जब ओबसेशन शब्द से टकराता हूं, तो मन में काफी विचार उमड़ते-घुमड़ते हैं। इतने कि सोच भी नहीं सकते। है एक शब्द, लेकिन इतने सूत्र का समावेश है कि मन विचलित हो उठे। वैसे में मीडिया और भारतीय समाज को ओबसेशन के सही मायने में फिट पाता हूं। पाता हूं कि मीडिया और भारतीय समाज पाकिस्तान के प्रति ओबसेस्ड है। पाकिस्तानी संगीत, पाकिस्तनी संस्कृति, वहां की क्रिकेट, अपराध, तालिबान या यूं कहें पाकिस्तान की राजनीति से तो सौ प्रतिशत गहरा लगाव यानी ओबसेशन है। भड़ास निकालनी है, तो गरिया डालिये पाकिस्तान को। तुलना करनी हो, तो वहां की सैन्य, सांस्कृतिक और आरथिक विकास से तुलना करिये, यानी हर चीज में प्लस-माइनस पाकिस्तान के साथ ही करिये।
अब जरा इसे मोटे तौर पर समझिये, क्या ये हमारा नुकसान नहीं कर रहा? मीडिया में नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश की रिपोटॆ सूचनाभर रहती है। भारतीय परिवेश पाकिस्तान से कहीं ज्यादा इनसे प्रभावित है। अब मीडिया बेचारा भी क्या करे, वह हमारी सनक पहचान गया है और जब चाहे तब टीआरपी बढ़ाने के लिए तालिबान का राग अलापना शुरू कर देता है। श्रीलंका मामले में जानकारी भरी रिपोरटिंग की मीडिया से अपेक्षा करना बेकार ही है। नेपाल और चीन के मामले में तो भगवान का ही आसरा है। इस पूरी प्रक्रिया में हमें लगता है कि हमारी स्थिति कुएं के मेढक की तरह हो गयी है। जो एक खास दायरे के बाहर देखना पसंद नहीं करता। पाकिस्तान की बात करें, तो अमेरिका कहां छूटेगा। विदेश नीति के विशेषग्यों का समय भी अमेरिकी प्रशंसा करने में बीत जाता है। अब पाकिस्तान को तो हम समझाने से रहे। लेकिन पाकिस्तानी ओबसेशन का जो असर हमारे ऊपर पड़ रहा है, उसका क्या किया जाये?
भले ही सत्यम असत्यम हो जाये, लेकिन ओबामा, ओबामा की रट नहीं छोड़ेंगे। ओबामा ने ये क्या, वो क्या, पूरी पत्रिका रंग डालेंगे। हर पन्ना ओबामा के अभिवादन में रंगा रहेगा। लेकिन देश के उन गरीबों की ओर कोई नहीं झांकेगा, जो अमेरिकी बाजार की तंगहाली का शिकार होकर मरने को विवश हैं। हमारी पूरी अमेरिका-पाकिस्तान के सेंट्रल प्वाइंट पर घूम रही है। रूस, चीन, अफ्रिका यानी कहें, तो विश्व के बचे हुए शेष देशों से मीडिया का लगाव खत्म होता प्रतीत होता है। साफ तौर पर ये हमारी और हमारे देश की मीडिया का ओबसेस्ड होने को इंगित करता है। अब इसका मीडिया डाक्टर कौन सा हल निकालेंगे। ये तो वही जानें।
हम तो पाकिस्तान ओबेसेशन खुद को मुक्त करने की पहल कर चुके हैं। अब आप लोग क्या करते हैं, ये देखना बाकी है।
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Thursday, January 29, 2009
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गांव की कहानी, मनोरंजन जी की जुबानी
अमर उजाला में लेख..