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Saturday, March 9, 2013

शायद मैं सबसे खुशनसीब हूं...

अंकल कैसे हैं? अपने क्वार्टर से नीचे उतरते वक्त ऊपर के तल्ले पर रहनेवाले पड़ोसी से टकराते ही पहला सवाल. चिर-परिचित अंदाज में हंस कर ठीक है कहना और आगे बढ़ जाना. नहीं तो परिवार या मौसम के बारे में दो बातें, शब्दों के आदान-प्रदान के बाद अपनी-अपनी राह चल निकलना. ये मेरी जिंदगी का हर रोज का पार्ट है. सुबह दस बजे आफिस के लिए निकलने के दौरान अंकल मिल ही जाते हैं.

थोड़ा बैक ग्राउंड में ले चलता हूं. कुछ महीनों पहले घर में स्पेस की कमी की वजह से मां-बाप से दूर एक बड़े से फ्लैट में बतौर किराएदार खुद को शिफ्ट कर लिया था. जिसमें मैं अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ रहने लगा. बड़े-बड़े कमरे, बड़ा सा अपार्टमेंट. सुख-सुविधा सारा कुछ. लेकिन वहां दस बजे निकलने के दौरान बगल में रहनेवाले पड़ोसी मुस्कान से स्वागत करते नहीं मिले. वह मिलते, टकराते और फिर अपनी राह चल निकलते. दिन, हफ्ता और महीना गुजरता चला गया. स्थिति ऐसी हो गई कि बड़े से डैम के किनारे खड़े होने के बाद भी पानी के लिए तरस रहे हों. न कोई मुस्कुराहट और न ही गुस्सा. एकदम प्रोफेशनल लोगों से भेंट मुलाकात.

रांची से शहर में जहां लोग गर्मजोशी से मिलते हैं मुझे बदलते जमाने का अहसास हुआ. मन तड़पने लगा था. अंत में एक दोस्त से इस बारे में राय जाहिर की. उसने बताया कि अगर ऐसा है, तो लौट आओ अपने उसी पुराने आशियाने में यानी मां-बाप के पास. बस वहां एक ही चीज की कमी होगी कि तुम्हें वो रूम का बड़ा स्पेस नहीं मिलेगा, लेकिन दिल का बड़ा स्पेस मिलेगा. जहां बड़े दिलवाले पड़ोसी हैं और हाय-हेलो करनेवाले चंद परिचित. हम जैसे आम लोग, जो दौड़-भाग वाली नौकरी करते हैं, वह हो रहे इन सामाजिक बदलावों से परिचित नहीं हो पाते हैं. खास कर जब उन्हें अच्छे पड़ोसी मिले हों और मुस्कुराते रहनेवाले लोग. दर्द होने के बाद भी उस पर पेन रिमूवर क्रीम लगानेवाले चंद हाथ तुरंत मिल जाते हैं. ऐसे में जब रियल सिचुएशन से सामना होता है, तो स्थिति सांप-छुछंदरवाली हो जाती है.

सेल्फ सेंटर्ड होते जा रहे लोगों से टकराने पर अवसाद में पड़ने जैसी स्थिति होने लगती है. ऐेसे ही फेसबुक पर दो हजार से ज्यादा दोस्त हैं, लेकिन अगर उनमें से किसी को चैट रूम में तकलीफ दी, तो अजब-गजब रिएक्शन अधिकांश मामलों में मिल जाएंगे. कई भड़ासी भी ऐसे मिल जाएंगे, जो अपने कमेंट्स से आपको तिलमिलाने की कोशिश करें. वे यह नहीं सोचेंगे कि इस ओपेन वर्चुअल स्पेस पर हर कमेंट हजारों निगाहों से होकर गुजरती है और ये किसी की इज्जत को चिंदी-चिंदी कर सकती है. यूं कहें कि आप बेगानेपन की स्थिति से दूर होने की कोशिश करने के लिए अगर चंद दोस्तों या परिचितों का साथ चाहेंगे, तो उसके लिए आपको भाग्यशाली बनना होगा. क्योंकि ऐसे बिरले ही लोग होंगे, जिन्हें रोज मुस्कुरा कर हाय हेलो करनेवाले पड़ोसी मिल जाएं. सौभाग्य से मुझे मिले हैं, मैं खुश हूं और आज इसे आपसे शेयर कर रहा हूं.

अगर आप थोड़ा गंभीर होकर सोचें, तो पाएंगे कि प्रोफेशनल होना जितना आसान होता है, उतना ही मुश्किल होता है किसी को स्नेह से बांधना. शायद इसी प्रोफेशनल होते माइंडसेट ने कोर्ट में तलाक के केसेज बढ़ा दिए हैं. दूसरों के लिए खुद को समर्पित करनेवाले लोग नहीं मिलते. आज कल मेरे हिसाब से पहले जैसी समर्पित मां, पिता, भाई, बहन या पत्नी कम ही मिलती हैं. ये वे लोग हैं, जो तमाम तकलीफों को सहते हुए भी आपके लिए अपनी सुविधाएं छोड़ने के लिए तैयार रहते हैं.आपकी खुशी अपनी खुशी लगती है. टूटते घर और लगातार बनती बड़ी बिल्डिगों के बीच आपके जेहन में भी ये सब बातें आती ही होगी. मुझे लगता है कि अच्छे पड़ोसी, अच्छी बेटियां, अच्छे माता-पिता और अच्छी पत्नी को पाकर मैं शायद इस दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान हूं, तो ये गलत नहीं होगा. ईश्वर से कोई शिकायत नहीं. अब शिकायत सिर्फ उन लोगों से है, जिन्होंने प्रोफेशनल होने का ढोंग कर अपने जैसों की संख्या ज्यादा कर ली है और इसे बदलते जमाने का नाम दे दिया है.   

Monday, April 2, 2012

फेसबुक... फेसबुक.... फेसबुक.....

अच्छा अगर आपसे कहूं कि आप फेसबुक पर हमारे दोस्त हैं... वो भी दो हजार समथिंग दोस्तों में.... तो क्या आप अचकचाएंगे तो नहीं. हो सकता है कि आप मेरे फ्रेड्स लिस्ट में हों. लेकिन अनजान हों. कुछ वैसे ही जैसे लोग कमरे में कहीं किसी जगह रुपए रखकर भूल जाते हैं. और वक्त-बेवक्त कभी उन्हें वो रुपए हाथ लग जाते हैं, तो उनकी खुशी की सीमा नहीं रहती.

बहुत से लोग फेसबुक को गरियाते हैं, तो कई लोग इसे एक नशा, एक किस्सा या रस्मअदायगी का माध्यम बताते हैं. मेरे लिए फेसबुक क्या है, मैं भी नहीं जानता. हां, इसे न तो गाली दे सकता हूं और न ही इसे छोड़ सकता हूं. ये जानते हुए भी कि मेरे किसी स्टेटस पर बस दो या तीन कमेंट्स ही आते हैं. खुद की बेचारगी पर हंसते हुए दूसरों के कमेंट्स जरूर पढ़ता जाता हूं. हमेशा आब्जर्वर बनकर उन हजारों स्टेटस से गुजरते रहना, किसी किताब के पन्ने पलटने से कम नहीं लगता.

जिंदगी के हजारों पन्नों को तस्वीरों के मार्फत बयां करने की कोशिश को फेसबुक जिंदा रखे हुए है. फेसबुक तमाम अवरोधों, विरोधाभासों के बाद भी आपको ये तो एहसास करा ही जाता है कि आप कुछ नहीं...इस दुनिया में आप एक किरदार की तरह हैं. कभी-कभी गुजर चुके लोगों के स्टेटस पर जाकर गौर फरमाइएगा, तो लगेगा कि वो आपसे बात कर रहे हैं.

बतियाना शगल है, लेकिन टिपियाना, लगातार स्टेटस अपडेट रखना या करते रहना मजाक की बात नहीं. उन तमाम बंदों को शुक्रिया कहना चाहता हूं, जो तमाम लिंकों को यूं वजह या बेवजह, सनकपन में अपने स्टेटस पर डालते रहते हैं. हम भी अलसायी आंखों से क्रशर को बस ऊपर नीचे कर हर छोटी-बड़ी सूचनाओं से अवगत होते रहते हैं. फेसबुक बनते-बिगड़ते रिश्तों का गवाह भी है.

मेरे एक फेसबुक फ्रेंड अंशुमाल रस्तोगी जी का आज जन्मदिन है. मैंने फेसबुक खोलकर अपडेट देखते ही उन्हें तत्काल बधाई दी. कहां बरेली... कहां रांची. लेकिन दिलों के तार देखिए फेसबुक के माध्यम से जुड़ गए. दिल्ली के कई बंदे, कानपुर के कई हीरो और पटना के कई दिग्गज अपनी सूची में हैं. इतना तय है कि हम उन्हें जानते हैं. क्योंकि हम रोज उनकी शख्सियत से अपडेट होते रहते हैं. फेसबुक...ओस की बूंद की तरह हमेशा ताजा ही लगता है. दोपहर में ओपेन करो या शाम में... पुरानी बातें गुजरते वक्त के साथ आगे बढ़ जाती हैं. रह जाती है, तो सिर्फ फ्रेश अपडेट. वैसे मैं स्टेटस अपडेट करने में पीछे ही रह जाता हूं. फेसबुकिया बुखार देखते हैं कि कितने दिनों तक कायम रहता है.

Tuesday, June 14, 2011

तुम करो तो रास लीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला

तुम करो तो रास लीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला. रेडी फिल्म का इ बोल हिट है बास. दिल को छू गया. दुनिया को सही होने की नसीहत देते कई मालिक, उस्ताद खुद न जाने कितना तेल से नहा गए हैं, लेकिन दूसरों से उम्मीद करते हैं कि पानी से नहाए. जमाने-जमाने की बात है. अगर किसी वेबसाइट पर किसी सुंदर लड़की की तस्वीर देख ली, तो तुरंत टोक देंगे, तो भाई साहब का मामला गड़बड़ चल रहा है. वहीं खुद जब रोड पर नैनों के तीर चलाते रहेंगे, तो सब कुछ मुआफ रहता है. इ हेकड़ी, इ बदजुबानी अब ज्यादा दिन नहीं चलनेवाला. हमाम में तो सब नंगे रहता है. वैसे ही फेसबुक पर बड़का-बड़का बात करनेवाला भाई लोग असल जिंदगी में चोर टाइप इधर से उधर घूमते रहेगा. कई बंधुवर तो खुद को बुद्धजीवी बताने के लिए खद्दर का कुर्ता धारण कर लेते हैं. लेकिन भाई लोग अपुन को इ झाड़-फासं सूट नहीं करता है. हम जो हैं, सो हैं. बिंदास, मस्त. ना किसी से लोचा, ना किसी से कोई टेंशन, जियो और जीने में विश्वास करते हैं. विश्वास नहीं है, तो मिल कर देख लो. वैसे सलमान भाई के भी हम फैन हैं. उनकी ही तरह अगर मैंने भी एक बार कमिटमेंट कर दी, तो कर दी. कहने का मतलब ये है कि कोई भी बात हम सेंटीमेंटल होकर नहीं करना चाहिए, जज्बाती होकर तो एकदम से नहीं

Monday, February 21, 2011

लिजा रे, जिंदगी और उनका ब्लाग

कभी जिंदगी से सवाल क्या है? आखिर ये जिंदगी है क्या? इससे आप क्यों इतना प्यार करते हैं? ये जब खत्म होती रहती है, इसकी लौ जब टिमटिमाना कम कर देती है, तो आप छटपटा जाते हैं. किसी भी तरह इसे पाने लेने का जुनून कायम रहता है. आज इस पोस्ट में मैं जिंदगी की बात इसलिए कर रहा हूं कि मैंने लिसा रे का ब्लाग विजिट किया. कई लोगों ने देखा होगा. उसमें बोन कैंसर से इलाज के दौरान लिजा ने अपने संघर्ष को शब्दों में पिरोया है. पिछले दिनों रांची में राम टोप्पो नामक लड़के को बोन कैंसर से पीड़ित होने के कारण तिल-तिल कर मरते देखा. जिंदगी कितनी अहम चीज है, ये उससे पूछिये, जिससे ये छीनी जाती है. मुझे लिजा रे के ब्लाग में उसकी पोस्ट पर आए कमेंट्स पसंद आते हैं. उसमें जिंदगी की कहानी नजर आती है. ब्राजील की कोई लड़की लिजा के ठीक होने की दुआ करती है और अब लिजा ठीक भी हैं. ऐसे ही कोई लिजा को तहे दिल से प्यार करने और उनके बेहतर लिखने की प्रशंसा करता है. शब्दों का जादु छू जाता है. लिजा रे का ब्लाग पढ़िए. उस पर अंतिम पोसट मई २०१० में लिखा गया है. लेकिन इसी बहाने लिजा ने जिंदगी का दस्तावेज लिख डाला है. अद्भुत,सुंदर और हमेशा पढ़ने योग्य.

Friday, November 5, 2010

यूं गुजारें हर पल ऐसा कि हर दिन मनाएं दिवाली जैसा

आई नेक्स्ट के मित्र माहे के बच्चों के साथ...

आज दिवाली है. अगले साल भी आएगी. आप भी मुस्कुराएंगे और हम सब भी. लेकिन कुछ बदनसीब ऐसे होते हैं, जो मां-बाप के रहते हुए भी अकेले रह जाते हैं. उनकी शुरुआत ही जिंदगी की जद्दोजहद से होती है.

मैं जहां काम करता हूं, वहां हमारे एक रिपोर्टर हैं अमित. संवेदनशील हैं. उन्होंने जिंदगी की लड़ाई को नजदीक से देखा है. रिपोर्टिंग के सिलसिले में माहे या मां का घर गए, जो कि एक अनाथालय है. यहां कई ऐसे बच्चे हैं, जिन्हें उनके मां-बाप छोड़ चुके हैं. मां-बाप जिंदा है, लेकिन झांकने तक नहीं आते. कोई बच्चा बाप की पिटाई के कारण घर छोड़ने को विवश हुआ, तो किसी को गरीब मां ने सड़कों पर खुलेआम छोड़ दिया.

अमित को बच्चों का दर्द छू गया. उनकी पहल पर हमारे आई नेक्स्ट के मित्रों ने संयुक्त रूप से कुछ पैसे जमा किए और कुछ चावल, दाल और अन्य चीजें माहे जाकर बच्चों के बीच बांटे.

मित्र अमित बच्चों को दिवाली का गिफ्ट देते हुए...
देखो आयी दिवाली
खुशियों की फुलझरियां लायीं
थोड़ा तुम हंसो, थोड़ा हम हंसें
थोड़ा नाचें, थोड़ा मुस्कुराएं
यूं गुजारें हर पल ऐसा
कि हर दिन मनाएं दिवाली जैसा

हैप्पी दिवाली...

Tuesday, November 2, 2010

ऐ जिंदगी तू रुकती नहीं

ऐ जिंदगी तू रुकती नहीं
चलती जाती, झुकती नहीं
उम्र की ढलान, जवानी का चढ़ाव
बचपन का चुलबुलापन
या मस्ती का बहाव
कुछ कहानियां छोड़ जाते हर पड़ाव
ऐ जिंदगी तू रुकती नहीं



मैंने जब जब चाहा
तुझे भूला आगे बढ़ जाऊं
तू हर कदम पर आती हो सामने
कभी सुख-कभी दुख
कभी आंसू-कभी मुस्कान
हर चीज  तेरी दिलाती है याद
हर बार दिल देता है तुझे दाद
ऐ जिंदगी तू रुकती नहीं



हजारों रंगीनियां समेटे तू
तेरी हर अदा
तेरा हर वादा
कभी डराता
कभी भगाता
कभी मस्ती के समंदर में डुबोता
हर पग पर रहता है तेरी याद दिलाता
ऐ जिंदगी तू रुकती नहीं

Tuesday, October 12, 2010

एक बुजुर्ग महानायक, जिसे आराम चाहिए..

बीते दिन अमिताभ का जन्म दिन था. फिर केबीसी में भी शहंशाह नजर आ रहे हैं. मीडिया में चर्चे ही चर्चे ही हो रहे हैं. आज सुबह किसी अखबार में केबीसी के एक एडवर्टाइजमेंट पर नजर गयी, तो अमिताभ कुछ अपील करते दिखे. बचपन से जिस शख्स को गौर से देखता रहा हूं, उसे फिर से देखने के लिए आंखों ने निशाना साधा. लेकिन इस बार अमिताभ के चेहरे पर प्लास्टिक मुस्कान थीं और आंखों में शायद एक दर्द नजर आ रहा था. अमिताभ ७० के करीब पहुंचने को हैं.

इस उम्र में जब सारे लोग या उनके पीढ़ी के अन्य लोग ढलती शाम में चुपचाप समय गुजारते हैं, अमिताभ एक्टिव हैं. हमारे हिसाब से बहुतेरे लोगों को अमिताभ के ऊपर उंगली उठाना अखर सकता है. वे किसी के भगवान हैं, तो किसी के लिए महानायक. लेकिन महानायक भी एक आदमी है. ये सब जानते हैं. आज मेरी नजर में मीडिया या वे खुद जिस तरह खुद को मार्केट में बनाये रखने के लिए जद्दोजहद करते हैं, उसमें एक अन्याय नजर आता है.

सच कहें, तो अमिताभ अब ढह रहे हैं. हमें न तो उनका कोई डायलॉग अच्छा लगता है और न ही उनकी केबीसी. हमारी पीढ़ी के लोग इंडिया टूडे के उस कवर पेज को नहीं भूले होंगे, जिसमें अमिताभ ने पकी हुई दाढ़ी के साथ पोज दिया था. मार्केट में सनसनी फैल गयी थी. लेकिन आज अमिताभ की ब्रांड वैल्यू भले ही कितनी बड़ी हो, किसी आदमी के भीतर वैसी सनसनी नहीं बनती. जितने एडवर्टाइजमेंट में अमिताभ नजर आते हैं. जितने कार्यक्रमों को आज वे कवर करते हैं, उतना शायद ने अपने पिक पर नहीं करते होंगे. आज अमिताभ ज्यादा व्यस्त हैं. लेकिन इतनी व्यस्तता इतनी अधिक उम्र के व्यक्ति के लिए क्या उचित है, ये एक बड़ा सवाल है. कर्म भी करना चाहिए, लेकिन कर्म का एक उद्देश्य होना चाहिए.

अमिताभ आज जिस मुकाम पर हैं, वहां पहुंचना हर किसी के बस की बात नहीं है. उनके लिए सबके दिल में इज्जत है, लेकिन ७० साल के करीब पहुंच गए अमिताभ का लगातार काम अब डरा जाता है. ये शायद हम पब्लिक के लिए उस महानायक की विवशता है कि उन्हें मार्केट अपनी ओर खींच लेती है. अगर ये मार्केट उन्हें कुछ सालों के लिए नकार देता, तो अमिताभ ज्यादा सुखी और आराम का जीवन बिताते होंते. हम उनकी स्वाभाविक हंसी के दर्शन कर रहे होते. अमिताभ जैसा महानायक आज के बाजार में नवरत्न तक बेच चुका है. दिमाग को कूल करता उनका संदेश शायद कल तक जादू करता था, लेकिन आज उतना प्रभावी नहीं है. ये बदलते वक्त की मांग है कि अमिताभ थोड़ा स्लो हो जाएं. हम एक बुजुर्ग हो चुके अपने मुल्क के आदमी को इतनी मेहनत करते नहीं देख सकते. वैसे जिंदगी उनकी अपनी है, वे जो चाहें करें.

Tuesday, October 5, 2010

बावर्ची फिल्म का राजेश खन्ना लाइफ में मांगता

आज  हर व्यक्ति का घर अलग है. हर भाषा के लिहाज से अपना राज्य है यानी बंटवारे के लिहाज से पूरा देश बंटा है. ऐसे में एक फिल्म बावर्ची की याद हो आती है. राजेश खन्ना अभिनीत बावर्ची किरदार हमेशा गुदगुदाते रहता है. जिंदगी की दौड़ में इतना दबाव और खींचतान है कि लगता है, हमारे बीच भी वैसा एक बावर्ची आए, जिसके पास हमारी हर समस्या का हल हो. अगर आपमें से किसी ने उस फिल्म को ना देखा, हो तो देख लें.
हम खुद से परेशान रहते हैं. हमारी आत्मा परेशान रहती है. फेसबुक पर दूसरों के बेहतर स्टेटस देखकर परेशान रहते हैं. अनाप-शनाप बकना जारी रहता है. ऐसे में एक बावर्ची फिल्म के राजेश खन्ना टाइप किरदार की डिमांड काफी बनती दिख रही है. एक ऐसा व्यक्ति आए, जो मस्तमौला तरीके से हरेक को उसके अपने अंदर झांकने को विवश कर दे. कुछ ऐसा कर दे कि जादू हो जाए. जादू हमारी जिंदगी में.

मैं खुद कई लोगों से मिलता हूं. हर किसी को जल्दी रहती है. जल्दी काम निपटाने की. उस काम को निपटाने की जल्दी इसलिए कि उससे पैसे आएंगे. कोई जिंदगी जीने की बात नहीं करता है. कोई आदमी मुझे ये नहीं कहता कि आओ मेरी मोटरसाइकिल के पीछे बैठो, मैं तुम्हें एक लंबी सैर करा कर लाता हूं. मुझे किसी के मेरे अपने होने के अहसास की छुअन लिये काफी साल गुजर चुके हैं. स्कूल टाइम में किसी की साइकिल के आगे बैठ मेन रोड के चक्कर लगाना याद आ जाता है. उसी के साथ याद आ जाता है, किसी खास दोस्त के साथ सिनेमा देखने के लिए साइकिल चलाकर जाना. आज ३६ साल की उम्र में मेरे किसी मित्र के लिए या मुझे भी ऐसा कुछ करने के लिए समय नहीं है.

 वैसे में कोई बावर्ची फिल्म का राजेश खन्ना अगर कम से कम मेरी जिंदगी में आ जाए और मेरे आसपास की दुनिया में रंगीनियत घोल दे, तो मस्त हो जाऊं. मैं कोई उपदेशक नहीं चाहता और न कोई नीति बतानेवाला. बस मुझे मेरे आसपास की दुनिया को बदल डालनेवाले चाहिए.

मस्ती, शब्द जेहन में आते ही जैसे व्यक्ति का रूप उभरता है, वैसा व्यक्ति मुझे मेरी जिंदगी में चाहिए. रोजमर्रा की झिकझिक तो चलती रहेगी, लेकिन इस झिकझिक में कोई ऐसा आ जाए, जो इसी झिकझिक को चैलेंज बताकर उसे निपटाने को कहे, तो बात बन जाये. तब हम भी मैनेजमेंट गुरु कहलाएं. यहां तो अम्मा यार, इतना लोड है, कह कर टेंशन दे डालने की आदत है. ऐसे में बावर्ची फिल्म का राजेश खन्ना आकर ये कहें कि ये सामने वाला काम ऐसे और इतनी आसानी से हो जाएगा, तो मजा आ जाए.

ये मंदिर-मस्जिद का झगड़ा, ये कामनवेल्थ का लफड़ा, सारा कुछ चट से सुलझ जाए. सामने मंदिर का घंटा बजे, तो बगल में मस्जिद में अजान हो. बस बावर्ची फिल्म के राजेश खन्ना सीधे परदे से हमारी जिंदगी में आ जाएं. जब गुस्सा आए, तो गुदगुदाए. जब टेंशन हो, तो हंसाए. तब हम भी गाएं-मेरी जिंदगी में आए हो तुम बहार बनके.

ये जिंदगी नियामत है. उपहार है. हम उसके माध्यम से जान पाएंगे. हमारी जिंदगी के स्याह पन्नों में रंगीनियत की बौछारें होंगी. खाना भी खिलाये, तो कुछ हमारा मजाक भी उड़ाये. जानता हूं कि असल जिंदगी में ऐसा किरदार नहीं मिलता. नहीं संभव हो पाता. लेकिन अगर कहीं मिल जाए, तो जरूर हमारे पास भी भेजिएगा.

Saturday, September 11, 2010

दुआ करिये, करते रहिये

मैंने फेसबुक के स्टेटस में डाला-मैंने तुम्हारे लिये एक ख्वाब देखा. तुम्हारे मेहनत करते हाथों को आराम देने का ख्वाब. सफर करते थक गए तुम्हारे पैरों को आराम देने का ख्वाब. उस ख्वाब को बदलने के लिए दुआ चाहिए. जो मुझे तुम्हारे दुआ के लिए उठते हाथों से ही मिल सकती है. कम से कम तुम्हारी दुआ मेरे काम तो आए, जिससे मैं उन सारी ताकतों को बटोर सकूं, जो तुम्हारे लिये देखे ख्वाबों को पूरा करने के लिए मिल सकते हैं.

आज ईद है. महीने भर की इबादत के बाद ये दिन आया है. दुआओं का असर होता है. हर दिन के अंत में हम जब हिसाब-किताब लगाते हैं, तो लगता है कि जैसे कहीं कोई रह गयी हो. हमारे आसपास की जिंदगी वैसी ही दिखती है. कहीं कोई बदलाव की गुंजाईश नहीं दिखती. मशीन हो गयी जिंदगी में जब कहीं लोग दुआ या किसी प्रेरणा की बात करते हैं, तो लगता है कि कोई जादुगर जादू के शब्दों को जाल फैला रहा है.

काफी कम लोग हैं, जो दूसरों के लिए दुआ या दूसरों की जिंदगी बदलने की बातें करते हैं. कोई सीएम बनना चाहता है, तो कोई जीएम. लेकिन मुझे वैसे कोई शख्स नहीं मिलता, जो दूसरों की बेहतरी के लिए दुआ करना चाहता. सिर्फ दुआ और कुछ नहीं. चंद लोगों के पास पैसा तो बहुत रहता है, लेकिन उनके घर या दोस्तों में उनके लिए दुआ करनेवाले नहीं होते. पूरी जिंदगी वे इसी इंतजार में रहते हैं कि कोई मोहब्बत की दवा के साथ उनके लिए दुआ का भी इंतजाम करे. बताया जाता है कि सच्ची दुआ करनेवालों के सारे गुनाह अल्लाह या खुदा माफ कर देता है.

 पीपली लाइव के कई नत्थे अभी भी हिन्दुस्तानी मिट्टी में हैं, हमारे हाथ उनकी बेहतरी के लिए नहीं उठते. सारे मीडिया के लोग ये जरूर कहते हैं कि इस फिल्म में उनका मजाक उड़ाया गया है. लेकिन ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए खबरों की मशीन बन गए मीडिया के आदमी के लिए कोई तहेदिल से दुआ नहीं करता. दुआ, उस सिस्टम के बदल जाने का , जो उन्हें इस करप्ट हो गयी जिंदगी का हिस्सा बन जाने को कहता है. मुझे किसी बाबा का उपदेश हजारों खबरों के बीच हमेशा ध्यान खींचता है, क्योंकि खबरों के बीच मशीन बन गयी जिंदगी में वो एक खालीपन भर जाता है.

फेसबुक में कोई स्टेटस मुक्ति का बोध कराता है. क्योंकि उनमें सही मायनों में उन अनजाने दोस्तों के लिए दुआ की सुगंध रहती है, जिनसे कोई कभी नहीं मिलता या मिल सकता, क्योंकि वे हजारों मील दूर हैं. लेकिन उनके लिए मन से दुआ निकलती है. हर रिश्ते के लिए खून की जरूरत नहीं होती. कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जो दुआ के सहारे ही बनते हैं. दूसरों की बेहतरी के लिए दुआ करिये, करते रहिये, यही कुछ बदलाव की किरण लाएगा. चाहे कश्मीर का संकट हो या दिल्ली में आयी बाढ़ का. दुआ करो कि संकट या टेंशन टल जाए. दुआ करो.

Sunday, August 1, 2010

सच्चा दोस्त, आज तक सामने नहीं आया.

मैं जिंदगी की हजारों बंदिशों को तोड़ देना चाहता हूं. मैं दूसरों का दर्द समेट लेना चाहता हूं. किसी के अंदर की आग से खुद को जला लेना चाहता हूं. लेकिन वह दूसरा कोई, जो दोस्त कहलाता है, सच्चा दोस्त, आज तक सामने नहीं आया. फेसबुक पर सात सौ दोस्तों की सूची में सही मायने में कहें, तो कोई ऐसा नहीं लगता, जो अंतिम समय में कंधा देने आये. क्या ये मेरे अंदर की गलत भावना है या कुछ और है. जो सच है, वह सच है. आज कल हम किसी के मित्र होने का केवल ढोंग करते हैं. हम किसी के मन से सच्चे मित्र नहीं होते. हमारे पास खुद के अलावा दूसरे किसी मित्र की दुखी कहानी को सुनने का वक्त नहीं है. हम किसी के अपने अंदर की तकलीफ को साझा नहीं करते. आज भले ही रिश्तों की गरीबी के बीच फ्रेडशिप के बहाने बाजार हावी होने की चेष्टा कर रहा हो, लेकिन ये हमारे बीच के रिश्तों के खत्म होने की कहानी है. हमने अपने रिश्ते खुद मिटा दिए.फ्रे़डशिप डे पर फेसबुक पर एक स्टेटस पढ़ा..

When we honestly ask ourselves which person in our lives mean the most to us, we often find that it is those who, instead of giving advice, solutions, or cures, have chosen rather to share our pain and touch our wounds with a warm and tender hand. The friend who can be silent with us in a moment of despair or confusion, who can stay with us in an hour of grief and bereavement, who can tolerate not knowing, not curing, not healing and face with us the reality of our powerlessness, that is a friend who cares. Wish You Happy friendship day


   जब कोई दूसरा मेरे सुख-दुख का साथी नहीं बन सकता, तो मैं आंखें बंद कर किसका ख्याल करके अपनी तकलीफें साझा करूं. थोड़ा दार्शनिक हो जाता हूं, तो सोचता हूं कि सिवाय ईश्वर के मेरा कौन सा मित्र है. उस अंतिम शक्ति को ही मैं अपना सारा भार देकर अपनी शांति को उधारी में ले लाता हूं. जिंदगी की तेज गति में मेरे लिये सिवाय ईश्वर के साथ के और कुछ नजर नहीं आता. आज तक मुझे सच्चे दोस्त की तलाश जारी है.

सच में कहूं तो  मैं खुद भी अपने स्वार्थ में इतना अंधा बन चुका हूं कि किसी के दुख में सहभागी नहीं बन पाता. मेरा मन इसके लिए मुझे लगातार धिक्कारता है. कभी कृष्ण-सुदामा की मित्रता के किस्से सुनकर मन आह्लादित हो जाता था. सोचता था कि कृष्ण जैसा सच्चा दोस्त मुझ गरीब को भी मिल जाए, लेकिन आज तक नहीं मिला. जब भी वह सच्चा दोस्त मिलेगा, तो मैं उसे अपनी सारी तकलीफें बताऊंगा. अपनी जिंदगी की हर कहानी साझा करूंगा. लेकिन वह सच्चा दोस्त, जो मेरी तकलीफों को समझे, सुने, आज तक नहीं मिला.

मैंने भी सच्चे मित्र होने की कोशिश जरूर की, लेकिन ये जालिम दुनिया बनने नहीं देती. अगर उदार होता हूं, तो कहती है सीधा है. अगर थोड़ा टेढ़ा, तो कहती है घमंडी है. थोड़ा पैसा बचाता हूं, तो कहती है कि कंजूस है. खर्च करता हूं, तो कहती है कि खर्चीला हूं. मैं मैं नहीं रहता. मैं सच्चे होने के चक्कर में खुद से भागने लगता हूं. मैं न तो सुदामा बन पाया और न कृष्ण. मैं खुद सच्चा दोस्त नहीं बन पाया. लेकिन थोड़ा स्वार्थी होकर कहूं, तो मुझे सच्चे दोस्त की तलाश है. ऐसे में अब अंतिम शक्ति ईश्वर ही मुझे मेरे सच्चे दोस्त से मिलवायेगा.

Tuesday, July 27, 2010

आदमी की सर्विसिंग नहीं, ऐसा क्यों?

ब्लाग लिखते समय हमेशा गंभीर बातें की जा सकती हैं क्या? हमें लगता है नहीं. जिंदगी का हर किस्सा सीरियस यानी गंभीर होकर नहीं कहा या किया जा सकता है. पूरी बरसात स्कूटर को दौड़ाते रहने का मन किया, लेकिन उसका शरीर जवाब दे गया. बड़ा शरीर, आवाज करते कलपुरजे सर्विसिंग की डिमांड कर रहे थे. हमने सर्विसिंग के लिए दे दी. मशीन या किसी वाहन की सर्विसंग हो जाती है, लेकिन आदमी के शरीर या दिमाग की सर्विसिंग नहीं हो सकती. मेडिकल शाखा आज तक इस शरीर के कलपुरजों को जानने के लिए रिसर्च कर रहा है.शरीर और दिमाग हमारे अहम हिस्से हैं.हम इन्हें जैसे-तैसे यूजकर इनकी ऐसी की तैसी कर देते हैं. हमारा शरीर या दिमाग एक बार चौपट हो जाए, तो इसके लिए लगातार दवा-दारू की जरूरत होती है. वैसे में सर्विसिंग का कांसेप्ट उभरता जरूर है, लेकिन हमारे शरीर-दिमाग के लिए असंभव है. हां, कुछ हद तक योग विद्या या अन्य दूसरे नुस्खों से इसे कुछ हद तक दुरुस्त रखा जा सकता है.हम मशीन के मामले में स्मार्ट बन तो जाते हैं, लेकिन अपनी आदम जात के लिए अब तक कोई उपाय नहीं खोज पाए हैं. वैसे रूस में पढ़ा था कि दिमाग को सुपर साइंस के जरिए लोग संरक्षित रखवा रहे हैं, जिससे कभी तकनीक विकसित होने पर वे पुनर्जन्म ले सकें.भविष्य में क्या हो, कोई नहीं जानता. हम अपने साथ इमोशनल अत्याचार करते रहते हैं. हमारे अंदर प्यार के लिए भटकाव रहता है. हमें प्यार का पेट्रोल और मोहब्बत का मोबिल मिलते रहना चाहिए. जब हमें नहीं मिलता है, तो हमारे शरीर का इंजन दिल छटपटाने लगता है. ब्लड प्रेशर हाई हो सकता है. एक जिंदगी के हजार लफड़े शुरू हो जाते हैं. हमारे विचार से भगवान को आदम जात को बनाते समय ही सर्विसिंग का टेक्निक डेवलप कर देना चाहिए था, जिससे आदमी हमेशा नया रूप धर सकता था. वैसे भी जितनी क्षमता आदमी के पास है,उस हिसाब से वह हमेशा से भगवान को ही चुनौती देने का मन बनाते रहता है. लेकिन भगवान ने सर्विसिंग का तरीका गायब कर जिंदगी कम कर दी. तब भी हमारा ख्वाब लंपटई करने से बाज नहीं आता. हम सौ साल जीना चाहते हैं और कब्र में पैर जाने तक सोने को मुट्ठी में कैद करना चाहते हैं. आदम जात की हालत काफी खराब है. वैसे आदमी की सर्विसिंग का कोई तरीका सुझे तो बताइयेगा.
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