Showing posts with label Arun Shouri.. Show all posts
Showing posts with label Arun Shouri.. Show all posts

Monday, July 25, 2011

क्या आप उन अरुण शौरी जी को जानते हैं, जो पिता हैं...

अरुण शौरी की नई किताब ड.ज ही नो अ मदर्स हार्ट? के अंश दैनिक भाष्कर में छपने के बाद मैं खुद उनके जीवन के दूसरे पहलू से परिचित हुआ. अब तक हमारे जैसे लोगों ने उनके जीवन के उस उजले पक्ष को देखा था, जो दौड़ता है... राजनीति, पत्रकारिता और सामाजिक सरोकार की दुनिया में. लेकिन एक पिता अरुण शौरी के अंतरमन को समझने के लिए अखबार के एक पेज में छपे किताब के कुछ अंश ही काफी हैं. इतना ज्यादा दर्द और उस दर्द से ज्यादा बेटे अदित की जिंदगी को लेकर मन में होते उतार-चढ़ाव को जिस कदर शौरी साहब ने पिरोया है, वो किसी भी मजबूत व्यक्ति को भी विचलित कर देगा. अरुण सीधे उस पिता से, जो भगवान हैं, जिनके ऊपर हमारे जीवन को आधार देने का भार है, उससे सवाल करते हैं.  बेटे के जन्म के बाद वो सीधे इंडिया लौट आए थे. क्योंकि यहां परिवार जैसे बुनियाद अदित की सुरक्षा के लिए जरूरी था. उसके जीवन का संघर्ष बिना किसी के प्रेमाधार के नहीं चल सकता है. हमारे समाज में अपने आसपास आज कल ऐसे न जाने कितने पिता, बेटे या मां हैं, जो अपनों के अपनापन से दूर हो चले हैं. वैसे में अरुण शौरी के जिस तीखे व्यक्तित्व से हम टीवी के स्क्रीन पर रोज रू-ब-रू होते रहते थे, उस कठोर और तीखे तेवर के नीचे निर्मल भावना की ऐसी गंगा बहती होगी, ये मेरी समझ से परे थे. मेरे लिये अरुण शौरी अब एक ऐसे उदाहरण बन गए हैं, जिन्होंने आनेवाली पीढ़ी के लिए बतौर एक पिता उदाहरण पेश किया है. पिता होना एक जिम्मेदारी है. लेकिन उस जिम्मेदारी को सिर्फ जिम्मेदारी न मान कर अपना सर्वस्व समर्पित करने के उदाहरण काफी कम हैं. जो संन्यासी हिमालय में वर्षों तपस्या कर जो सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, वो सिद्धि तो अरुण शौरी बतौर पिता काफी पहले ही हासिल कर चुके होंगे. दैनिक भाष्कर में अदित और उनकी मां की बड़ी तस्वीर भावुक कर देती है. रुला देती है. ये कल्पना करना मुश्किल होता है कि इतना मासूम बच्चा डॉक्टर की लापरवाही या किसी और कारण से आनेवाले समय में इस कदर दर्द से छटपटाता रहा. एक ऐसा दर्द जिसे महसूस करने के लिए आपको भी उसी की जिंदगी जीनी होगी. हम अखबारों में ऐसे कई बच्चों के दर्द को रोज छापते हैं, जो किसी न किसी कारण से पिता या मां के उदासीन रवैये के शिकार रहते हैं. उन हजारों पिता और मां के दिल में दफन हो चुकी ममता की भावना रुला डालती है. मासूम चेहरे कई सवाल पूछ रहे होते हैं. मेरा एक दोस्त जब एक अनाथालय में गया, तो एक मासूम ने उसे उसको पिता से मिलाने को कहा. लेकिन हम उसका पिता कहां से लाकर देते. जीवन सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान नहीं है. ये वो भी चीज नहीं है, जो शायद जिंदगी न मिले दोबारा में दिखाई जाती है. जिसमें फरहान अख्तर का किरदार अपने पिता की खोज में स्पेन तो जाता है, लेकिन नसीरुद्दीन शाह का किरदार वाला पिता अपनी जिंदगी में मस्त दिखता है. वो सीधे कहता है कि वो न तो जन्म लेने के समय बेटे की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार था और अब न बड़े होने के बाद. यानी कि अपनी जिंदगी जिंदाबाद का नारा लगाते हैं. एक तरफ जहां वर्तमान फिल्में अपनी जिंदगी जिंदाबाद का नारा लगाते हुए सामाजिक बिखराव का संदेश दे रही हैं, वहीं अरुण शौरी जैसे लोग अपनी कहानी को पन्नों में समेट कर जिंदगी को दूसरे आईने से देखने को विवश कर देते हैं. रोज-रोज मरते रिश्तों के बीच, फरजी स्वयंवर रचवा कर शादी जैसे संस्थानों को मारते टीवी सीरियल्स के बीच और नारायण दत्त तिवारी के डीएनए टेस्ट जैसे मसले के बीच अरुण शौरी भगवान नजर आते हैं. एक ऐसा भगवान, जो तमाम तरह की व्यस्त जिम्मेदारियों के बीच अपने स्पास्टिक बेटा अदित पर अपना प्यार लुटाते हैं. उसे जीवन की हर खुशियां देते हैं. उसके हर पल को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं.
सबसे बड़ी चीज ये है कि हम आज कल अपने के अलावा किसी और की जिंदगी बेहतर बनाने की कोशिश ही नहीं करते. हमें टेंशन हो जाता है. ये टेंशन ही सोसाइटी को इस कदर मार रहा है कि मेट्रो में रहनेवाली मानसिक रूप से बीमार बहनों की सुधि लेने के लिए भाई नहीं आता और सोसाइटी में रहनेवाले तो माशाल्लाह अपनी जिंदगी में इस कदर व्यस्त हैं कि कोई मरे या जिये,उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. अगर फर्क लाना है, तो ड.ज ही नो अ मदर्स हार्ट?जरूर पढ़िए.
Prabhat Gopal Jha's Facebook profile

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

अमर उजाला में लेख..

अमर उजाला में लेख..

हमारे ब्लाग का जिक्र रविश जी की ब्लाग वार्ता में

क्या बात है हुजूर!

Blog Archive