडिया, तब भी उनके खिलाफ कोई नेता बयानबाजी नहीं करते. इलेक्ट्रानिक मीडिया में उनके बयान पर बहस नहीं की जाती. इस पर भी नहीं, जब वे कहती हैं कि कश्मीर को भूख-नंगे हिन्दुस्तान से आजादी मिलनी चाहिए. साफ तौर पर ये मौन खतरनाक है. 

अगर कोई इन बातों के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे संघी तक करार दिया जाता है. किसी भी देश की आजादी उसके अनुशासन पर निर्भर करती है. हम जिस आजाद मुल्क में रहते हैं, उस आजादी को मिले हुए चंद दशक क्या बीत गए, हम अपने ही सिस्टम को गाली देने लगें, ये क्या उचित है. बोले हुए शब्द दिल पर चोट करते हैं. अरुंधति के शब्द अब दिल पर चोट कर रहे हैं. नक्सलिज्म जैसे नासूर को समर्थन देकर और चंद आंदोलनों में शामिल होकर अरुंधति किस समाजसेवा की दुहाई देती हैं, ये सोचने की बात है. अरुंधति ने गरीबी नहीं देखी. उन्होंने करोड़ों गरीबों और बेरोजगारों के रोजगार नहीं मिलने के दर्द को महसूस नहीं किया है. किसी व्यवस्था को तोड़ने या देश को बनाने में सैकड़ों साल लग जाते है. भाईचारगी को कायम रखने में हजारों कुर्बानियां चली जाती हैं. उसी जगह पर अरुंधति जैसे लोग खुद को आंदोलन के नायक बनने की राह पर देश के सामने ऐसी बाधाएं खड़ी करते चले जाते हैं, जिनके सामने हमारा स्वाभिमान तिल-तिल कर मरता है.

अरुंधति को इस देश की मिट्टी ने ही पहचान दी. अब उस देश की मिट्टी के खिलाफ उनके भूखे-नंगे हिन्दुस्तान का नारा एक गाली की तरह है. हम जिस अरुंधति पर चंद साल पहले जो गर्व करते थे, वो गर्व धुल चुका है. वैसे भी सरकार इस बात पर गौर करे कि अरुंधति उस बिंदु को मजबूत कर रही हैं, जिसके नीचे कश्मीर के बागी नेता और नक्सल समर्थक जमा हो रहे हैं. अरुंधति के रूप में उन्हें एक ऐसा ग्लैमर लिया चेहरा भी मिल रहा है, जो उनकी आवाज को ज्यादा मजबूती से सामने रख रहा है. उस चेहरे के  पीछे की हकीकत सच्चाई में ज्यादा भयानक है. अरुंधति के बयान को कोई सच्चा भारतीय स्वीकार नहीं करेगा.

Saturday, July 25, 2009

चलिये आ गया नया शिगूफा।

चलिये आ गया नया शिगूफा। पाकिस्तान ने भारत पर बलूचिस्तान तथा ‘अन्य इलाकों’ में ‘दखलंदाजी’ करने का आरोप लगाया है।

अपनी धार को भारत की ओर मोड़ना पाकिस्तान जानता है। भारत जैसा शरीफ आदमी अब हाथ उठाकर ओ माइ गॉड, ओ माइ गॉड कह रहा है।

कहते रहो और पाकिस्तान उधर अपने शातिर दिमाग में इतनी चालें बैठा चुका होगा कि मुंबई हमले की बरसी के समय आप फिर से आग उगलते रहना-पाकिस्तान को उसकी औकात बता देंगे।

नवंबर, दिसंबर, जनवरी, फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई, जून और अब जुलाई बीत चला, औकात तो बता नहीं पाये, हां बलूचिस्तान मामले पर अपनी सफाई पेश कर रहे हैं।

केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा है कि भारत का बलूचिस्तान से कोई लेनादेना नहीं है और उन्होंने आश्चर्य जताया कि आखिर भारत ऐसा क्यों करेगा जब उसकी पाकिस्तान से सटी सीमा पर कई समस्याएं हैं.

चिदंबरम ने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस भारत-पाकिस्तान संयुक्त वक्तव्य के मुद्दे पर सरकार के साथ रहेगी जब अगले सप्ताह संसद में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस बारे में अपनी बात रखेंगे. उन्होंने कहा कि सिंह संसद में दस्तावेज का ‘सही अर्थ’ बतायेंगे और यह ब्योरा देंगे कि उसमें बलूचिस्तान का जिक्र कैसे आया.


भारत एक सीधे और सज्जन व्यक्ति की भूमिका में याचना करता फिर रहा है। चारों ओर से घिरते जा रहे देश को लेकर क्या कोई गंभीरता नजर आ रही है? शायद नहीं। चीन की भूमिकाओं को लेकर रिपोर्ट पढ़ते ही रह रहे हैं। पाकिस्तान अपने उद्देश्य में सफल रहा है। उसने इतना समय भारत से ले लिया कि वह दुनिया का ध्यान अन्य मुद्दों की ओर ले जाये।
हम हर अंतराल के बाद बस आतंकवादियों को दंड देने की मांग करते रह रहे हैं। सवाल ये है कि आखिर ये सिलसिला कब तक चलेगा। कब तक? जिस देश में सच का सामना करने के लिए टीवी प्रोग्राम की जरूरत आन पड़ी है, वहां यथार्थ का सामना करने के लिए तैयारी कब होगी।
मन हर बार मरता है, जब भी किसी पाकिस्तानी प्रतिनिधि को चालू बनते हुए अपनी गलती को भारत के सिर पर डालते हुए पाता हूं।

अंत में एक ही तुकबंदी बोलने को जी करता है--- सरजी ये पाकिस्तान तो बड़ा चालू है।

Saturday, March 14, 2009

दल इन सवालों का जवाब दें, चिकनी बातों से ब्रेनवाश करने का दिन बीत चला। चुनावी दंगल-१

चुनाव का मौसम आ रहा है। सतरंगी छटा के साथ शानदार बतकही का दौर जारी है। सुना है आडवाणी जी युवाओं को जीतने के बाद दस हजार में लैपटॉप देंगे। क्या हम युवा सिर्फ लैपटॉप के वादे से मन बदल लें या एक अभूतपूर्व फैसला ले लें आडवाणी जी को जिताने का? उधर कांग्रेस भी भाजपा के पिछले चुनाव के साइनिंग इंडिया के स्लोगन की तरह जय हो का स्लोगन लेकर मैदान में उतरी है। मामला वही है, सिर्फ चेहरा बदल गया है।

हमारा प्रश्न सिर्फ इतना है कि

ये पार्टियां देश में इन मुद्दों को लेकर क्या कर रही हैं --

आम आदमी को रोजगारपरक और बुनियादी शिक्षा देने का आसान रास्ता बनाने की पहल - हमारे देश और राज्य में सरकारी शिक्षा बदहाल है। रोज निजी स्कूलों में फीस बढ़ने की बात को लेकर बवाल हो रहा है। यह एक ऐसा मुद्दा है, जो हर मध्यवर्गीय परिवार को प्रभावित कर रहा है। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की व्यवस्था को मजबूत करने को लेकर आम दलों का क्या विजन है? इस पर उन्हें अपनी बातें साफ करनी चाहिए।

स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल - स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाल व्यवस्था को दूर करने के लिए कैसी और क्या ठोस पहल होगी? आज तक जिला और प्रखंड स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सेवा सपना ही बनी रह गयी है। कहीं मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में में प्रोफेसरों और बेहतर स्वास्थ्य सेवा की कमी है, तो कहीं स्वास्थ्य केंद्र मात्र नाम के लिए हैं।

सड़क, पानी की सुविधा मुहैया कराने को लेकर क्या कदम उठाये जायेंगे- नदियों के जल संरक्षण, शहरों और गांवों में जलापूर्ति व्यवस्था, प्रदूषण नियंत्रण जैसी बातों को लेकर दलों की क्या विशेष योजना है। देश के बड़े शहर जनसंख्या के दबाव के आगे झुकते जा रहे हैं। आखिर पूरे देश में सड़क और पानी को लेकर क्या ठोस योजना तैयार की जायेगी या है। इस पर दलों को पूरी बात साफगोई से रखनी चाहिए।

मंदी के दुष्प्रभाव से बचाने के उपाय - उदारीकरण के नाम पर अंधी खाई बनाने की जगह, एक बेहतर और स्थायी व्यवस्था के निर्माण के लिए दल क्या कर रहे हैं। अब तक जो हुआ बहुत हुआ। पूरे देश को कॉरपोरेट व्यवस्था के भरोसे आम जनता नहीं छोड़ सकती है। महंगाई दर नियंत्रण के समय सरकार असहाय नहर आती है। बेरोजगार हो रहे युवकों की नौकरी बचाने के नाम पर सरकार असहाय नजर आती है।

सवाल ये है कि जब आम जनता द्वारा चुनी गयी सरकार ही नियंत्रण स्थापित करने में असहाय नजर आती है, तो ऐसी सरकार के रहने का क्या मतलब है। दलों को ये साफ करना होगा कि वे हमारे लिये ऐसी अव्यवस्था को दूरकर ठोस व्यवस्था का निर्माण कैसे करेंगे?

ये सवाल काफी कुछ कह जाते हैं। चिकनी बातों से ब्रेनवाश करने का दिन बीत चला।

ये दल बतायें कि इनके पास ठोस रणनीति क्या है? अगर आडवाणी करोड़ों का रोजगार देने की बात करते हैं, तो बतायें कि ये काम वे कैसे करेंगे। एक ठोस व्यवस्था का निर्माण कैसे करेंगे। जहां कॉरपोरेट दुनिया के आगे सरकार झुकती नजर नहीं आयेगी। सिर्फ फायदे के नाम पर लाखों लोगों की पेट पर लात मारने का अभियान कैसे रोका जायेगा।

इस देश की जनता को बेहतर और स्थायी व्यवस्था चाहिए। गैर मुद्दों पर बहस और व्यक्तिगत छिछालेदार से ऊपर उठकर हर दल को इन सवालों को जवाब देना होगा।
Prabhat Gopal Jha's Facebook profile

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

अमर उजाला में लेख..

अमर उजाला में लेख..

हमारे ब्लाग का जिक्र रविश जी की ब्लाग वार्ता में

क्या बात है हुजूर!

Blog Archive