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Saturday, March 9, 2013

शायद मैं सबसे खुशनसीब हूं...

अंकल कैसे हैं? अपने क्वार्टर से नीचे उतरते वक्त ऊपर के तल्ले पर रहनेवाले पड़ोसी से टकराते ही पहला सवाल. चिर-परिचित अंदाज में हंस कर ठीक है कहना और आगे बढ़ जाना. नहीं तो परिवार या मौसम के बारे में दो बातें, शब्दों के आदान-प्रदान के बाद अपनी-अपनी राह चल निकलना. ये मेरी जिंदगी का हर रोज का पार्ट है. सुबह दस बजे आफिस के लिए निकलने के दौरान अंकल मिल ही जाते हैं.

थोड़ा बैक ग्राउंड में ले चलता हूं. कुछ महीनों पहले घर में स्पेस की कमी की वजह से मां-बाप से दूर एक बड़े से फ्लैट में बतौर किराएदार खुद को शिफ्ट कर लिया था. जिसमें मैं अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ रहने लगा. बड़े-बड़े कमरे, बड़ा सा अपार्टमेंट. सुख-सुविधा सारा कुछ. लेकिन वहां दस बजे निकलने के दौरान बगल में रहनेवाले पड़ोसी मुस्कान से स्वागत करते नहीं मिले. वह मिलते, टकराते और फिर अपनी राह चल निकलते. दिन, हफ्ता और महीना गुजरता चला गया. स्थिति ऐसी हो गई कि बड़े से डैम के किनारे खड़े होने के बाद भी पानी के लिए तरस रहे हों. न कोई मुस्कुराहट और न ही गुस्सा. एकदम प्रोफेशनल लोगों से भेंट मुलाकात.

रांची से शहर में जहां लोग गर्मजोशी से मिलते हैं मुझे बदलते जमाने का अहसास हुआ. मन तड़पने लगा था. अंत में एक दोस्त से इस बारे में राय जाहिर की. उसने बताया कि अगर ऐसा है, तो लौट आओ अपने उसी पुराने आशियाने में यानी मां-बाप के पास. बस वहां एक ही चीज की कमी होगी कि तुम्हें वो रूम का बड़ा स्पेस नहीं मिलेगा, लेकिन दिल का बड़ा स्पेस मिलेगा. जहां बड़े दिलवाले पड़ोसी हैं और हाय-हेलो करनेवाले चंद परिचित. हम जैसे आम लोग, जो दौड़-भाग वाली नौकरी करते हैं, वह हो रहे इन सामाजिक बदलावों से परिचित नहीं हो पाते हैं. खास कर जब उन्हें अच्छे पड़ोसी मिले हों और मुस्कुराते रहनेवाले लोग. दर्द होने के बाद भी उस पर पेन रिमूवर क्रीम लगानेवाले चंद हाथ तुरंत मिल जाते हैं. ऐसे में जब रियल सिचुएशन से सामना होता है, तो स्थिति सांप-छुछंदरवाली हो जाती है.

सेल्फ सेंटर्ड होते जा रहे लोगों से टकराने पर अवसाद में पड़ने जैसी स्थिति होने लगती है. ऐेसे ही फेसबुक पर दो हजार से ज्यादा दोस्त हैं, लेकिन अगर उनमें से किसी को चैट रूम में तकलीफ दी, तो अजब-गजब रिएक्शन अधिकांश मामलों में मिल जाएंगे. कई भड़ासी भी ऐसे मिल जाएंगे, जो अपने कमेंट्स से आपको तिलमिलाने की कोशिश करें. वे यह नहीं सोचेंगे कि इस ओपेन वर्चुअल स्पेस पर हर कमेंट हजारों निगाहों से होकर गुजरती है और ये किसी की इज्जत को चिंदी-चिंदी कर सकती है. यूं कहें कि आप बेगानेपन की स्थिति से दूर होने की कोशिश करने के लिए अगर चंद दोस्तों या परिचितों का साथ चाहेंगे, तो उसके लिए आपको भाग्यशाली बनना होगा. क्योंकि ऐसे बिरले ही लोग होंगे, जिन्हें रोज मुस्कुरा कर हाय हेलो करनेवाले पड़ोसी मिल जाएं. सौभाग्य से मुझे मिले हैं, मैं खुश हूं और आज इसे आपसे शेयर कर रहा हूं.

अगर आप थोड़ा गंभीर होकर सोचें, तो पाएंगे कि प्रोफेशनल होना जितना आसान होता है, उतना ही मुश्किल होता है किसी को स्नेह से बांधना. शायद इसी प्रोफेशनल होते माइंडसेट ने कोर्ट में तलाक के केसेज बढ़ा दिए हैं. दूसरों के लिए खुद को समर्पित करनेवाले लोग नहीं मिलते. आज कल मेरे हिसाब से पहले जैसी समर्पित मां, पिता, भाई, बहन या पत्नी कम ही मिलती हैं. ये वे लोग हैं, जो तमाम तकलीफों को सहते हुए भी आपके लिए अपनी सुविधाएं छोड़ने के लिए तैयार रहते हैं.आपकी खुशी अपनी खुशी लगती है. टूटते घर और लगातार बनती बड़ी बिल्डिगों के बीच आपके जेहन में भी ये सब बातें आती ही होगी. मुझे लगता है कि अच्छे पड़ोसी, अच्छी बेटियां, अच्छे माता-पिता और अच्छी पत्नी को पाकर मैं शायद इस दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान हूं, तो ये गलत नहीं होगा. ईश्वर से कोई शिकायत नहीं. अब शिकायत सिर्फ उन लोगों से है, जिन्होंने प्रोफेशनल होने का ढोंग कर अपने जैसों की संख्या ज्यादा कर ली है और इसे बदलते जमाने का नाम दे दिया है.   

Saturday, May 5, 2012

फिल्म हेट स्टोरी - नंगई मानसिकता का ढोल बजाते 'शब्द' बेइज्जत करते हैं...

कल का दिन रोचक था. शाम का समय था. सौभाग्य या दुर्भाग्य से पाओली डैम की फिल्म हेट स्टोरी देख रहा था. ट्रेलर देखकर ये जरूर यकीन था कि फिल्म नंगई की हद पार कर लेगी, लेकिन फिल्म के किरदारों की जुबान इतनी गंदी होगी, ये कतई नहींसोचा. ये माना कि सेंसर बोर्ड में काफी काबिल लोग बैठे हैं, उनमें कैची चलाने की काबिलियत है. लेकिन वो फिल्म में इस्तेमाल किए गए डायलाग्स पर कैची चलाने से क्यों झिझकते हैं, ये एक बड़ा सवाल है.

जब सन्नी लियोन के बहाने देश के नेशनल मैगजींस सेक्स जैसे विषय पर खुलकर बहसबाजी कर रही हैं, उसके बीच में शब्दों का ये खुलापन का खेल भी बड़ी शिद्दत से खेला जा रहा है. यकीन कीजिए कि तस्वीरों की मार से ज्यादा बोले हुए शब्द चोट करते हैं. और इस फिल्म में जिस तरह से चुनिंदे शब्दों का इस्तेमाल हुआ है, उसमें सिर्फ कान में रुई डालकर पिक्चर देखने का सिस्टम डेवलप करना होगा. हमारा फिल्मी तबका लीक से अलग हटकर फिल्म बनाने के बहाने इस कदर बदतमीज होता जा रहा है, ये इस फिल्म को देखकर अहसास होता है.

कहानी कुछ भी, बेसिर पैर भरे हों, लेकिन मानसिक दिवालियापन की हद को पार करता हर शब्द फिल्म में यूज होता जरूर दिखता है. इससे जहां दर्शक फिल्म देखने के बाद खुद को शर्मिंदा तो महसूस कराता ही है, साथ ही इस फिल्म को बनानेवाले तमाम उन व्यक्तित्वों के पेशेवराना अंदाज पर टेंशन भी लेता है कि ये बंदे पूरे देश की सोसाइटी की ऐसी की तैसी करने पर तुले हैं. सन्नी लियोन की कंट्रोवर्सी हो या पूनम पांडेय की. मीडिया से लेकर फिल्म बनानेवाले तक इसी कंट्रोवर्सी की आग में खुद को लोकप्रिय बनाने की होड़ में लगे हैं.

एडवर्टाइजमेंट तक में खुलापन अपनी चरम सीमा पर है. आप तस्वीरों से खेलिए. जो करना हो करिए. लेकिन दिमाग में शब्दों के सहारे गंदगी में फैलाइए. हेट स्टोरी का  एक डायलाग सुनिए-मैं शहर की सबसे बड़ी.... (अनुमान लगाइए). अब बताइए, ये रियलिटी दर्शाने के लिए कौन सा हथियार है. थोड़ा सोचिए, थोड़ा टेंशन दीजिए, कुछ तो करिए. शब्दों की जादुगरी करिए. कुछ ऐसा करिए कि वही किरदार क्लासिक होकर रह जाए. आइ एम रियली नाऊ हेटिंग

Monday, July 25, 2011

क्या आप उन अरुण शौरी जी को जानते हैं, जो पिता हैं...

अरुण शौरी की नई किताब ड.ज ही नो अ मदर्स हार्ट? के अंश दैनिक भाष्कर में छपने के बाद मैं खुद उनके जीवन के दूसरे पहलू से परिचित हुआ. अब तक हमारे जैसे लोगों ने उनके जीवन के उस उजले पक्ष को देखा था, जो दौड़ता है... राजनीति, पत्रकारिता और सामाजिक सरोकार की दुनिया में. लेकिन एक पिता अरुण शौरी के अंतरमन को समझने के लिए अखबार के एक पेज में छपे किताब के कुछ अंश ही काफी हैं. इतना ज्यादा दर्द और उस दर्द से ज्यादा बेटे अदित की जिंदगी को लेकर मन में होते उतार-चढ़ाव को जिस कदर शौरी साहब ने पिरोया है, वो किसी भी मजबूत व्यक्ति को भी विचलित कर देगा. अरुण सीधे उस पिता से, जो भगवान हैं, जिनके ऊपर हमारे जीवन को आधार देने का भार है, उससे सवाल करते हैं.  बेटे के जन्म के बाद वो सीधे इंडिया लौट आए थे. क्योंकि यहां परिवार जैसे बुनियाद अदित की सुरक्षा के लिए जरूरी था. उसके जीवन का संघर्ष बिना किसी के प्रेमाधार के नहीं चल सकता है. हमारे समाज में अपने आसपास आज कल ऐसे न जाने कितने पिता, बेटे या मां हैं, जो अपनों के अपनापन से दूर हो चले हैं. वैसे में अरुण शौरी के जिस तीखे व्यक्तित्व से हम टीवी के स्क्रीन पर रोज रू-ब-रू होते रहते थे, उस कठोर और तीखे तेवर के नीचे निर्मल भावना की ऐसी गंगा बहती होगी, ये मेरी समझ से परे थे. मेरे लिये अरुण शौरी अब एक ऐसे उदाहरण बन गए हैं, जिन्होंने आनेवाली पीढ़ी के लिए बतौर एक पिता उदाहरण पेश किया है. पिता होना एक जिम्मेदारी है. लेकिन उस जिम्मेदारी को सिर्फ जिम्मेदारी न मान कर अपना सर्वस्व समर्पित करने के उदाहरण काफी कम हैं. जो संन्यासी हिमालय में वर्षों तपस्या कर जो सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, वो सिद्धि तो अरुण शौरी बतौर पिता काफी पहले ही हासिल कर चुके होंगे. दैनिक भाष्कर में अदित और उनकी मां की बड़ी तस्वीर भावुक कर देती है. रुला देती है. ये कल्पना करना मुश्किल होता है कि इतना मासूम बच्चा डॉक्टर की लापरवाही या किसी और कारण से आनेवाले समय में इस कदर दर्द से छटपटाता रहा. एक ऐसा दर्द जिसे महसूस करने के लिए आपको भी उसी की जिंदगी जीनी होगी. हम अखबारों में ऐसे कई बच्चों के दर्द को रोज छापते हैं, जो किसी न किसी कारण से पिता या मां के उदासीन रवैये के शिकार रहते हैं. उन हजारों पिता और मां के दिल में दफन हो चुकी ममता की भावना रुला डालती है. मासूम चेहरे कई सवाल पूछ रहे होते हैं. मेरा एक दोस्त जब एक अनाथालय में गया, तो एक मासूम ने उसे उसको पिता से मिलाने को कहा. लेकिन हम उसका पिता कहां से लाकर देते. जीवन सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान नहीं है. ये वो भी चीज नहीं है, जो शायद जिंदगी न मिले दोबारा में दिखाई जाती है. जिसमें फरहान अख्तर का किरदार अपने पिता की खोज में स्पेन तो जाता है, लेकिन नसीरुद्दीन शाह का किरदार वाला पिता अपनी जिंदगी में मस्त दिखता है. वो सीधे कहता है कि वो न तो जन्म लेने के समय बेटे की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार था और अब न बड़े होने के बाद. यानी कि अपनी जिंदगी जिंदाबाद का नारा लगाते हैं. एक तरफ जहां वर्तमान फिल्में अपनी जिंदगी जिंदाबाद का नारा लगाते हुए सामाजिक बिखराव का संदेश दे रही हैं, वहीं अरुण शौरी जैसे लोग अपनी कहानी को पन्नों में समेट कर जिंदगी को दूसरे आईने से देखने को विवश कर देते हैं. रोज-रोज मरते रिश्तों के बीच, फरजी स्वयंवर रचवा कर शादी जैसे संस्थानों को मारते टीवी सीरियल्स के बीच और नारायण दत्त तिवारी के डीएनए टेस्ट जैसे मसले के बीच अरुण शौरी भगवान नजर आते हैं. एक ऐसा भगवान, जो तमाम तरह की व्यस्त जिम्मेदारियों के बीच अपने स्पास्टिक बेटा अदित पर अपना प्यार लुटाते हैं. उसे जीवन की हर खुशियां देते हैं. उसके हर पल को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं.
सबसे बड़ी चीज ये है कि हम आज कल अपने के अलावा किसी और की जिंदगी बेहतर बनाने की कोशिश ही नहीं करते. हमें टेंशन हो जाता है. ये टेंशन ही सोसाइटी को इस कदर मार रहा है कि मेट्रो में रहनेवाली मानसिक रूप से बीमार बहनों की सुधि लेने के लिए भाई नहीं आता और सोसाइटी में रहनेवाले तो माशाल्लाह अपनी जिंदगी में इस कदर व्यस्त हैं कि कोई मरे या जिये,उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. अगर फर्क लाना है, तो ड.ज ही नो अ मदर्स हार्ट?जरूर पढ़िए.

Sunday, June 19, 2011

मेरे पिता मुझे क्यों अच्छे लगते हैं.

मेरे पिता मुझे क्यों अच्छे लगते हैं. फादर्स डे पर अखबारों के पन्नों पर एक पिता को अपनी संतान को दुलारते देखना अच्छा लगता है. लेकिन कहीं मन का एक कोना उदास भी रह जाता है. खाली-खाली सा लगता है. पिता जी की कोई डांट, कोई फटकार या कोई जज्बात कभी मैंने सही में सीरियसली लिया ही नहीं. हमने ये देखने की कोशिश नहीं की कि वो मेरे लिये कितनी मेहनत करते हैं. क्या सोचते हैं? शुरुआती दिनों में ढेरों शिकायतें रहती थीं. अपने आसपास के माहौल को लेकर बगावती तेवर भी अख्तियार किया करता था. उन दिनों न तो इस फादर्स डे के बारे में पता था और न ही किसी मदर्स डे के बारे में. लेकिन पूरी जवानी ज्यों-ज्यों बीतते चली गयी, पिता के साथ अपने रिश्ते को समझना और भी आसान होता चला गया.
मैं अपनी नजरों के सामने उन बेटों को भी देखता था, जो अपने पिता को लगातार चलने के लिए सहारा देते रहते थे. लेकिन वैसे बेटों को भी देखता था, जिन्हें अपने बूढ़े पिता की कोई फिकर नहीं थी. पिता जी का रात को जाग कर अपने लौटने का इंतजार करते देखना भी मुझे टेंशन दे जाता था. मैं खुद सोचता था कि मेरे पिता आखिर मेरे लिये इतने फिक्रमंद क्यों हैं? क्या उन्हें मेरे ऊपर विश्वास नहीं है? लेकिन जब दो बेटियों का पिता बना, तो अब सारी बातें पानी का तरह साफ होती जा रही हैं.कल बेटी ने उंगली में चोट लगा ली, तो अपने अंदर का पिता तड़प उठा. ऐसे में मैं अब अपने पिता की तड़प को भी साफ महसूस कर सकता हूं. मेरे पिता मेरे लिये हमेशा मार्गदर्शक बने रहे. वैसे हर व्यक्ति के लिए उसके पिता आदर्श रहते हैं, चाहे वो किसी भी रूप में क्यों न हों. पिता की स्नेह भरी एक थपकी के लिए न जाने कितने बच्चे तरस भी जाते हैं. कई पिता ऐसे भी हैं, जो बेटे को आशीर्वाद देने के लिए तड़पते रहते हैं. ओल्ड एज होम में कई वृद्ध पिता बेटे को याद कर रोते रहते हैं. उन्हें उनके बेटे अकेले छोड़ अपनी पत्नी और बच्चों के साथ निकल जाते हैं. ओल्ड एज होम में मौन धारण कर मौत का इंतजार ही उनके भाग्य में रह जाता है. वैसे ऐसे बेटों के लिए सोसाइटी के पास कोई सवाल नहीं होता. सिर्फ बातें बनाने के लिए उनके पास हजारों घंटे होते हैं.
हमारा समाज कभी पिता दिवस या माता दिवस के लिए तैयार भी नहीं हो सका. वैसा माइंड सेट नहीं बना. कभी भी ये नहीं सोचा कि इसे मनाने की जरूरत पड़ेगी. कल्पना कीजिए आनेवाले समय में कहीं पत्नी या पति दिवस न मनाया जा ने लगे. वैसे ये बाजार हमसे-आपसे कुछ भी करा सकता है. जैसे कि मैं फादर्स डे के बहाने आपसे बात जो कर रहा हूं.वैसे ये बात करना भी जरूरी है. बात नहीं करूंगा, तो स्याह होती जा रही अपनी भारतीय सोच को मैं कैसे उजला कर सकता हूं. लाख दावे कर लूं, लेकिन मुझे अपने आसपास के बदलते सामाजिक समीकरण से भी डर लगता है. कई बुजुर्गों को शहर में यूं ही भटकते देखना भी मन में टीस दे जाता है.
शर्म आती है अपने उन तथाकथित समृद्ध बेटों पर, जो सबकुछ रहते, अपने पिता या अपने काका को शहर की स़ड़कों पर भटकता छोड़ देते हैं. आज तक न तो इस तो देश के लोगों को गांधी बदल पाये और न ही बाबा रामदेव. अपना भेजा कभी भी वैसे भी इन टुच्चे गणित में नहीं लग पाया. मैं ये कभी हिसाब भी नहीं लगा पाता हूं कि पिता या अपने किसी काका को यूं ही बिना हालचाल लिये खुद के हालात पर छोड़ दूं. पिताजी के लिए मेरे दिल में जो अरमान हैं, वो यही हैं कि वो जब तक रहें, उनका आशीष बना रहे. ऐसे में हैप्पी फादर्स डे टू यू आल.

Saturday, May 7, 2011

ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की मूरत क्या होगी,

आसमान में एक तारा होता है ध्रुव तारा. वैसे ही जिंदगी में मां एक ही मिलती है. मां तो सबके लिए अच्छी होती है. पता नहीं क्यों, कुछ लोगों को बुढ़ापे में मां पसंद नहीं आती. मैं मां को तब से याद करता हूं, जब मां के पास खेलकर आने के बाद खाने की मांग किया करता था. ग्रैजुएशन तक मां के बिना जिंदगी की कल्पना नहीं करता था. शादी हुई बच्चे हुए. लेकिन अब भी उसके हाथों से एक प्याली चाय की जिद जुबां पर आ ही जाती है. लोग लाख मन मार कर मुंह फेर लें, लेकिन जब किसी दर्द का अहसास होता है, तो पहला शब्द मां की निकलता है. मां सिर्फ जन्म देनेवाली ही नहीं होती. मां तो वो भी होती हैं, जो लावारिस हो चुके नवजात को अपने सीने से चिपका ताउम्र साथ चलने का वादा करती हैं. ऐसा वादा, जिसे सामान्य आदमी नहीं निभा सकता. सिर्फ मदर्स डे पर ही मां को कितना याद करूं. सुबह से लेकर रात तक मां का साथ जेहन में बना ही रहता है. एक मां, वो शक्तिस्वरूपा भी है, जिसकी ममता की छाया हर पल बरसती रहती है. अपनी इस छोटी जिंदगानी में मां के न जाने कितने रूप देखे हैं. लेकिन दीवार फिल्म में अमिताभ और शशि के बीच का संवाद-मेरे पास मां है, इतने गहरे पैठ गया है कि अब भुलाये नहीं भूलता.ये सारा पैसा, ऐश्वर्य मां के प्यार पर लुटाने को तैयार हूं. मां तो बस एक ही है. उसे आप चाहे जिस रूप में लें. मां तो शक्ति है. क्षमा स्वरूपा है. मां समर्पण का दूसरा नाम है. एक मां फटी साड़ी में भी बच्चे को स्कूल भेजने को तत्पर रहती है. अगर संतान को चोट लग जाए, तो उसकी आंखों से आंसू छलक आते हैं. मां के इस दिवस पर हम नारी जाति के प्रति सम्मान जाहिर करते हैं, लेकिन ये सम्मान हर परिस्थति में बरकरार रहना चाहिए. वैसे मां के लिए दो शब्द-ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की मूरत क्या होगी, क्या होगी. मैंने नहीं देखा है कहीं...ो

Thursday, April 28, 2011

ये प्यार जानलेवा है..

एक लड़की जिसे पढ़ने के लिए गार्जियन कालेज भेजते हैं, किसी ऐसे दीवाने का शिकार हो जाती है, जिसके साथ वो नहीं जीना चाहती. मामला एकतरफा प्यार का हो या प्यार का. जो ट्रेंड चल पड़ा है, उसमें जान देने और लेने का जुनून सवार है. दुनियादारी में आने से पहले ही इश्क का जुनून इस कदर हावी हो जा रहा है कि दिल और दिमाग को युवक-युवतियां हाशिये पर रख दे रहे हैं. जिस किरदार को शाहरुख खान ने अपने फिल्म डर में जिया था, वो असल में २० साल के बाद आधुनिक जीवनशैली के कारण सच्चाई में तब्दील होता जा रहा है. बच्चे सच्चे प्यार की तलाश में रहते हैं. टीवी सीरियलों और फिल्मों में दिखाए जानेवाले एक ऐसे आदर्श प्यार की तलाश में जो कभी संभव नहीं है. बनते-बिगड़ते रिश्तों की दुनिया में कब कौन किस परिस्थिति में रहता है या रहेगा, हम नहीं जानते. कल रांची शहर के संत जेवियर्स कालेज में घटी लोमहर्षक घटना ने सामाजिक चिंतकों को सोचने को विवश कर दिया है. जो मरा और जो मारी गयी, दोनों के परिवारों में मातम का माहौल है. एक के बेटे ने खुद को बर्बाद कर दिया, तो दूसरे परिवार की खुशियां चली गयी.युवक ये नहीं सोचते हैं कि जिस प्यार की तलाश में वे हैं, उसमें त्याग और समर्पण की मांग होती है.कभी किसी बुजुर्ग दंपति को साथ-साथ चलते देखिये और उनसे उनके लंबे दांपत्य जीवन का राज पूछिए, तो वे अपने जीवन में संघर्ष के दौरान की जिंदगानी को सामने परोस देंगे. कैसे वे एक-दूसरे को हर कमजोर पल में साथ निभाते चले गए. ये प्यार का कातिल जुनून सिर्फ रांची तक नहीं है, बल्कि ये दिल्ली में भी कायम है. इसी जुनून में प्रेमी अपनी तथाकथित प्रेमिका का लंबे समय तक पीछा करता है. इसके बाद भी तथाकथित प्रेमिका के घरवाले पुलिस में इसलिए शिकायत नहीं दर्ज कराते हैं कि उनकी इज्जत पर बट्टा लग जाएगा. इज्जत बचाने की कोशिश में अंत में उन्हें वो चीजें देखनी पड़ती हैं, जिसकी वे कल्पना नहीं कर सकते थे. रांची में खुशबू की नानी युवक को शायद सुबह से कैंपस में मौजूद देख रही थी. उन्हें उसके द्वारा पीछा करने की भी पूरी जानकारी थी. लेकिन इसके बाद भी उन्होंने पुलिस को सूचना नहीं दी और युवक खुशबू को मारने में कामयाब रहा. समाज में लोग झूठी इज्जत की चादर ओढ़ अपने बेटियों की जान को दांव पर लगा दे रहे हैं. वक्त टीनेजर्स के बीच प्यार के मुद्दे को लेकर बहस चलाने का भी है, जिससे कम से कम उस राह पर जाने से बच सकें, जिस पर चल निकलना को आसान है, पर लौटना मुश्किल.

Thursday, April 14, 2011

गजब की सोसाइटी है भाई आपकी.

चलिए भाई.. अब आप सेटल हो गए हैं. सुबह नौ बजे से पांच बजे तक नौकरी. पांच से नौ बजे तक मियां-बीबी और बच्चा. फिर सो जाना. यही है सेटलमेंट..है ना. बगल में कौन रहता है...पता नहीं. अगर पूछ लें.. दरवाजा भिड़का के डपट डालेंगे. आप हाई सोसाइटी के लोग.
शायद आप भी उसी नोएडा के इलाके से आते हों, जहां बहल बहनें अनुराधा और सोनाली रहती थीं. गजब की सोसाइटी है भाई आपकी. सड़कें तो चकाचक हैं ही, आप लोग भी कम स्मार्ट नहीं है. आगे बढ़ने के लिए खुद को झोंके हुए हैं. फुर्सत ही नहीं है कि बगल के घर में कोई मर रहा है या जी रहा. वैसे कोई बोल भी देगा, तो आप बोलियेगा... क्या तेरा कुछ जाता है क्या? माइंड योर जाब.वैसे हम लोगों को ज्यादा अंगरेजी आती नहीं, इसलिए चुप रह लेंगे.
वैसे कहते दिल्ली दिलवालों की है, लेकिन नोएडा तो दिल्ली नहीं है न. हां.. याद आया यूपी में पड़ता है. इसलिए दिल को काट कर फेंक दिया.नोएडावाले गजब के मेहनती हैं. मशीन जैसे मेहनत करते हैं. इमोशन किसे कहते, नहीं जानते. क्या यार हम भी इमोशनल हो गए.
वैसे एक ही शब्द निकल रहा है, सारी...((

Sunday, March 27, 2011

ब्रेक अप के समय लड़की गरियाती है-गो टू हेल

पारो... ओ पारो तू चली गयी क्य... मैं तेरे बिना कैसे जीऊंगा.....पारो... मैं मर जाऊंगा. मिट जाऊंगा. जब देवदास इस डायलाग के साथ अपने दिल पर हाथ रखता है, तो न जाने कितने आंसू बेधड़क बह निकलते हैं. पारो का भी रो-रोकर बुरा हाल रहता था. ये किस्सा सात साल पहले तक चल रहा था. इस पर फिर से फिल्म रीमेक की गयी. ऐश्वर्या और माधुरी दीक्षित के साथ शाहरुख ने यादगार अभिनय किया. उस समय शरतचंद्र के पारो और देवदास पर न जाने कितनी बातें होती रहीं. लेकिन जमाना बदला, रंग बदला और बदल गया अंदाज. आज की पारो रोती नहीं और न ही आज का देवदास तड़पता है. 

अभी कोई एक एड आता है, तो उसमें ब्रेक अप का सीन आता है. लेकिन उस सीन में तड़प नहीं है. वो दर्द नहीं है. इस ब्रेक अप में मस्ती का अहसास रहता है. ब्रेक अप के समय लड़की गरियाती है-गो टू हेल और दरवाजा बंद कर लेती है. लेकिन लड़का यानी ब्वाय फ्रेंड डांस करता है. नई शुरुआत की बात करता है. हमारे एड में दिखायी जा रही बातें सोसाइटी में आ रहे बदलाव की ओर इंगित करती हैं. ये दिखाती हैं कि हमारे यहां रिश्तों को लेकर जो एक भावनात्मक लगाव था, वो अब नहीं रहा.  

कल एक बंदे से बात हो रही थी. उसने अपने लेख में जनसंख्या वृद्धि पर चिंता जतायी. हमने भी कहा-आपकी बात सही है. लेकिन रिश्तों के इस बदलते दौर में बदलते ट्रेंड की ओर भी गौर करें. कन्याओं की घटती संख्या पर गौर करें. उपभोक्तावादी होते जा रहे हमारे नजरिये की बातें करें. साथ ही बातें करें हमारे स्व केंद्रित होते जा रहे युवाओं की. सही में कहें, तो हमारे यहां दस में छह युवा शादी के बाद या तो बच्चे नहीं चाह रहे और चाह भी रहे हैं, तो एक या दो. ऐसे में जो जनसंख्या वृद्धि का दौर है,वह कल को जरूर धीमा होगा. बुआ, मौसी के रिश्तों की आंच जरूर धीमी होगी. आज का ऐसे में ब्रेकअप पर आनंद उठाते बंद को देखना थोड़ा मजा जरूर देता है, लेकिन सोसाइटी के खतरनाक संकेत की ओर भी इशारा करता है. हम नई शुरुआत की चाह में ऐसा कर रहे हैं कि हमारा सिस्टम ही ब्रेक करता जा रहा है. 

जब ओल्ड एज होम घूम कर आए मेरे दोस्त बताते हैं कि कैसे एक दादा की आंखें पोते की राह ताक रही हैं, तो आंखों में आंसू छलछला उठते हैं. ये देश रिश्तों के मामले में अमीर रहा है. भले ही वह देवदास या पारो की हो या हीर-रांझा की. यहां भावना यानी इमोशन की कद्र होती रही है. लेकिन हम प्रोफेशनल होते जा रहे लोग, हर चीज को प्रोफेशल एंगल से ही देख रहे हैं. 

मेरे लिये तो इस छोटी सी जिंदगी में रिश्तों की उतनी ही चाह और तड़प है, जितना खुद को जिंदा रखने की कोशिश है. मैं खुद चाहता हूं कि मेरा हर रिश्ता कुछ खास हो.अपने बच्चों में भी रिश्तों की अहमियत की तड़प देखना चाहता हूं. एक साथी साइकोलाजिस्ट चिंता जताते हैं कि आज कल लोग क्यों ज्यादा से ज्यादा पाना चाहते हैं. क्योंकि आधी जिंदगी जब टेंशन में भी ही तबाह हो जाएगी, तो कमाया हुआ कब काम देगा. मामला थोड़ा फिलासफिकल है, लेकिन सोचनेवाला है. वैसे क्या कोई समझानेवाला है?

Sunday, February 20, 2011

मुझे इस शहर में बेगानेपन का अहसास घरने लगा है.


आज-कल एक असीब से द्वंद्व से गुजर रहा हूं. ये द्वंद्व शायद उन तमाम लोगों के मन में भी जरूर मौजूद होगी, जो सामाजिक सरोकारों के बीच मरते समाज को लेकर चिंतित हैं. मेरे लिये, मेरे सहकर्मियों के लिए और मेरे तमाम साथियों के लिए ये द्वंद्व रुलाने वाला है. साथ ही ये चिंता देनेवाला भी है कि हमारा समाज सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट की तर्ज पर काम कर रहा है. दो-तीन दिन बीते होंगे, एक खबर आयी कि रांची में एक आईएफएस की मौत हो गयी. उनकी दिमागी हालत भी पिछले कई सालों से खराब थी. सबसे जो गौर करनेवाली बात थी, वो ये थी पत्नी उन्हें छोड़ मुंबई में रहती हैं. ऐसे ही कुछ दिन पहले रांची की एक प्रोफेसर की तन्हाई ने जान ले ली. उनके दोनों बेटे रांची से बाहर बेहतर नौकरी में हैं. प्रोफेसर भी नौकरी में थीं. कुछ साल और बचे थे. फिनांसियल तौर पर भी कोई प्राब्लम नहीं था. इन सारे हालात के बीच भी मौत को गले लगाना मुनासिब समझा. यहां गौर करनेवाली बात ये है कि यहां पर दोनों व्यक्ति बौद्धिक स्तर पर जीनियस की भूमिका में थे. सोसाइटी के ऐसे तबके से संबंध रखते हैं , जहां से सोसाइटी के लिए बदलाव की दिशा तय होती है. लेकिन पारिवारिक स्तर पर वे एकाकी हो गए थे. जिंदगी के कठिनतम दौर में उन्हें देखनेवाला कोई नहीं था. ज्यादा दिन नहीं गुजरे राम टोप्पो को लेकर फेसबुक पर अपील की. कुछ लोग मदद को आए, लेकिन जैसे कमेंट्स की उम्मीद थी, वैसी न आयी. मैं यहां आज के सिस्टम को गाली नहीं दूंगा, क्योंकि ये सिस्टम हमारी ही बनाया हुआ है. मेरे मन से गाली उस समाज के लिए निकल रही है, जिसमें मैं रहता हूं. मैं जिस समाज में रहता हूं, वहां जिस रफ्तार से स्वकेंद्रित होने की ट्रेंड चल पड़ा है, उस ट्रेंड को गाली देने की इच्छा होती है. हमारे युवा साथी अपने ही संसार में इतने मस्त हैं कि उन्हें ये देखने की फुर्सत नहीं मिल रही है कि आसपास क्या हो रहा है. रांची जैसा शहर जो पहले अपनी हरियाली के लिए जाना जाता था, आज मरते समाज के शहर के रूप में अपनी पहचान बना रहा है. मुझे इस शहर में बेगानेपन का अहसास घरने लगा है. ये शहर पहले अपना सा लगता था. सुजाता से लेकर अल्बर्ट एक्का चौक तक में २० साल पहले उतना दबाव नहीं महसूस करता था, जितना आज महसूस करता हूं. तेज रफ्तार से भागता शहर डरा रहा है. इसके फैलाव का अंदाजा भी भयभीत कर देता है. लेकिन इस फैलाव ने जिस सूनापन को बढ़ाया है, उससे मन की तड़प बढ़ती जा रही है.

Saturday, February 19, 2011

जब तक जवानी है, सुंदरता है

फिल्मों की हीरोइनों को देखकर कई लोगों को नैन मटकाते हुए देखता हूं. हमारे भी होते हैं. लेकिन इसे अब माया मान आगे बढ़ जाता हूं. हमारी जिंदगी की गाड़ी इन्हीं के आसपास भटकती भी रहती है. न जाने कितने उपन्यास लिख डाले गए. कितने कांडों को इसी सुंदरता को हथियार बना कर अंजाम दे दिया गया. सबके नजरिए में लेकिन सुंदरता के अलग-अलग रूप होते हैं. सवाल ये है कि हम किसे महत्व देते हैं, मन की सुंदरता या तन की सुंदरता. वैसे इस मायानगरी में सबसे ज्यादा महत्व तन की सुंदरता को ही मिला है. अपने आसपास देखता हूं, तो पाता कि कई बुद्धिजीवी और टैलेंटेड लोग इसी के चक्कर में बौराए फिरते हैं. अब फेसबुक को ले लिजिए. कोई लड़की किसी खूबसूरत चेहरे को चिपका कर अपने दोस्तों की संख्य चार हजार तक कर लेती है. उसके पास फ्रेंड रिक्वेस्ट की बाढ़ सी आ जाती है. हमें आज तक कोई ऐसा फरिश्ता नजर नहीं आया, जो इस माया से बचने का उपाय बता सके. पश्चिमी देशों में जिस छरहरी काया के प्रति दीवानगी रहती है, हमारे इंडिया में उसे लेकर लोग नजरें फेर लेते हैं. हां, दो-चार केसेस में इस बात को मान्यता मिल जाती है, लेकिन ज्यादातर मामलों में छरहरी काया को तवज्जों नहीं दिया जाता. वैसे ये सुंदरता भी बस समय के फेर पर निर्भर करता है. जब तक जवानी है, सुंदरता है. जिस दिन जवानी गयी, झुर्रियों से पूरा चेहरा भर जाएगा. इसलिए सुंदरता के चक्कर में फंसने से पहले होश संभालना जरूरी है. कई सुंदर चेहरे मन से सुंदर हो सकते हैं, लेकिन वे सुंदर होना नहीं चाहते. इस कारण सोसाइटी का जो हाल हो रहा है, वह हम-आप देख सकते हैं.  

Tuesday, February 15, 2011

इस हड़बड़ी को रोकना जरूरी है..

कल ही की बात थी, फेसबुक पर कमेंट्स और स्टेटस के जरिये इजिप्ट में आंदोलन की बड़ी इमारत खड़ी कर दी गयी. इतनी बड़ी की उसमें मोबारक साहब की गद्दी चली गयी. ट्यूनीशिया में भी कुछ ऐसा ही सीन है. इंटरनेट क्रांति का दूसरा स्वरूप बनता जा रहा है. कश्मीर में भी लोगों ने अपने जज्बातों को फेसबुक पर डाल दिया. इसे लेकर भी विवाद हुआ. सारा कुछ इतना ओपेन है कि इस वाइड स्पेस को हम इनफिनिटी के तौर पर देख सकते हैं. अंतरिक्ष में जैसे ब्लैक होल का कांसेप्ट है, वैसा ही कांस्पेट हमारे विचार से इस तंत्र को लेकर है. इसकी जड़ें चाहें जितनी भी बड़ी क्यों न हो, इसकी गहराई की सीमा का अंत नहीं होगा.

मृणाल जी का पिछले दिनों एक लेख भी पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने इन नेटवर्किंग साइट्स, ब्लाग्स और फिल्मों के लगातार उन्मुक्त होते जा रहे मामले पर चिंता जतायी है. हम जानते हैं कि पहले का साहित्य और सृजन एक अनुशासन लिये होता था. उसका एक व्याकरण होता था. लेकिन आज के वाइड स्पेस में बातों को जल्दी से जल्दी कह देने की इतनी हड़बड़ी है कि सारी बातें गौण हो चली हैं. मृणाल जी ने कहा कि गाली का हम तब ही प्रयोग करते हैं, जब हमारी तर्क की शक्ति खत्म हो जाती है. लेकिन आज कल के लोग तर्क क्यों नहीं करते? ये एक बड़ा सवाल है. सवाल इतना बड़ा है कि इसे लेकर तमाम समाजशास्त्रियों की फौज भी उसे सुलझा नहीं सकती. क्योंकि जिस बुनियाद पर इन सवालों को खड़ा किया गया है, वो आज की तारीख में काफी बड़ी हो गयी है. ज्यादातर लोग ये नहीं सोच रहे हैं कि आज कल की पब्लिक को अपने जज्बातों को बयां करने की इतनी हड़बड़ी क्यों है. ऐसा नहीं है कि पहले क्रांति नहीं हुई होगी. बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और तमाम परेशानियां पहले भी थी, लेकिन आज इन बातों को लेकर एक हड़बड़ी है. मोबाइल में भी दस शब्दों को बदले एक शब्द में एसएमएस कर काम चलाया जा रहा है. इतनी जल्दबाजी है, जैसे लगता है कुछ छूट रहा है. जो जितना शार्ट है, उतना पसंदीदा है, जैसे ट्विटर. ऐसे में लोग तर्क करने के बदले गाली या निगेटिव शब्दों का इस्तेमाल कर अपने जज्बात का इशारा कर दे रहे हैं.

अब सोचिए कि आखिर इस शार्ट हो जा रही प्रक्रिया का परिणाम क्या होगा. ब्रिटिश राज में खड़ा किया गया सिस्टम अगर हमारी डेवलपमेंट का आधार है, तो हमारे यहां खड़ा किया गया सिस्टम वैसा क्यों नहीं हो रहा. हमारे यहां भी वैसी ही हड़बड़ी है. लोग गलत तरीके से ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने की जुगाड़ में भिड़ गए हैं.
ऐसी हड़बड़ी है कि हमारे यहां घोटाले ही घोटाले हो रहे हैं. इस हड़बड़ी को रोकना जरूरी है. नेटवर्किंग साइट्स, ब्लाग्स या फिल्मों में सृजन के समय में थोड़ा अनुशासन होना जरूरी है.

आमिर के फिल्म सबजेक्ट लिये रहते हैं, क्योंकि वे हड़बड़ी में नहीं बनाए जाते हैं. लेकिन जब कोई दूसरी फिल्म जैसे नो वन किल्ड जेसिका बनायी जाती है, तो उसमें बिंदास और बेबाक पत्रकार को गाली बकते दिखाया जाता है. हमारे हिसाब से पत्रकारिता में भी ऐसी गाली बकती पत्रकार को सफल होते कम ही देखा जा सकता है. ऐसे में जिस मैसेज को फिल्मों में दिखाया जा रहा है, वह भी किसी करियर या सोसाइटी को निगेटिव रूप दिखा रहा है. ऐसे में हमारे समाज को ज्वालामुखी पर खड़ा करने की कोशिश हो रही है.

पढ़ाई में प्रेशर के नाम पर मार्किंग सिस्टम को खत्म किया जा रहा है. जाहिर है कि हमारा सिस्टम आराम से काम करने या तनाव खत्म करने पर जोर दे रहा है. ऐसे में वह चीजों को आसान बनाते हुए उसे इतना फास्ट बना रहा है कि बिना किसी तरह की तंगी लिये फटाफट स्टूडेंट बाधा पार कर ले. इसमें भी एक हड़बड़ी है. आखिर हमारी सोसाइटी के भीतर धीरज क्यों खत्म हो रहा है. इसे लेकर चिंतन करने की जरूरत है. दुनिया कितनी भी फास्ट हो, लेकिन इंडिया कम से कम इतना फास्ट न हो जाए कि संभलने का वक्त ही निकल जाए.

Monday, January 31, 2011

क्या हमारे सामने इन सवालों को लेकर कोई जवाब है...

ख्वाहिशों की लंबी लिस्ट हमारे पास है. रोज सुबह उठने के बाद काम पर आने के बाद उस लिस्ट में किसी एक चीज को पाने का मन करता है. अगर शाम तक वो चीज नहीं मिलती है, मन मसोस कर रह जाता हूं. उन ख्वाबों में एक ख्वाब बेहतर समाज रचने या बेहतर समाज में जीने का भी है.

हाल में एक रिपोर्ट आयी थी, जिसमें फेसबुक में आइ हेट गांधी ग्रुप बनाकर लोग बापू के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर रहे थे. उनके पास लाख दलीलें हैं. हजारों कारण हैं बापू के प्रति विरोध जताने के. कई लोग इसके बारे में विरोध जताने पर उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हैं.

जाहिर तौर पर इन युवाओं के पास आज के समाज को बेहतर बनाने के लिए खुद के लिए कोई नीति नहीं है. वे अतीत में बनायी गयी परंपराओं और आधार में अपना रास्ता तलाश रहे हैं. ऐसे में बदलते वक्त ने उस सारी परंपराओं के मायने तो बदल ही दिये, आज के युवाओं के लिए अतीत में दिखाए मार्ग को भी अवरुद्ध कर दिया है. सूचना क्रांति के इस दौर जब हर चीज दो दिन में पुरानी हो जा रही है. आंदोलन फेसबुक और टिवटर के सहारे दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने में पहुंच जा रहा है, उस दौर में आज के युवाओं के पास सबसे बड़ा प्रश्न खुद के लिए मार्ग या आधार तय करना है.

आज के युवा खुद के लिए मार्ग नहीं बना पा रहे. उनके पास कहने को हाई सेलरी और फ्लैट हैं, लेकिन घर नाम की चीज नहीं है. फेसबुक पर ही नारी स्वतंत्रता की बात करनेवाले कई बंदे, असहज होती जा रही कई परिस्थितियों के बारे में बातें करना पसंद नहीं करते. वहां पर आप मजाक करनेवाले कमेंट्स करें. कोई टिप्पणी छोड़ दें, तो कमेंट्स मिल जाएंगे. लेकिन अगर आप कोई सार्थक बहस शुरू करें, तो कोई रिस्पांस नहीं मिलता. ज्यादातर लोग टाइमपास के लिए ही इस मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं.

मैं रोज अपने आसपास गुजरते जवान लोगों में हजारों सवाल देखता हूं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल उनके मन में भविष्य की सुरक्षा को लेकर रहता है. यहां झारखंड में नेशनल गेम्स हो रहा है. यहां के जिस मस्कट को स्टेडियम में खड़ा किया जा रहा है, उसमें नेशनल गेम्स २००९ लिखा हुआ है. ऐसे में २०११ में लग रहे उस मस्कट के सहारे ही हम अपने राज्य, समाज में प्रगति को लेकर जिम्मेवारी के बारे में समझ सकते हैं. घोटालों में घोटाला के अभ्यस्त हो चुके हम लोग कोई नई व्यवस्था नहीं रच रहे. हमारे पास अपनी कोई योजना नहीं है.

मिस्र और दूसरे देशों में आंदोलनों से पूरी दुनिया में हलचल है, लेकिन हमारे यहां आज भी १९७४ का ही राग अलापा जा रहा है. हमने आजादी के संघर्ष से आगे किसी नए संघर्ष का सपना नहीं देखा. आजाद ख्यालात के तो हुए, लेकिन नई विचारधारा को आवाज नहीं दे पाए. आज के युवा उसी शून्य की मार झेल रहे हैं. उनके पास अपना कोई ऐसा आधार नहीं है, जिस पर वे अपनी सोच की दीवार खड़ी कर सकें. ऐसे में फेसबुक पर ग्रुप बनाकर जब वे महात्मा गांधी के खिलाफ भड़ास निकाल रहे होते हैं, तो मन खुद को ही गाली देता है. मशीन होती जा रही हमारी जिंदगी हमें कहीं का नहीं छोड़ रही.

रांची जैसे छोटे शहर में युवा आवारगी की सारी हदों को पार करते दिख जाएंगे. कोई घर आए बुजुर्ग की जान ले रहा है, तो कोई सड़क पर सरपट दौड़ती गाड़ियों में रोमांच की खोज कर रहा है. आज के युवा आर्मी में कम से कम जा रहे. वो देश प्रेम का जज्बा कायम नहीं रहा. क्या हमारे सामने उठ रहे इन सवालों को लेकर कोई जवाब है. शायद नहीं...

Tuesday, January 4, 2011

कौन सा नया साल, किसके लिए नया साल.

ये नया साल आ गया, सारे लोग बधाई दे रहे हैं. हमें भी अच्छा लगता है. सबको बधाई फिर से. पुराने साल के खत्म होने की खुशी कुछ इस तरह रहती है, जैसे कि कोई नई चीज एकदम से हाथ में आ गयी हो. दो शब्दों में कहूं, तो मेरा मन इससे सामंजस्य नहीं बैठा पाता. नयापन हमारी जिंदगी में आ जाता है क्या, ये सोचनेवाली बात है.

नयेपन के नाम पर बेहयाई का नंगा नाच करते लोग कुछ जंचते नहीं. पहले जिन मेट्रो कल्चर को लेकर हायतौबा मचती थी, वो तो अब आपके छोटे शहर को भी संक्रमित कर रही है. बड़ा डर लगता है.

हाल में आईनेक्स्ट अखबार में एक स्टिंग में इस बात का खुलासा हुआ था कि रांची जैसे शहर में कैसे बेशर्मी का नंगा नाच पैसे के बल पर खेला जा रहा था. हम एक बात बेलाग होकर कह सकते हैं कि अब भारतीय समाज सेक्स और कंडोम जैसे शब्दों से ऊपर उठ गया है. जब छोटे-छोटे बच्चे शीला की जवानी पर धड़ल्ले से डांस कर रहे हैं और जहां हर व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति से दूरी लगातार बढ़ती जा रही है, वहां पर आवारगी का आनेवाले दिनों में कैसा आलम होगा, ये सोच सकते हैं.

कहने का मतलब यह है कि हम कैसे नयापन ओढ़ रहे हैं. विकास की किस अवधारणा को अमलीजामा पहुंचा रहे हैं.इन्हीं सब परिवर्तन के बीच में कई लोग ऐसे भी हैं, जो चर्चा का विषय बने हुए हैं. ये चर्चा उनके अपने बेहतर काम के लिए है. रांची के रिम्स में बतौर हार्ट स्पेशलिस्ट डा. हेमंत नारायण रे मरीजों की दिन-रात सेवा में लगे हुए हैं. रांची जैसे शहर में, वो भी सरकारी अस्पताल में, बाहर के किसी बेहतर संस्थान से आकर सेवा देना किसी त्याग से कम नहीं है. हड़ताल के दिनों में भी डा. रे की मेहनत हर ओर चर्चा का विषय बनी थी. रांची कालेज अंगरेजी डिपार्टमेंट का उसके एचओडी डा. एसके त्रिपाठी द्वारा खुद के पैसे से उद्धार करना भी आपको चकित कर देगा. जब सरकार से प्रार्थना करते हुए प्रोफेसर साहब थक गए, तो उन्होंने खुद के पैसे से डिपार्टमेंट का कायाकल्प कर दिया. ऐसे ही रांची स्थित चाइल्ड लाइन के एनके ता बेसहारा लोगों के लिए भगवान साबित हो रहे है. और भी कई लोग हैं, जो कि रांची जैसे छोटे शहर में अपनी छाप छोड़ रहे हैं.

हर छोटे  शहर में कई लोग समाज में अपने कर्मों से नयापन ला रहे हैं. हमारे अखबारों में कंटेंट के नाम पर जहां सनसनी और हाई प्रोफाइल रिपोर्टिंग को जगह मिल रही है, उसमें ऐसे लोग नजरअंदाज कर दिए जा रहे हैं. लेकिन ऐसे लोग सोसाइटी में नया बदलाव ला रहे हैं. इनके लिए जरूर नया साल नयापन लिये रहता है, क्योंकि इन्होंने खुद के साथ दूसरों की जिंदगी बदल दी है. इस साल इसी कारण मैं नए साल पर खुल कर बधाई नहीं दे पाया. एक दिन की छुट्टी मिली भी तो घर पर सोने में बिता दिया. कौन सा नया साल, किसके लिए नया साल. जिस दिन खुद के दम पर चार लोगों की भी जिंदगी बदल दूंगा, उसी दिन से मेरे लिये नया साल शुरू हो जाएगा.

Wednesday, July 28, 2010

छोटे शहरों में रिश्तों के खत्म होने की कहानी

रिश्ते तो बनते बिगड़ते रहते हैं. रिश्ते कई प्रकार के होते है, जिसमें कुछ अच्छे, तो कुछ बुरे. रिश्ते अगर सीमा के अंदर बनें, तो अच्छे लगते हैं. सीमा को पारकर बनें, तो चोट पहुंचाते हैं. छोटे शहरों में रिश्तों के खत्म होने की कहानी तनाव पैदा कर रही है. आदमी अपनी पत्नी,बच्चों या मां-बाप के प्रति वफादार नहीं रह रहा. बेटे-बेटियों को माता-पिता की परवाह नहीं रह रही. रिश्ते अनजानों से बनते हैं. वे अनजाने ज्यादा अपने लगते हैं बनिस्पत की दूसरों के. रिश्तों के कत्ल की कहानी हाल के साल में शायद निरूपमा के मामले से ज्यादा बनती नजर आती है. जहां माता-पिता पर ही बेटी की खुशियों को रौंद देने का आरोप लगा. पटना में पत्नी ने अपने पति का ही कत्ल करा डाला. मारे गएपति पर वैसे ही गलत किस्म का रवैया रखने का आरोप लग रहा है. पहले लोग इन घटनाओं को बड़े शहरों की बड़ी बातें कह कर टाल देते थे. लेकिन आज ये छोटे शहरों की कहानी बनती जा रही है. छोटे शहर अपनी मर्यादा खो दे रहे हैं. ये तरक्की की कहानी है या और कुछ पता नहीं. लेकिन अगर सही में कहें, तो जिंदगी के तबाह होने के निशान मिलने लगे हैं. रांची में पं बंगाल का युवक मारा जाता है. लव मैरिज की हुई उसकी विधवा को ये नहीं पता होता है कि उस युवक का घर कहां है. जाहिर है कि घरवालों से युवक कटा होगा और खुद की मर्जी की जिंदगी जी रहा होगा. स्वच्छंद जीवन जीने की चाहत बुरी स्थिति पैदा कर रही है.पहले फिल्मों में जमाने से बगावत की बात अच्छी लगती थी. लेकिन आज बगावत नहीं, होश संभालने की स्थिति आन पडी है. समाज को संतुलन न बिगड़े, इसके लिए पहल कौन करेगा, ये सवाल है. सोशल साइट्स पर बहस, बतकही और चिरकुटई से कोई क्रांति नहीं आ जाएगी. वैसे में ये छोटे शहर के लोग कैसे खुशी का जीवन जीएंगे, ये सबसे बड़ा सवाल है.

Tuesday, June 29, 2010

जिस समाज में नयी सोच का उभरना खत्म हो जाता है, वो मरने लगता है

जिस दिन जिस समाज में नयी सोच का उभरना खत्म हो जाता है, उस दिन वो समाज मरने लगता है. हमारे समाज में नयी सोच का पनपना खत्म हो चुका है. नये वाद पैदा नहीं हो रहे और जो हैं, वे पुरातन वादों के सहारे लठिया टेकते हुए आगे बढ़ रहे हैं. जिस दिन रावण फिल्म की कहानी पढ़ी-देखी नहीं, राजनीति फिल्म की कहानी पढ़ी- देखी नहीं, तो ये लगा कि हमारे फिल्मकार फिर से पुरानी कहानियों के धरातल पर अपनी क्रिएटिविटी की नींव खड़ी कर रहे हैं. रेड अलर्ट नामक फिल्म भी आ रही है, नक्सलवाद के बहाने.

जहां तक मैं समझता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री में कल्पना को नए सिरे से परिभाषित करने की अपार क्षमता होती है, लेकिन हमारे फिल्मकार इस कम्पीटिशन के माहौल में खुद को ढालने के लिए पुरानी शराब को ही नयी बोतल में डाल कर पिलाने की कोशिश कर रहे हैं. जब पश्चिम से तुलना करते हैं, तो अपने फिल्मकारों की कल्पना को एक ऐसे पैमाने पर पाते हैं, जहां नकल की आंधी तो चल निकली है, लेकिन खुद के बल पर इमारत खड़ा करने की कोई कोशिश नहीं होती.

 प्रेम कहानियों और मां-बेटे, भाई-बहन के रिश्ते पर तीन दशक किसी तरह से गुजर तो गए, लेकिन जब सोसाइटी में आंधी की तरह बदलाव हो रहे हों, तो सिर्फ फैशन इंडस्ट्री की निगाह से पूरे शहरी जीवन को देखने का सिर्फ प्रयासभर होता है. शहरी जीवन में न्यूक्लियर फैमिली भी है. बिखरते रिश्ते हैं और मरते मन के साथ लाखों लोग हैं. उनके अंदर झांकने का प्रभावशाली नजरिया हमारे फिल्मकारों के पास नहीं है. वे फिल्म बनाते हैं, तो सिर्फ अतिवादी नजरिया दिखता है, जैसे विदेशी डायरेक्टर द्वारा बनाए गए स्लमडॉग मिलेनियर को ही लें. बीच का जो आबादी का हिस्सा है, उसकी जीवनशैली को छूने की हिम्मत किसी में नहीं है.

बाजार का इस कदर हावी होना हमें कचोटता है. मेरा मानना है कि मिडिल क्लास की समस्याओं को छूने की हिम्मत जिस दिन फिल्मकार करने लगेंगे और कल्पना से परे फिल्मों का निर्माण करने लगेंगे, उस दिन नई सोच को पैदा करने की उनकी हुनर सबको चकित कर जाएगी या रुला जाएगी. इतिहास को आईने में रखकर कितने दिनों तक मूर्ख बनाने की प्रक्रिया जारी रहेगी. जरूरी है कि इतिहास से कोई छेड़छाड़ न की जाए, क्योंकि उसे पुनः परिभाषित करने की कोशिश बेकार ही होगी. जिंदगी में आगे बढ़ना ही सच्ची पहल है. कब्र खोदने से कंकाल के सिवाय कुछ नसीब नहीं होनेवाला है.

सोच को मरने मत दीजिए. क्योंकि ये सोच ही आपकी अगली पीढ़ी में आपके लिए इज्जत पैदा करेगी.

Monday, May 31, 2010

फिर से एक विवेकानंद का पैदा होना जरूरी है...

जब से रविशंकर पर हमले की खबर देखी, तो मीडिया के लोग चिंतित हो गए। इतने बड़े आदमी पर हमले की खबर थी। सही मायने में कहें, तो चिंतित होना लाजिमी है, लेकिन इतनी चिंता आम लोगों के लिए कभी नहीं होती मीडिया में। एक चैनल में कुछ संत लोग बता रहे थे कि हम लोग ही इस देश के समाज को सही दिशा देनेवाले हैं। हमें तो इस त्रासदी भरे स्टेटमेंट पर ही हंसी आने लगी कि वैचारिक रूप से क्या इस देश का आम आदमी इतना दरिद्र हो गया है कि उसे इन संतों का सहारा ही चाहिए। सही में कहूं, तो मुझे आज तक किसी संत ने प्रभावित नहीं किया। कोई कैसे किसी के जीवन को प्रभावित कर सकता है। संतों के समूह के पीछे जो ऊर्जा खर्च होती है और लोग दीवाने बने फिरते हैं, वे मानव श्रम के एक बड़े हिस्से को खा जाते हैं। जिस कॉरपोरेट स्टाइल में पूरी गतिविधियों को अमली जामा पहनाया जाता है, उसमें सामान्य आमदनी वाला शख्स मात्र एक देखनहार बनकर ही संतोष कर सकता है। पहले के जो संत हुए, वे त्याग के बूते पूजनीय हुए। उन्हें अपने प्रचार के लिए आर्गनाइज्ड एफर्ट की जरूरत नहीं महसूस हुई। आज के संत आर्गनाइज्ड सेक्टर के सीइओ के तौर पर काम करते हैं। हमें तो ये देश और यहां के लोग वैचारिक रूप से गरीब लगते हैं। जब हम जानते हैं कि सच बोलना चाहिए, झूठ नहीं। हमें बेहतर काम करना चाहिए और वह भी ईमानदारी से, तब भी हम गलत काम करते हैं और झूठ बोलते हैं। भ्रष्टाचार का कीड़ा देश की नस में खून बनकर दौड़ रहा है। वैसे में सिर्फ व्यक्तिगत जीवन को चिंता मुक्त करने का संदेश फैलाया जा रहा है। आप इस समय किसी भी ऐसे संस्थान या व्यक्ति के बारे में पूरी तरह से दावा नहीं कर सकते हैं कि वह निःस्वार्थ भाव से बिना किसी चाहत के कोई संगठन खड़ा कर रहा है या कोई काम कर रहा है। आखिर वह कौन सा कारण है कि आर्थिक सुधार के इस काल में ही ढेर सारे संत पैदा हो गये हैं। रोज कोई न कोई उपदेशक पैदा हो जाता है। इन्हीं झूठे संत की आड़ में तमाम तरह की गलत गतिविधियां संचालित होती हैं और इसमें भी तथाकथित समाज के सबसे उम्दा चेहरे फॉलोवर बने दिखते हैं। मुझे इन संतों को मौखिक कसरतों से अलग व्यावहारिक दुनिया में कभी किसी भिखारी को खाना खिलाते या कड़ी धूप में चलकर बच्चों और गरीबों के बीच छाता बांटते नहीं देखा। एसी कमरे में बैठकर वेदों-पुराणों की चर्चा करते हुए संतई करना सबसे आसान काम है। इस देश को एक विवेकानंद की जरूरत है, जिसकी आत्मा इस देश की सड़ती व्यवस्था पर विलाप करे और लोगों को जगाए। साथ ही इस देश में फिर से पदयात्रा कर एक मुहिम छेड़े,. जिससे उपभोक्तावादी मानसिकता के ऊपर उठकर देशवासी सही में जीवन उत्थान की बातें करें। सबसे पहले तो धर्म की व्याख्या का होना जरूरी है। धर्म क्या है, इसे बताना जरूरी है। कर्म को छोड़कर उस परमात्मा के नाम पर रात-दिन जाप करते रहना ही धर्म है या गरीबों की भूख मिटाने के लिए ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना धर्म है, जहां से एक रास्ता निकले। संतों को सबसे पहले खुद के संत होने की उपाधि को त्याग देना चाहिए। खुद को महिमामंडित कर ही सबसे पहले धर्म की हत्या कर दी जाती है। क्यों कोई खुद को बतौर इंसान सर्वश्रेष्ठ घोषित करे। संत या ईश्वर जनसमुदाय के बीच उपस्थित होकर ही अलग धार पैदा कर सकता है। राम ने १४ वर्ष में वनवास में बीता दिये और कृष्ण अर्जुन के सारथी बनकर युद्ध में साथ निभाते रहे। संतों को ऊंची कुर्सी पर नहीं, बल्कि भक्तों के बीच बैठकर सही व्याख्या की प्रस्तुति करनी चाहिए। संतई की आड़ में ये देश मानव श्रम के एक बड़े हिस्से को खो दे रहा है। हमारा तो ये मानना है कि जिस दिन ये संतई की भूख हर किसी के दिमाग पर हावी हो जाएगी, उस दिन ये देश टूटन के कगार पर होगा। जिंदगी गुरु के बिना नहीं चल सकती। लेकिन गुरु को आर्थिक लालच और उत्थान के सपनेसे ऊपर उठना होगा। अगर कोई संत इसे पढ़ रहे होंगे, तो वे हमें माफ जरूर कर देंगे, क्योंकि माफी तो संत ही देते हैं। वैसे हमारा इरादा किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है।

Sunday, May 9, 2010

मां के स्वरूप को जानने के लिए मृत्यु तक प्रतीक्षा करनी होगी..

आप मां के लिए किस लब्ज का प्रयोग करेंगे। किस शब्द का सहारा लेंगे। मां की कोख से उपजा एक फूल कल उसके खिलाफ ही आवाज बुलंद करे, तो उस पर क्या बीतती है, ये एक मां के दिल से ही पूछना चाहिए। मेरी मां मेरे लिये सबकुछ है। हर किसी के लिए मां का स्वरूप व्यक्तिगत होता है, मेरे लिये भी है, लेकिन जब ममता के व्यापक स्वरूप का बोध होता है, तो लगता है कि मां एक शब्द नहीं, बल्कि इस संसार को शीतलता प्रदान करनेवाली छाया है। जिसके नीचे आकर हम अपने सुख-दुख सबकुछ भूल जाते हैं। सही मायने में कहूं, तो आज तक मैं अपने कपड़ों के मामले में मां पर निर्भर हूं। मां मेरे सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक का ख्याल रखती है। क्या मां के बिना कोई जिंदगी जी जा सकती है,मैं सोच भी नहीं सकता। कभी झुंझलाहट भी होती है, तो मां उसे मुस्कुराहट के साथ झेल लेती है।वैसे जब पहली बार मेरे पास मां है, वाला डायलॉग सुना था, तो लगा था कि क्या बात है? साला एक डायलॉग में शशि कपूर ने अमिताभ को पटकनी दे दी। मां के चरित्र को जीना आसान नहीं होता। पूत कपूत निकल जाये, लेकिन मां की ममता उसे कपूत नहीं मानती। उसके लंबे जीवन की कामना करती रहती है। फिल्म वास्तव में संजय दत्त अपनी मां को न जाने कितने दर्द देते हैं। मां के पास विवशता होती है, वह क्या करे। मां कहां जाये। कैसे बोले, बेटा मैं तेरे भविष्य की चिंता करती हूं। यहां तो संतान का डायलॉग रहता है, मां ये तो तेरी जिम्मेदारी थी। अब मैं अपनी जिंदगी जीना चाहता हूं। क्या एक मां की जिंदगी उसकी अपनी नहीं होती। वह २०-२२ साल तक इसी चंद शब्दों के कथन को सुनने के लिए जिंदा रहती है। मां की लोरी, मां की थपकी और मां का दुलार जादु किये रहता है। वह न रहे, तो जिंदगी का एक हिस्सा खाली ही रह जाता है। मैं मां के व्यापक स्वरूप की जब बातें करता हूं, तो मदर टेरेसा का ख्याल आता है। गरीब, अमीर और कोढी, बीमार या अपंग को अपनी ममता की छांव देनेवाली मदर मां के एक बड़े किरदार के रूप में नजर आती। जो मां के प्यार को नहीं पा सके, उन्होंने मदर टेरेसा की छुअन में उस ममता का एहसास किया। आप किसी वृद्धा को सिर्फ मांजी बोलिये और उसके साथ एक अनोखा रिश्ता जुड़ जाता है। वह आपके सामने अपने सारे दुख उड़ेल देगी। पता नहीं क्यों, जवान होकर संतान अपनी मां को भूल जा रहे हैं। अभी की नयी पीढ़ी के पास अपनी मां के लिए वक्त नहीं है। उसके साथ वह अहसास नहीं है, जिसके सहारे वह अपनी मां के कर्ज को चुका सके। मां के असल स्वरूप को सरोगेट मदर के रूप में भुनाया जा रहा है। कैसे ममता का असली स्वरूप बरकरार रखा जा सकेगा। जो जन्म देनेवाली होगी, वह कैसे उसे दूसरे के हाथों में अपनी कोख से जन्मे जीवन को सौंप देती है। ये हमारा मन नहीं मानता, लेकिन हो रहा है। मां भी बाजारवाद का शिकार  है। पैसे लेकर कोख का सौदा किया जा रहा है।
एक बात कहूं, तो इस लेख में मैं मां के स्वरूप की व्याख्या करना चाहता हूं, लेकिन हो नहीं पा रहा। मां के किरदार में इतने बदलाव हुए हैं कि  दिग्भ्रमित हो जाता हूं। कैसे कहूं कि यही मां का असली स्वरूप है। तीस पार का हो गया हूं, लेकिन इस किरदार को जानने की कोशिश जारी है। मैं ये नहीं कह सकता कि मैंने मां के पूर्ण स्वरूप को जान लिया है। मैं तो अपने को पिता के तौर पर अनुभव शुरू कर ही रहा हूं। मां के स्वरूप
को जानने के लिए मृत्यु तक प्रतीक्षा करनी होगी। क्योंकि कई अनुभवों के बाद ही इस मुद्दे पर बहस भी हो सकेगी। क्या आप मेरा इंतजार करेंगे?

Wednesday, May 5, 2010

माफ कीजिएगा, मैं ब्लाग जगत और तथाकथित बौद्धिक जनों की झूठी दलीलों से ऊब गया हूं....

माफ कीजिएगा, मैं ब्लाग जगत और तथाकथित बौद्धिक जनों की झूठी दलीलों से ऊब गया हूं। स्त्री विमर्श, नारी स्वतंत्रता और अधिकार के कोणों से निरूपमा की मौत पर हो रहे सवालों से झुंझलाहट होती है। निरूपमा के लिए हजारों आवाजें बुलंद हो रही हैं। ये महज टीआरपी बढ़ाने का फार्मूला है।  यहां हमारा मकसद आनर किलिंग के मुद्दे पर बहस करने का नहीं है, बल्कि निरूपमा के मां बनने की स्थिति तक पहुंचने और उसके बाद उसके जीवन में आये परिवर्तनों को लेकर है। 

कोई भी घटना या परिणाम किसी प्रक्रिया का हिस्साभर होता है चाहे वह गलत हो या सही। सवाल ये है कि निरूपमा की जिंदगी में जो कुछ हो रहा था या हुआ, वह सही था या गलत। हम ये कहना चाहेंगे, आप क्रांतिकारी बातें करते हुए स्त्री स्वतंत्रता, लिव इन रिलेशनशिप और निरूपमा द्वारा उठाये गये सही या गलत कदम पर बहस करते हुए जो मुगालता पाल रहे हैं, वह इसलिए है कि आपको एक ऐसा परिवेश मिला, जहां सुरक्षित जीवन था, मां-बाप हैं और जीवनयापन के लिए नौकरी है। पश्चिम जगत की तरह सहजीवन की कल्पना अगर यहां सही रूप में साकार होने लगे और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की हामी भरनेवालों की चांदी हो जाये, तो अराजक स्थिति को संभालने के लिए कौन पहल करेगा, ये सोचिये। निरूपमा चली गयी, लेकिन वह अपने कई अनसुलझे सवालें छोड़ गयी है। जब रेडियो या टीवी पर कंडोम का खुलेआम प्रचार हो रहा हो और बहत्तर घंटे में गर्भ में उपजनेवाले जीवन को मारने की दवा सुझायी जा रही हो, तो सेक्स के मामले में दिमागी तौर पर फ्री होना स्वाभाविक है। रिपोर्ट पढ़िये, मन नहीं अकुला जाये, तो बोलियेगा। बाहर गये बेटे-बेटियों की स्थिति को लेकर शिकन न उभरे तो कहियेगा। 

सिर्फ बौद्धिक जमात में खुद को शामिल करने के लिए ये दलील दी जाती है कि बिना शादी के सहवास और उसके ऊपर तीन माह तक गर्भ धारण करने की बात एक हिम्मतवाली लड़की ही कर सकती है। मैं इसे हिम्मत नहीं, मजबूरी मानता हूं। एक गलती मानता हूं। जब आप जानते हैं कि आपके एक गलत कदम से क्या दुष्परिणाम सामने आयेंगे, तब भी आप कोई सावधानी नहीं बरतते हैं। दिल्ली जैसा शहर कितना भी आधुनिक हो जाये, लेकिन कोई भी मानस बिन ब्याही मां की बेबसी को स्वीकार करने की हिम्मत कम ही जुटा सकता है। युवा जोड़ों को पार्कों में उन्मुक्त अवस्था में आप-हम खुलेआम देख सकते हैं। स्वतंत्रता की बातें करनेवाले कभी भी एक अनुशासन की बातें क्यों नहीं करते। निरूपमा के पिता सनातम धर्म की दुहाई देकर व्यक्तिगत स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने की गलती जरूर की है, लेकिन सवाल ये है कि माता-पिता द्वारा दी गयी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और भरोसे का क्या किया जाये।

भविष्य में अगर मेरी संतान किसी से अपने मन से विवाह की इच्छा जताये, तो जरूर राजी होऊंगा, लेकिन एक भरोसा ये जरूर चाहूंगा कि वह अपने अस्तित्व और प्रतिष्ठा से खिलवाड़ न करे। हर कोई अपनी संतान के लिए सुरक्षित जीवन चाहता है। मान लिजिये कि परिवार में मात्र तीन सदस्य हों और एक की मनोदशा बिगड़ जाये, साथ ही दोनों के पास समय की कमी हो, तो ये स्वतंत्रता की दुहाई देनेवाली बौद्धिक जमात क्या कभी आगे बढ़कर संभालने का आयेगी। बौद्धिक गुटरगूं से ऊपर उठिये। सोचिये और तब उगलिये। 

निरूपमा के पिता की सोच जरूर संकीर्ण है, लेकिन हमें भी स्त्री आजादी के विमर्श के बहाने अपनी संकीर्ण सोच से ऊपर उठना जरूरी है। ऐसा न हो कि विवाह नाम की संस्था ही खत्म हो जाये और बिन ब्याही माताओं की फौज खड़ी हो जाये। निरूपमा के तथाकथित मित्र 
द्वारा विवाह जैसी व्यवस्था के लिए पहल में देरी करना उसी गैर-जिम्मेवार रवैये का परिणाम है, जो कि आज की युवा पीढ़ी लगातार तथाकथित फरजी बौद्धिक जमात से ग्रहण कर रही है। अब जो समाज बन रहा है, वहां आजादी है, सोशल नेटवर्किंग है और मोबाइल है। ऐसे में तेज भागती जिंदगी में भी कई भटकाव हैं। आज के युवा जिंदगी के अनुभवों से पूर्व उन भटकावों से संभल नहीं पा रहे। 

रांची जैसे शहर में प्रेम के नाम पर जिंदगी को दांव पर लगाने की घटना आम होती जा रही है। वैसे भी लड़की, आप मानिये या मानिये, सबसे खतरनाक स्थिति में होती है। शरीर के नाम पर उसका जीवन ही दांव पर लगा रहता है। इसलिए संभलना स्त्री को ही पड़ेगा। पुरुष के लिए जिंदगी में उतना परिवर्तन मायने नहीं रखता, क्योंकि उसके शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। इसलिए स्त्री विमर्श के बहाने घटिया बौद्धिक जुगाली से ऊपर उठिये।

Thursday, April 22, 2010

मेरी बड़ी बेटी आज तीन साल की हो गयी..

मेरी बड़ी बेटी आज तीन साल की हो गयी। तीन साल देखते-देखते बीत गए। काफी कुछ कहने-बोलने को है। तीन साल की सोना और एक साल की सौम्या आज हमारी जिंदगी के अहम हिस्से हैं। उनके साथ टाम एंड जेरी की शैतानी और छोटा भीम की हर जांबाजी को देखना हमारी विवशता है। कोई और चैनल लगाया सिवाय कार्टून छोड़कर तो हंगामा बरप जाता है। प्रकृति के साथ उनका अनोखा सामंजस्य रहता है। सूरज की पहली किरण के साथ जगना और ढलने के साथ सो जाना उनका नियम है। इन सबके बीच हमारी जिंदगी हमारी नहीं रहती। उसकी हमउम्र अन्य बच्चों को भी देखता हूं, तो अब जाकर जिम्मेदारी का अनोखा बोध होता है। ये बोध, ऐसा है, जो एक पिता ही महसूस कर सकता है। एक मजबूत पीढ़ी तैयार करने की जिम्मेदारी का बोध। इस पीढ़ी पर ही हमारे देश की प्रगति निर्भर करेगी। मुझे अपनी बेटी को हर वह खुशी देने की इच्छा होती है, जो हमने महसूस की है। लेकिन जिस प्रकार का समाज बन रहा है और आसपास का माहौल बदल रहा है, उसमें एकाकी होते जा रहे जीवन में उनका संघर्ष कैसा होगा, ये सोचनेवाली बात है। कंक्रीट के जंगल बनते जा रहे शहर, जिंदगी का दबाव और दूसरी चीजें जिंदगी के रस को निचोड़ ले रही हैं। एक बच्चा क्या चाहता है, मैदान में दौड़ लगाना, लेकिन शहरों में मैदान नहीं बचे रह गये हैं, कहां दौड़ेंगे आज-कल के बच्चे। हर बच्चे को ये सुविधा उपलब्ध कराना समाज की जिम्मेदारी है, लेकिन समाज इन जिम्मेदारियों से पीछे भाग रहा है। मैं अपनी बेटियों को उस दबाव से मुक्त रखना चाहूंगा, जहां प्रतियोगिता शुरू होती है। खुद का विकास हो, यही मेरा उद्देश्य होगा। कोई ऐसी योजना नही होगी, जहां उनकी जिंदगी मशीन बनती हो। खुद के व्यक्तित्व के प्रति जिम्मेदार बनो, ये जरूरी है। आज लोग खुद के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं, वे जरूरत से ज्यादा पाना चाहते हैं। इसी चाहत में सीमा को पार कर जाते हैं। उस सीमा को पार करने के बाद उनकी रंगीन जिंदगी बदरंगी हो जाती है। हम तो बेटियों को हमेशा कहेंगे, जहां रहो खुश रहो। क्योंकि खुश रहना ही जिंदगी है। जहां खुशी नहीं है, वहां पैसे की पूजा कर क्या होगा। क्या जिंदगी में खुशी के दो पल पैसे से खरीदे जा सकते हैं। थोड़ा मामला दार्शनिक हो सकता है, लेकिन सच्चाई यही है। जिंदगी को बिंदास जीना है, चाहे जैसे भी  हो, यही कहना चाहूंगा।

Thursday, February 11, 2010

थ्री इडियट्स का रैंचो रुला जाता है..



थ्री इडियट्स का रैंचो रुला जाता है। किताबी दुनिया से अलग सीखने की सलाह देनेवाला रैंचो। दोस्तों के सुख-दुख में साथ देनेवाला रैंचो। रणछोड़ दास यानी आमिर खान फिल्म में गहरी छाप छोड़ जाते हैं। रैट रेस में जुटे छात्र, शिक्षक और उससे उपजती सौ समस्याएं न जाने कितनी प्रतिभाओं को रौंद डाल रही हैं। कहते हैं कि हर मनुष्य के भीतर नैसर्गिक प्रतिभा है और जरूरत उसे उभारने की है। मैकॉले द्वारा कायम शिक्षा पद्धति और उसके बाद इंजीनियरिंग या डॉक्टर की डिग्री के लिए नहीं हटनेवाली जिद ने एक पूरी पीढ़ी को बदल डाला है। आज परिस्थिति ऐसी है कि व्यक्ति कोई वैकल्पिक मार्ग अख्तियार नहीं कर सकता और करना चाहता है, तो उसे पूंजी चाहिए। यह पूरी तरह क्रिकेट गेम की तरह हो गया है। जैसे सिर्फ पैसे के लिए आज क्रिकेट के सामने दूसरे खेलों को दोयम दर्जे का बना दिया गया है, वैसे ही हालात आज के दौर में कला, जेनरल साइंस और अन्य विषयों की है। हालात कुछ ऐसे हैं कि छात्रों पर बढ़ता दबाव उन्हें उन कदमों को उठाने को बाध्य कर रहा है, जो उन्हें नहीं करना चाहिए। समस्याएं तो कई हैं, लेकिन सबसे बड़ी समस्या, जो थ्री इडियट्स देती है, वह ये है कि शिक्षा प्रणाली में बदलाव हो। साथ ही जिंदगी का लक्ष्य कुछ सीखने का होना चाहिए, जो काबिल बनाए। साथ ही आदमी कुछ नया दे। हमारे देश में पुरानी पद्धति के आधार पर ही अनुसंधान हो रहे हैं या पश्चिमी शिक्षा या तकनीक पर ही खोज जारी है। यहां इसका अपना क्या है, ये अहम सवाल है। कहते हैं कि जीरो का आविष्कार इसी भारत में हुआ। नक्षत्र विग्यान तक में हम आगे थे। आज ऐसा क्या हो गया कि हम कुछ दे नहीं पा रहे। थ्री इडियट्स में रैंचों का ये कहना कि  तकनीकी कॉलेजों में सबसे अहम सवाल कैसे अमरिका में अच्छी नौकरी पायी जाए, रहती है। अपना देश, अपनी मिट्टी, यहां के लिए कोई जोर नहीं रहता। शायद स्लो डाउन से कुछ प्रभाव पड़ा हो। सच्चाई ये है कि बड़े प्रतिष्ठित संस्थानों के  अधिकांश छात्र विदेशों की ओर रुख कर जाते हैं। क्या इन बड़े संस्थानों का निर्माण सिर्फ तकनीकी छात्रों की फौज खड़ी करने के लिए हुआ है? हमारी गलत मानसिकता को दर्शाती फिल्म कई गहरे सवाल छोड़ जाती है। फिल्म में नाटकीयता तो है, लेकिन उसके साथ उसमें दोस्ती के लिए जान दे देने की तमन्ना को भी बखूबी दर्शाया गया है। हममें आपमें कुछ विशेष है। हम अगर चाह लें, मन से कुछ भी कर सकते हैं। हमारे कई दोस्त जो काबिलियत रखते थे, आज दस से १२ घंटे की नौकरी में हताशा के शिकार हैं। उनमें कुछ अलग करने की गुंजाइश थी। वे कुछ कर सकते थे, लेकिन वे कर नहीं पाए। वैसे फिल्म के लिहाज से ब्लाग भी हिट होने की श्रेणी में रखा जा सकता है, क्योंकि यहां हमेशा कुछ नया लिखने का अवसर रहता है। ये आप पर रहता है कि आप इस वर्चुअल स्पेस का उपयोग कैसे करते हैं। फिल्म का संदेश यही है कि रैट रेस में मत रहो, काबिल बनो, कुछ नया दो। एकदम नया....


.हमारा बच्चा जो बनना चाहे, उसे बनने दो। उस पर दबाव मत डालो। लेकिन इसके साथ ऐसा सिस्टम भी तैयार करना होगा, जहां पढ़ाई का मकसद सिर्फ रोजी-रोटी तक नहीं रहे, बल्कि जानकारी हासिल करना हो। यहां इस देश में इंटर पास करते ही जहां भविष्य की चिंता सताने लगती है, वहां ये भाषण भी बेकार हो जाती है। इसलिए थ्री इडियट्स के बाद वह फिल्म भी बननी चाहिए, जहां ये बताया जाए कि कैसे ये सिस्टम बने या बनाया जा सकता है। क्या आमिर इस पर अगली फिल्म बनाएंगे?
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