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Sunday, August 16, 2009

१५ अगस्त के ठीक पहले, देशभक्ति का ज्वार और अमेरिकी दादागिरी

आज की तारीख में शाहरुख खान परिचय के मोहताज नहीं है।

फेसबुक पर एक व्यक्ति ने इसी तरह के स्टेटस पर एक सवाल उठाया था।
उसका कहना था कि शाहरुख माय नेम इज खान टाइटिलवाली फिल्म पर काम कर रहे हैं और ये देखिये खान टाइटिल लेकर हंगामा हो गया१५ अगस्त के ठीक पहले, देशभक्ति का ज्वार और अमेरिकी दादागिरी तीनों मिलाकर प्रचार का मौका ठीक दिख रहा था।

(वैसे इस मामले में मैं अमेरिकी कार्रवाई की निंदा करता हूं और रहूंगा)।


ऐसे में फिल्मों के गॉशिप को लेकर एंगल नजर आ रहा है। कमीने फिल्म आने को है और शाहिद-प्रियंका के किस्से मशहूर हो जाते हैं। उनकी मित्रता के बारे में अखबारों में लिखा जाता है। कुछ ऐसी ही बातें न जानें कितनी चल निकलती हैं।

मामला ये है कि दर्शकों की सोच को सिनेमा की ओर मोड़ने का जो नायाब गणित खेला जाता है, उसमें मीडिया भी फंस जाता है। उसे खबर देनी होती है। इसलिए शायद ऐसी बात होती है या करायी जाती है, जिससे पूरा फायदा उधर यानी फिल्म की ओर चला जाता है। मीडिया पीआर एजेंसी के तौर पर इस्तेमाल हो जाती है।

बिजनेस करने या फिल्मों को चलाने के लिए ये हथकंडा पुराना नहीं है। सच का सामना करनेवाले से ऐसे निजी सवाल पूछे जाने लगे थे कि दर्शक बेचैन हो जायें देखने के लिए। ये जगजाहिर है कि आदमी की नेगेटिविटी आकर्षित करती है। इसी नेगेटिविटी को भुनाने के खेल में लोग फंस जाते हैं।

Monday, March 30, 2009

मीडिया संयम क्यों न खोये, बहस जारी हैं

मेरी पिछली पोस्ट में ज्ञानदत्त पाण्डेय कहते हैं

तकनीकी विकास और उसके माध्यम से दुनियां का जुड़ाव तो रोक पाना सम्भव न होगा। पर असंयम की वृत्ति जिसने सब-प्राइम क्राइसिस और मन्दी को जन्म दिया; वह जरूर समाप्त होनी चाहिये/होगी।

प्रचार-प्रसार माध्यमों को भी असंयम बांटना बन्द करना चाहिये।


उपर्युक्त टिप्पणी में श्री पाण्डेय जी प्रचार-प्रसार माध्यमों द्वारा असंयम बरतने की बातें करते हैं।

ये सोचनेवाली बात है। आज के दौर में क्या महत्वपूणॆ है बाजार या व्यक्ति। आज बाजार व्यक्ति के ऊपर हावी नजर आता है। यानी व्यक्ति होने के मायने बदल गये हैं। जब व्यक्ति को व्यक्ति नहीं माना जाता। जब सिर्फ पैसे के दृष्टिकोण से पूरी व्यवस्था को देखना शुरू करते हैं, तो हमारे विचार बदल जाते हैं। रिश्तों में खटास आनी शुरू हो जाती है। साथ ही विचारों का प्रवाह भी रुक जाता है। जब सोच नहीं हों, तो विचार कहां से आयें। जब विचार नहीं आयें, तो आइडिया कहां से आयें।
मंथन करनेवाले लोग भी कहां से हैं। शहर से ही। कस्बों या गांवों से नहीं। जब बुनियादी जरूरतों को पूरा करनेवाला तबका ही प्रभावित नहीं होगा, तो फिर आइडिया की बातें करना बेकार है। मीडिया या संचार भी सिर्फ बाजार को ध्यान में रखकर पैसेवाले वर्ग की जरूरतों को ही निशाने पर रखता है। क्योंकि वही उसका खरीदार होता है। वैसे में मीडिया संयम क्यों न खोये? संयम तो तब आयेगा, जब मीडिया अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए उन सारे दबावों से मुक्त होगा, जिसका वह वर्तमान समय में सामना कर रहा है।
मीडिया के सामने तो खुद इतनी चुनौतियां हैं कि वह अस्तित्व की रक्षा के लिए बाजारवाद के हर हथकंडे को अपनाने के लिए मजबूर है। मीडिया को सरकारी संरक्षण मिले या नहीं, ये तो बाद की बात है, लेकिन उसे कम से कम इतनी स्वतंत्रता आर्थिक या सामाजिक तौर पर जरूर देनी चाहिए कि वह सरकार और आम जनता के बीच बेहतर संवाद का माध्यम बने। हावी बाजारवाद के सामने संयम, सामाजिकता और परंपरा का निर्वाह गैर-जरूरी चीजें लगती हैं।
मीडिया को बात-बात पर गरियानेवाले क्या यथार्थ का सामना करने को तैयार हैं। मीडिया भी तो उसी व्यवस्था का एक अंग हैं, जिसके सहारे हम जीते और गाते हैं। संयम के लिए तात्कालिक बहस से ऊपर उठकर अन्य पहलुओं को भी ध्यान में रखना होगा। मीडिया सिर्फ टीवी चैनल और अखबार नहीं हैं। मीडिया में एडवरटाइजमेंट से लेकर लिखे और सुने जानेवाले हर अंग का समावेश होता है। इसे समझना होगा। नहीं तो संयम या असयंम के बहस में हम सिर्फ दीवार को अपनी बातें सुनाते रह जायेंगे।

Friday, January 30, 2009

कुछ खास है हिन्दी बेल्ट की पत्रकारिता में

ज्यादा नहीं घूमा हूं। दुनिया क्या, भारत के उन हिस्सों में भी नहीं गया, जहां जा सकता हूं। लेकिन देखकर, जानकर एक छुअन भरा अहसासभर जरूर है। पत्रिकाओं और अखबारों के पन्नों को पलट कर देश की आत्मा को जानने की कोशिश करता हूं। कितना सफल या विफल हूं, वो तो वक्त बतायेगा। लेकिन एक बात कहने को जी मचलता है कि हिन्दी बेल्ट की पत्रकारिता में कुछ है। (ऐसा पूरे देश की मीडिया का विश्लेषण करने के बाद लगा)। कुछ ऐसा कि यहां की पत्रकारिता हमको जिंदगी को छूती हुई लगती है। भावनाओं को उभार कर पन्नों पर उड़ेल देने को विवश कर देती है। कई पत्रकारों को देखता-पढ़ता आया हूं। कुछ-कुछ अभी भी साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपी रिपोरटें शब्दों के साथ जेहन में हैं। उसी कड़ी में उदयन शमाॆ जी जी की फूलन देवी के समपॆण के समय की रिपाताजॆ पढ़ने को मिली थी (शायद रांची के ही किसी दैनिक में फिर से बतौर संस्मरण छापी गयी थी)। तब से अब तक एक आम व्यक्ति की तरह हिन्दी बेल्ट की पत्रकारिता का विश्लेषण करता रहा। नक्सली हिंसा, भ्रष्टाचार, बिखरता सामाजिक तानाबाना और भ्रष्ट होती व्यवस्था की पोल खोलती रिपोरटें मन को रोमांचित कर जाती थीं या हैं। मन में एक सवाल उठता है कि क्या इतने सारे समीकरण हिन्दी बेल्ट के इतर कहीं और मिलेंगे। क्या इतना मसाला बतौर समाज सिफॆ हिन्दी बेल्ट ही दे सकता है या कोई और क्षेत्र भी इतने ही समीकरण लेकर रहता है? भले ही अन्य राज्य या दिल्ली आरथिक विकास की दौड़ में आगे रहते हैं। लेकिन उनके सामने बिखरते सामाजिक समीकरण के उतने स्वरूप उभरते नहीं मिलेंगे और न ही इतनी बहस और शोर शराबे का सिलसिला। नीतीश, लालू , रामविलास, मायावती पूरे देश की राजनीति में केंद्रबिंदु बने रहते हैं। ये तो हिन्दी बेल्ट की राजनीति और समीकरणों का ही कमाल है, जिनकी लहर पर सवार होकर इन नेताओं की नौका तैरती रहती है। स्वस्थ पत्रकारिता के पैमाने पर भी हिन्दी बेल्ट लोगों के ज्यादा करीब है। यहां के पत्रकार यहां के लोगों की आत्मा की छुअन को ज्यादा महसूस करते हैं। कम से कम टीआरपी की होड़ में नेशनल मीडिया का जो स्वरूप बिगड़ा हुआ है, वह क्षेत्रीय स्तर पर अभी तक बचा हुआ है। ये और कुछ उन जिम्मेवार पत्रकारों की ही बदौलत संभव हो सका है, जो किसी भी हालत में संयम की रेखा को नहीं लांघते। मीडिया ने चारा घोटाले से लेकर अब तक बिहार-झारखंड में कभी भी पत्रकारिता के स्तर को गिरने नहीं दिया। हमेशा उस दायरे को बरकरार रखा, जो होना चाहिए। होड़ यहां भी है, प्रतियोगिता भी, लेकिन एक सम्मानजनक संतुलन के साथ। शायद इसलिए जब भी बाहर के अखबारों को देखता हूं, तो मन उन अखबारों के पन्नों में वही सामग्री खोजती है, जो मैं अपने स्थानीय अखबारों में पाता हूं। लेकिन उन्हें नहीं पाता। इतने बिखरे समीकरणों को समेटे रिपाताजॆ और गंभीर लेख सिफॆ यहां के अखबारों में ही नसीब होता है। अब देखना ये है कि आनेवाले समय में भी हिन्दी बेल्ट की पत्रकारिता का यही स्वरूप बरकरार रह पाता है या नहीं।

Thursday, January 29, 2009

क्या मीडिया डाक्टर इसका इलाज खोजेंगे?

जब ओबसेशन शब्द से टकराता हूं, तो मन में काफी विचार उमड़ते-घुमड़ते हैं। इतने कि सोच भी नहीं सकते। है एक शब्द, लेकिन इतने सूत्र का समावेश है कि मन विचलित हो उठे। वैसे में मीडिया और भारतीय समाज को ओबसेशन के सही मायने में फिट पाता हूं। पाता हूं कि मीडिया और भारतीय समाज पाकिस्तान के प्रति ओबसेस्ड है। पाकिस्तानी संगीत, पाकिस्तनी संस्कृति, वहां की क्रिकेट, अपराध, तालिबान या यूं कहें पाकिस्तान की राजनीति से तो सौ प्रतिशत गहरा लगाव यानी ओबसेशन है। भड़ास निकालनी है, तो गरिया डालिये पाकिस्तान को। तुलना करनी हो, तो वहां की सैन्य, सांस्कृतिक और आरथिक विकास से तुलना करिये, यानी हर चीज में प्लस-माइनस पाकिस्तान के साथ ही करिये।
अब जरा इसे मोटे तौर पर समझिये, क्या ये हमारा नुकसान नहीं कर रहा? मीडिया में नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश की रिपोटॆ सूचनाभर रहती है। भारतीय परिवेश पाकिस्तान से कहीं ज्यादा इनसे प्रभावित है। अब मीडिया बेचारा भी क्या करे, वह हमारी सनक पहचान गया है और जब चाहे तब टीआरपी बढ़ाने के लिए तालिबान का राग अलापना शुरू कर देता है। श्रीलंका मामले में जानकारी भरी रिपोरटिंग की मीडिया से अपेक्षा करना बेकार ही है। नेपाल और चीन के मामले में तो भगवान का ही आसरा है। इस पूरी प्रक्रिया में हमें लगता है कि हमारी स्थिति कुएं के मेढक की तरह हो गयी है। जो एक खास दायरे के बाहर देखना पसंद नहीं करता। पाकिस्तान की बात करें, तो अमेरिका कहां छूटेगा। विदेश नीति के विशेषग्यों का समय भी अमेरिकी प्रशंसा करने में बीत जाता है। अब पाकिस्तान को तो हम समझाने से रहे। लेकिन पाकिस्तानी ओबसेशन का जो असर हमारे ऊपर पड़ रहा है, उसका क्या किया जाये?
भले ही सत्यम असत्यम हो जाये, लेकिन ओबामा, ओबामा की रट नहीं छोड़ेंगे। ओबामा ने ये क्या, वो क्या, पूरी पत्रिका रंग डालेंगे। हर पन्ना ओबामा के अभिवादन में रंगा रहेगा। लेकिन देश के उन गरीबों की ओर कोई नहीं झांकेगा, जो अमेरिकी बाजार की तंगहाली का शिकार होकर मरने को विवश हैं। हमारी पूरी अमेरिका-पाकिस्तान के सेंट्रल प्वाइंट पर घूम रही है। रूस, चीन, अफ्रिका यानी कहें, तो विश्व के बचे हुए शेष देशों से मीडिया का लगाव खत्म होता प्रतीत होता है। साफ तौर पर ये हमारी और हमारे देश की मीडिया का ओबसेस्ड होने को इंगित करता है। अब इसका मीडिया डाक्टर कौन सा हल निकालेंगे। ये तो वही जानें।
हम तो पाकिस्तान ओबेसेशन खुद को मुक्त करने की पहल कर चुके हैं। अब आप लोग क्या करते हैं, ये देखना बाकी है।

Friday, January 2, 2009

रूपहले समुद्र के रूमानी संसार में गोता

इन दिनों देखता हूं कि ब्लाग की दुनिया हो या फिल्मों, सीरियलों की, गांवों को रूमानी अंदाज में पेश किया जाता है। आज के गांव की हकीकत से अलग। पटना को पेरिस और मुंबई को शंघाई जैसी बातें होती हैं, लेकिन दूर स्थित पिछड़े रामपुर के उत्थान की बात नहीं होती। पता नहीं इस ददॆ की दवा क्या है? ज्यादा दिन नहीं बीतें, कुछ दिनों पहले कुछ बिरहोरों की झारखंड के चतरा जिले में बीमारी से मौत हो गयी थी। बिरहोर आदिवासी अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। उनकी ददॆनाक कहानी और जीवन जीने के संघषॆ को सुन शायद आप दहल उठेंगे। दुरभाग्य ये है कि मीडिया, जिससे हम जैसे लोग जुड़े हैं, वह भी वास्तविकताओं को नजरअंदाज कर रूमानी भावनाओं के रूपहले समुद्र में गोता लगा रहा है।

काफी लोग एक अजीब बात करते हैं, गांव में जाकर जीवनयापन करने की, शहरी आपाधापी से दूर शांत और हरियाली के बीच। लेकिन गांव की जिंदगी को अंदर जाकर देखिये, कम होती गांव की जनसंख्या, इलाज के लिए तरसते आम ग्रामीण और उनके निम्न जीवनस्तर को झेल पाना आसान नहीं होगा। सच्चाई ये है कि आज भारत के गांव में बूढ़ों की फौज है। जवान गांव छोड़ कर शहरों की ओर पलायन कर गये हैं। जो बचे हैं, वे हताश होकर बस समय गुजारने की कोशिश करते हैं।

हमारी सरकार भी शहरों की ही उन्नति की बातें करती हैं। झारखंड के दस से अधिक जिले उग्रवाद प्रभावित हैं। यहां उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में ग्रामीणों की जिंदगी काफी कहानी कहने को समेटे हुए है। इस सबके पीछे सिस्टम द्वारा उस विकास को नजरअंदाज करना है, जो इन गांवों को चाहिए। इन दस सालों में काफी कम राजनीतिग्यों को आप गांव के विकास की बातें करते पायेंगे। सेंसेक्स, विदेशी निवेश और हाइप्रोफोइल बातें और समाचार आज की मीडिया के अंग हैं। किसानों द्वारा आत्महत्या करने की बातें हेडलाइंस नहीं बनतीं हैं और गांव में हो रहे परिवतॆन का उल्लेख कहीं मिलता नहीं है। अंदर की कहानी को बताये कौन? जो बतानेवाले हैं, वो रूपहले समुद्र के रूमानी संसार में गोता लगाते-लगाते खुद डूबते चले जा रहे हैं।

यही कारण है कि पटना, मुंबई, बंगलौर, दिल्ली तो सबकी जुबान पर हैं, लेकिन दूर, उपेक्षित और भुला दिये गये गांवों हमारे जेहन से दूर होते जा रहे हैं। साथ ही दूर होते जा रहे हैं, वे गांव के लोग, जो हमारी जिंदगी के आधार अन्न को अपने परिश्रम से पैदा करने की जद्दोजहद में भिड़े रहते हैं। क्या आप-हम सोचेंगे उनके लिए?
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