जिस दिन जिस समाज में नयी सोच का उभरना खत्म हो जाता है, उस दिन वो समाज मरने लगता है. हमारे समाज में नयी सोच का पनपना खत्म हो चुका है. नये वाद पैदा नहीं हो रहे और जो हैं, वे पुरातन वादों के सहारे लठिया टेकते हुए आगे बढ़ रहे हैं. जिस दिन रावण फिल्म की कहानी पढ़ी-देखी नहीं, राजनीति फिल्म की कहानी पढ़ी- देखी नहीं, तो ये लगा कि हमारे फिल्मकार फिर से पुरानी कहानियों के धरातल पर अपनी क्रिएटिविटी की नींव खड़ी कर रहे हैं. रेड अलर्ट नामक फिल्म भी आ रही है, नक्सलवाद के बहाने.
जहां तक मैं समझता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री में कल्पना को नए सिरे से परिभाषित करने की अपार क्षमता होती है, लेकिन हमारे फिल्मकार इस कम्पीटिशन के माहौल में खुद को ढालने के लिए पुरानी शराब को ही नयी बोतल में डाल कर पिलाने की कोशिश कर रहे हैं. जब पश्चिम से तुलना करते हैं, तो अपने फिल्मकारों की कल्पना को एक ऐसे पैमाने पर पाते हैं, जहां नकल की आंधी तो चल निकली है, लेकिन खुद के बल पर इमारत खड़ा करने की कोई कोशिश नहीं होती.
प्रेम कहानियों और मां-बेटे, भाई-बहन के रिश्ते पर तीन दशक किसी तरह से गुजर तो गए, लेकिन जब सोसाइटी में आंधी की तरह बदलाव हो रहे हों, तो सिर्फ फैशन इंडस्ट्री की निगाह से पूरे शहरी जीवन को देखने का सिर्फ प्रयासभर होता है. शहरी जीवन में न्यूक्लियर फैमिली भी है. बिखरते रिश्ते हैं और मरते मन के साथ लाखों लोग हैं. उनके अंदर झांकने का प्रभावशाली नजरिया हमारे फिल्मकारों के पास नहीं है. वे फिल्म बनाते हैं, तो सिर्फ अतिवादी नजरिया दिखता है, जैसे विदेशी डायरेक्टर द्वारा बनाए गए स्लमडॉग मिलेनियर को ही लें. बीच का जो आबादी का हिस्सा है, उसकी जीवनशैली को छूने की हिम्मत किसी में नहीं है.
बाजार का इस कदर हावी होना हमें कचोटता है. मेरा मानना है कि मिडिल क्लास की समस्याओं को छूने की हिम्मत जिस दिन फिल्मकार करने लगेंगे और कल्पना से परे फिल्मों का निर्माण करने लगेंगे, उस दिन नई सोच को पैदा करने की उनकी हुनर सबको चकित कर जाएगी या रुला जाएगी. इतिहास को आईने में रखकर कितने दिनों तक मूर्ख बनाने की प्रक्रिया जारी रहेगी. जरूरी है कि इतिहास से कोई छेड़छाड़ न की जाए, क्योंकि उसे पुनः परिभाषित करने की कोशिश बेकार ही होगी. जिंदगी में आगे बढ़ना ही सच्ची पहल है. कब्र खोदने से कंकाल के सिवाय कुछ नसीब नहीं होनेवाला है.
सोच को मरने मत दीजिए. क्योंकि ये सोच ही आपकी अगली पीढ़ी में आपके लिए इज्जत पैदा करेगी.
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Tuesday, June 29, 2010
Friday, February 12, 2010
रण फिल्म -ईमानदारी को इतना घोला गया कि बर्दाश्त से बाहर हो जाता है...
विजय हर्षवर्द्धन के रूप में अमिताभ जिस आदर्श के तौर पर रण फिल्म में भाषण देते नजर आते हैं, उसमें लगता है कि पूरा मामला अति रंजित हो गया है। ये फिल्म एक कदम आगे निकल कर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक को इतना कमजोर दिखा जाती है कि विदेशों में रहनेवाले भारत को किसी टापू से कम न समझें, जहां टोलों की तरह राजनीतिक चंद स्वार्थ के लिए शीर्ष पद को भी हाशिये पर रख देते हैं। ईमानदारी की मिसाल कायम करते हुए पूरब जब खुद डबल क्रास कर रही कंपनी की कर्मचारी की बातों में आकर सबूत दूसरे चैनल को दे देता है, तो यहीं से पटकथा कमजोर होती चली जाती है। पूरी फिल्म को सतही डायलॉग के सहारे ईमानदारी की चिमकी के सहारे चमकाने की कोशिश की गयी है। पटकथा में मीडिया के उस बात को इग्नोर कर दिया गया है,जहां ये बताना जरूरी होता है कि सबूत में कितना दम है। एक सीडी के कारण प्रधानमंत्री की कुर्सी को खतरा उत्पन्न हो जाता है। देश की राजनीति का स्तर अवसरवादिता के मामले में क्या इतना कमजोर है या चैनलों के अंदर की कहानी ऐसी ही है। हम चैनलों की अंदरूनी शक्ल-सूरत से अनजान हैं, लेकिन अगर चैनलों की अंदरूनी स्थिति का रण फिल्म ने सही चित्रण किया है, तो ये दर्शक के सामने इन पर विश्वास करने का अहम सवाल छोड़ जाता है। दूसरी बात, आज के दौर में फिल्म के पत्रकार हर्षवर्द्धन के जैसा ईमानदार बना जा सकता है क्या? रण फिल्म इलेक्ट्रानिक चैनल में काम कर रहे लोगों के लिए सामान्य बात की तरह होगी, लेकिन जो चैनलों से बाहर के लोग हैं, उनके सामने इलेक्ट्रानिक चैनल की काफी हल्की इमेज बन जाती है। पैसों के लिए खबरों का सौदा करते हुए दिखाना चौथे स्तंभ को तोड़ने जैसा है। जैसा करते फिल्म में चैनलों को दिखाया गया है, उसमें तो पूरी सिस्टम का बंटाधार हो जाएगा। पता नहीं, कहां और कैसे फिल्म कुछ लोगों को प्रभावित करती है। ईमानदारी की मिठास को इतना घोला गया है, वह कड़वी हो गयी है। ये सच का सामना करनेवाले उस किरदार की तरह हो गया है, जो पैसे के लिए हर सच को दुनिया के सामने रख रहा हो। रण फिल्ममें चैनल डरा जाते हैं। वे ऐसी तस्वीर पेश कर जाते हैं कि टीवी खोलते हुए डर लगता है। साथ ही मीडिया कर्मियों की बेईमानी की परत दर परत खोलती मालूम होती है। क्या सचमुच ऐसे हालात हैं? पता नहीं, अगर ऐसा है, तो ईश्वर भला करे।
Thursday, February 4, 2010
मुंबई जैसे तीन-चार आर्थिक राजधानी की हैसियतवाले शहर हो जाएं, तो विवाद ही खत्म हो जाए।
मुंबई किसकी है। आपकी, हमारी, सारे भारत की, या सिर्फ ठाकरे साहब की। सियासत में टकराव की बात हो आयी है। यहां इन नेताओं को कुछ कहने के लिहाज से क्या लिखा जाए, ये आपका-हमारा मन जानता है। क्षेत्र देश की मिट्टी से बड़े होते जा रहे हैं। राहुल गांधी को ये कहना पड़ता है कि मुंबई हमले के समय आतंकियों का सामना करनेवालों में ज्यादातर बिहार और यूपी के थे। क्यों कहना पड़ रहा है बड़ी लाचार स्थिति है।शाहरुख ने माफी मांगने से इनकार कर दिया है। एपिसोड शुरू हुआ आइपीएल में पाक खिलाड़ियों को खेलाने पर बयान देने पर। उसके बाद से शिव सेना हमला पर हमला बोल रही है। हम कहते हैं कि देश की आर्थिक राजधानी को क्यों इतना बेबस बनाया जा रहा है? सरकार कहां है? पूरी नौटंकी में ये बयान नहीं आता है कि देश में महंगाई के लिए क्या किया जा रहा है? हमें तो लगता है कि पीछे-पीछे सारे नेताओं में दोस्ती है और कैमरे के सामने दुश्मनी। साफ तौर पर पब्लिक को बेवकूफ बनाया जा रहा है।
पूरे एपिसोड में किसको क्या होने जा रहा है?
क्या शिव सेना के खिलाफ केंद्र कोई कार्रवाई करेगी?
क्या राहुल के खिलाफ शिवसेवा कुछ करेगी?
क्या तीन साल से बाहरी-भीतरी की नौटंकी शांत हो जाएगी?
क्या ये मुद्दों से भरमाने के लिए एक रणनीति नहीं है?
क्या इसमें सारे दल मिले हुए नजर नहीं आते?
इन मामलों में गौर करें, तो शाहरुख आइपीएल में पाक खिलाड़ियों की बोली क्यों नहीं लगाते हैं। थोड़े समय के बाद बयान देते हैं। क्या वे नहीं जानते हैं कि मामला क्या हो गया है? आज शाहरुख माफी नहीं मानने की बात कर हीरो बन गए हैं। कांग्रेस उन्हें समर्थन दे रही है। क्या लोग यहां मूर्ख हैं, जो कुछ नहीं जानते? मामला साफ है, सारा कुछ रणनीतिक है। अगले हफ्ते माइ नेम इज खान फिल्म भी रिलीज हो रही है। प्रचारभरपूर मिल रहा है। लोग भी इंतजार कर रहे हैं। हर फिल्म के पहले एक विवाद जरूर होता है। ये नये पीआर का एक साउंड स्ट्रेटेजी है।
मुंबई तो पूरी राजनीति का अब वह मोहरा बन गया है, जिस जब जो चाहे चला देता है। हमारा तो ये कहना है कि देश में मुंबई जैसे तीन-चार आर्थिक राजधानी की हैसियतवाले शहर हो जाएं, तो विवाद ही खत्म हो जाए।
राहुल भले ही कुछ बोलें या कहें, लेकिन उनकी रणनीति जो कुछ समय पहले युवा के नाम पर कामयाब लग रही थी, आज विरोधभासी लगती है। साफ तौर पर मुंबई के नाम पर जो नौटंकी है, जो राजनीति का एक खेल है, वह बेवकूफ बनाने का हथकंडा है। यहां तक कि सीएम भी टैक्सी ड्राइवरों को लेकर चिंतित हो उठे हैं। रोजगार पैदा करिये साहब। हर राज्य में तरक्की की लौ जलाइए। हम-आप लड़-भिड़ कर कौन सा पदक पा लेंगे।
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Saturday, January 23, 2010
हमारे अंदर में जो कंप्लेक्स है..
वीर फिल्म को लेकर एक बात स्पष्ट है कि इसमें अंगरेजों के खिलाफ संघर्ष का थीम है। लगान का भी थीम यही था। अंगरेजों से आजाद हुए ६० साल हो गए। हम आज जहां हैं, वहां से पीछे देखने का जुनून एक हद तक अब भी मौजूद है। अंगरेज हावी हैं। दिमाग पर। हमारी दस फीसदी आबादी आज मन से अंगरेज जरूर है। उनकी नजरों में दूसरे भारत अलग होता है। बात को सीधे कहते हुए कहना होगा कि मुझे अब अंगरेजों के खिलाफ संघर्ष पर बने थीम नहीं जंचते। मुझे वे थीम भी नहीं जंचते जो गरीब भारत की तस्वीर के सहारे खड़े किए जाते हों। हमारे अंदर में जो कंप्लेक्स है, उसे हमारे फिल्मकार भुनाते चलते हैं। अंगरेजों के खिलाफ संघर्ष का थीम। ग्लोबल होती जा रही इस दुनिया में ये थीम अब कितना कारगर रहा है। सोचिये। अखंड भारत के लिए देशभक्ति के ज्वार को उफनाने के लिए क्या अंगरेजों के खिलाफ किया गया संघर्ष ही आधार हो सकता है। देशभक्ति का जो थीम है, उसका मुख्य आधार क्या हो, ये बहस का उद्देश्य होना चाहिए। हम कैसे दुनिया या खुद को बताएं कि हम देशभक्त हैं। क्या फिल्मी हीरो के गुलामी के प्रति गुस्से पर ताली पीटकर इजहार किया जाए या जो तात्कालिक कारण हमें कमजोर कर रहे हैं, उन पर ध्यान देकर? ध्यान देने की बात ये है कि वैचारिक रूप से हम आज भी कमजोर हैं। हमारे पास या हमारे फिल्मकारों के दिमाग में वह बात या दृष्टिकोण नहीं है, जो वैचारिक धार को तेजी प्रदान करे। जिससे हम इतिहास से दो कदम आगे बढ़कर बात करें। मुझे तो १९४७ के समय कही गयी बातों को आधार बनाकर कही जानेवाली बातें भी विरोधाभासी लगती हैं। जब देश आजाद हुआ, तब और आज में जमीन-आसमान का फर्क है। तब का भारत कुछ और था और अब का भारत कुछ और है। इतने परिवर्तन हैं कि आप कुछ नहीं कर सकते। जब वैश्विक आतंकवाद की चुनौती हो, नक्सलवाद पर गृह मंत्री अभियान छेड़ने की पहल कर रहे हों और देश में क्षेत्रीय ताकतें बढ़ रही हों, तो वह वैचारिक परिपक्वता न तो फिल्म के स्तर पर और न बहस के स्तर पर दिखती है, जो पूरी जमात को एक मंच पर ले आए। एक मंच। न तो ऐसा कोई प्रतिनिधि दिखता है, जिसके एक शब्द लोगों को एक मैदान में हुंकार मारने के लिए जुटने को विवश कर दें। ऐसा क्यों है, ये सोचने की बात है। शहर में जब हर परिवार एकल और हर एकल परिवार व्यक्ति में सिमट रहा हो, तो अंगरेजों के खिलाफ संघर्षवाला थीम मुझे सिर्फ थिएटर में पैसा बटोरने और जमकर चिल्लानेवाला लगता है। मुझे न तो अंगरेजों के खिलाफ गुस्सा आता है और न ही देशभक्ति का ज्वार फूटता है। मुझे वैचारिक गरीबी के उस हिस्से के दर्शन होते हैं, जिसके कारण आज का भारत या कहें भारतीय समाज विरोधाभास में जी रहा है। इस वैचारिक गरीबी को कैसे दूर किया जाए, क्या कोई मुझे बताएगा? शायद लेख थोड़ा भारी हो गया हो, लेकिन ये जरूरी है कि हम वैचारिक गरीबी के बहस को जिंदा रखें। भारतीय समाज को जिंदादिल रखने के लिए ये जरूरी है। जरूरी है कि जिंदगी में एक खास बदलाव आए। हमें लीडरशिप उस परिपक्वता के साथ मिले, जिनके सहारे अगली पीढ़ी बिंदास होकर आगे बढ़ सके। और उन्हें देशभक्ति के थीम के लिए अंगरेजों के खिलाफ संघर्ष के जज्बे का ही सिर्फ सहारा न लेना पड़े। मेरा ये मानना है कि अंगरेज अगर हमारे सामने एक छोटी लकीर खींच कर गए हैं, तो हम उनके लिए आनेवाले समय में इतनी बड़ी लकीर खींचकर जाएं कि उन्हें सोचना पड़े बार-बार हमारे लिये।
Sunday, August 16, 2009
१५ अगस्त के ठीक पहले, देशभक्ति का ज्वार और अमेरिकी दादागिरी
आज की तारीख में शाहरुख खान परिचय के मोहताज नहीं है।फेसबुक पर एक व्यक्ति ने इसी तरह के स्टेटस पर एक सवाल उठाया था।
उसका कहना था कि शाहरुख माय नेम इज खान टाइटिलवाली फिल्म पर काम कर रहे हैं और ये देखिये खान टाइटिल लेकर हंगामा हो गया। १५ अगस्त के ठीक पहले, देशभक्ति का ज्वार और अमेरिकी दादागिरी तीनों मिलाकर प्रचार का मौका ठीक दिख रहा था।
(वैसे इस मामले में मैं अमेरिकी कार्रवाई की निंदा करता हूं और रहूंगा)।
ऐसे में फिल्मों के गॉशिप को लेकर एंगल नजर आ रहा है। कमीने फिल्म आने को है और शाहिद-प्रियंका के किस्से मशहूर हो जाते हैं। उनकी मित्रता के बारे में अखबारों में लिखा जाता है। कुछ ऐसी ही बातें न जानें कितनी चल निकलती हैं।
मामला ये है कि दर्शकों की सोच को सिनेमा की ओर मोड़ने का जो नायाब गणित खेला जाता है, उसमें मीडिया भी फंस जाता है। उसे खबर देनी होती है। इसलिए शायद ऐसी बात होती है या करायी जाती है, जिससे पूरा फायदा उधर यानी फिल्म की ओर चला जाता है। मीडिया पीआर एजेंसी के तौर पर इस्तेमाल हो जाती है।
बिजनेस करने या फिल्मों को चलाने के लिए ये हथकंडा पुराना नहीं है। सच का सामना करनेवाले से ऐसे निजी सवाल पूछे जाने लगे थे कि दर्शक बेचैन हो जायें देखने के लिए। ये जगजाहिर है कि आदमी की नेगेटिविटी आकर्षित करती है। इसी नेगेटिविटी को भुनाने के खेल में लोग फंस जाते हैं।
Saturday, August 1, 2009
दोस्ती का दिन ब्लागर बंधुओं को मुबारक हो।
आज फ्रेंडशिप डे है। आप बेचैन हैं कि अब तक किसी ने आपको फोन या शुभकामना संदेश नहीं भेजा है। अंगरेज और कुछ करें न करें, हर चीज का एक दिन जरूर बना दिया है। १४ फरवरी को प्रेम दिवस का रूप दे दिया है, तो दो अगस्त को आज फ्रेंडशिप डे है। दोस्ती, प्रेम, माता-पिता के प्रतिसिमट कर रह गया है। लेकिन एक सवाल है कि अगर दोस्त ही दुश्मन निकल जाये, तो क्या करियेगा।चाणक्य नीति में तो यहां तक कहा गया है कि अपनी गोपनीय से गोपनीय बातों को दोस्तों और निकट के व्यक्ति से बचाकर रखो। पता नहीं, कब कौन आपका दुश्मन बन जाये।
प्रतियोगिता के इस युग में कभी भी कहीं भी कुछ हो सकता है। सुदामा तो कृष्ण के साथी थे। गरीब थे। लेकिन कृष्ण ने उन्हें अपने से भी ज्यादा सम्मान दिया। आज न तो सुदामा हैं और न कृष्ण। दोस्ती का भी आधुनिक रूप फेसबुक पर है। लोग अब मिलते नहीं, लेकिन फेसबुक या कहें सोशल नेटवर्किंग के सहारे एक-दूसरे से जुड़े हैं। कई लोग दावा करते हैं कि हम फेसबुक पर दोस्त हैं। लेकिन सच्चा दोस्त, तो वही है, जो संकट में, अंतिम समय में काम आये और राह दिखाये।
प्रतियोगिता के इस युग में कभी भी कहीं भी कुछ हो सकता है। सुदामा तो कृष्ण के साथी थे। गरीब थे। लेकिन कृष्ण ने उन्हें अपने से भी ज्यादा सम्मान दिया। आज न तो सुदामा हैं और न कृष्ण। दोस्ती का भी आधुनिक रूप फेसबुक पर है। लोग अब मिलते नहीं, लेकिन फेसबुक या कहें सोशल नेटवर्किंग के सहारे एक-दूसरे से जुड़े हैं। कई लोग दावा करते हैं कि हम फेसबुक पर दोस्त हैं। लेकिन सच्चा दोस्त, तो वही है, जो संकट में, अंतिम समय में काम आये और राह दिखाये।
दोस्ती पर बनी फिल्मों ने कई हिट दी हैं। तेरी-मेरी यारी, ये दोस्ती हमारी, ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे... जैसे गीत लबों पर आकर गुनगुनाने लगते हैं हम आज भी। दोस्ती और फ्रेंडशिप को बेहतर नजरिया दे सकें, तो हमारा जीवन सफल हो।
जो भी हो, यहां पर इससे अलग एक ही चीज कहना चाहेंगे
दोस्ती का दिन ब्लागर बंधुओं को मुबारक हो।
दोस्ती का दिन ब्लागर बंधुओं को मुबारक हो।
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