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Monday, January 31, 2011

क्या हमारे सामने इन सवालों को लेकर कोई जवाब है...

ख्वाहिशों की लंबी लिस्ट हमारे पास है. रोज सुबह उठने के बाद काम पर आने के बाद उस लिस्ट में किसी एक चीज को पाने का मन करता है. अगर शाम तक वो चीज नहीं मिलती है, मन मसोस कर रह जाता हूं. उन ख्वाबों में एक ख्वाब बेहतर समाज रचने या बेहतर समाज में जीने का भी है.

हाल में एक रिपोर्ट आयी थी, जिसमें फेसबुक में आइ हेट गांधी ग्रुप बनाकर लोग बापू के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर रहे थे. उनके पास लाख दलीलें हैं. हजारों कारण हैं बापू के प्रति विरोध जताने के. कई लोग इसके बारे में विरोध जताने पर उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हैं.

जाहिर तौर पर इन युवाओं के पास आज के समाज को बेहतर बनाने के लिए खुद के लिए कोई नीति नहीं है. वे अतीत में बनायी गयी परंपराओं और आधार में अपना रास्ता तलाश रहे हैं. ऐसे में बदलते वक्त ने उस सारी परंपराओं के मायने तो बदल ही दिये, आज के युवाओं के लिए अतीत में दिखाए मार्ग को भी अवरुद्ध कर दिया है. सूचना क्रांति के इस दौर जब हर चीज दो दिन में पुरानी हो जा रही है. आंदोलन फेसबुक और टिवटर के सहारे दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने में पहुंच जा रहा है, उस दौर में आज के युवाओं के पास सबसे बड़ा प्रश्न खुद के लिए मार्ग या आधार तय करना है.

आज के युवा खुद के लिए मार्ग नहीं बना पा रहे. उनके पास कहने को हाई सेलरी और फ्लैट हैं, लेकिन घर नाम की चीज नहीं है. फेसबुक पर ही नारी स्वतंत्रता की बात करनेवाले कई बंदे, असहज होती जा रही कई परिस्थितियों के बारे में बातें करना पसंद नहीं करते. वहां पर आप मजाक करनेवाले कमेंट्स करें. कोई टिप्पणी छोड़ दें, तो कमेंट्स मिल जाएंगे. लेकिन अगर आप कोई सार्थक बहस शुरू करें, तो कोई रिस्पांस नहीं मिलता. ज्यादातर लोग टाइमपास के लिए ही इस मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं.

मैं रोज अपने आसपास गुजरते जवान लोगों में हजारों सवाल देखता हूं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल उनके मन में भविष्य की सुरक्षा को लेकर रहता है. यहां झारखंड में नेशनल गेम्स हो रहा है. यहां के जिस मस्कट को स्टेडियम में खड़ा किया जा रहा है, उसमें नेशनल गेम्स २००९ लिखा हुआ है. ऐसे में २०११ में लग रहे उस मस्कट के सहारे ही हम अपने राज्य, समाज में प्रगति को लेकर जिम्मेवारी के बारे में समझ सकते हैं. घोटालों में घोटाला के अभ्यस्त हो चुके हम लोग कोई नई व्यवस्था नहीं रच रहे. हमारे पास अपनी कोई योजना नहीं है.

मिस्र और दूसरे देशों में आंदोलनों से पूरी दुनिया में हलचल है, लेकिन हमारे यहां आज भी १९७४ का ही राग अलापा जा रहा है. हमने आजादी के संघर्ष से आगे किसी नए संघर्ष का सपना नहीं देखा. आजाद ख्यालात के तो हुए, लेकिन नई विचारधारा को आवाज नहीं दे पाए. आज के युवा उसी शून्य की मार झेल रहे हैं. उनके पास अपना कोई ऐसा आधार नहीं है, जिस पर वे अपनी सोच की दीवार खड़ी कर सकें. ऐसे में फेसबुक पर ग्रुप बनाकर जब वे महात्मा गांधी के खिलाफ भड़ास निकाल रहे होते हैं, तो मन खुद को ही गाली देता है. मशीन होती जा रही हमारी जिंदगी हमें कहीं का नहीं छोड़ रही.

रांची जैसे छोटे शहर में युवा आवारगी की सारी हदों को पार करते दिख जाएंगे. कोई घर आए बुजुर्ग की जान ले रहा है, तो कोई सड़क पर सरपट दौड़ती गाड़ियों में रोमांच की खोज कर रहा है. आज के युवा आर्मी में कम से कम जा रहे. वो देश प्रेम का जज्बा कायम नहीं रहा. क्या हमारे सामने उठ रहे इन सवालों को लेकर कोई जवाब है. शायद नहीं...
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