आसमान में एक तारा होता है ध्रुव तारा. वैसे ही जिंदगी में मां एक ही मिलती है. मां तो सबके लिए अच्छी होती है. पता नहीं क्यों, कुछ लोगों को बुढ़ापे में मां पसंद नहीं आती. मैं मां को तब से याद करता हूं, जब मां के पास खेलकर आने के बाद खाने की मांग किया करता था. ग्रैजुएशन तक मां के बिना जिंदगी की कल्पना नहीं करता था. शादी हुई बच्चे हुए. लेकिन अब भी उसके हाथों से एक प्याली चाय की जिद जुबां पर आ ही जाती है. लोग लाख मन मार कर मुंह फेर लें, लेकिन जब किसी दर्द का अहसास होता है, तो पहला शब्द मां की निकलता है. मां सिर्फ जन्म देनेवाली ही नहीं होती. मां तो वो भी होती हैं, जो लावारिस हो चुके नवजात को अपने सीने से चिपका ताउम्र साथ चलने का वादा करती हैं. ऐसा वादा, जिसे सामान्य आदमी नहीं निभा सकता. सिर्फ मदर्स डे पर ही मां को कितना याद करूं. सुबह से लेकर रात तक मां का साथ जेहन में बना ही रहता है. एक मां, वो शक्तिस्वरूपा भी है, जिसकी ममता की छाया हर पल बरसती रहती है. अपनी इस छोटी जिंदगानी में मां के न जाने कितने रूप देखे हैं. लेकिन दीवार फिल्म में अमिताभ और शशि के बीच का संवाद-मेरे पास मां है, इतने गहरे पैठ गया है कि अब भुलाये नहीं भूलता.ये सारा पैसा, ऐश्वर्य मां के प्यार पर लुटाने को तैयार हूं. मां तो बस एक ही है. उसे आप चाहे जिस रूप में लें. मां तो शक्ति है. क्षमा स्वरूपा है. मां समर्पण का दूसरा नाम है. एक मां फटी साड़ी में भी बच्चे को स्कूल भेजने को तत्पर रहती है. अगर संतान को चोट लग जाए, तो उसकी आंखों से आंसू छलक आते हैं. मां के इस दिवस पर हम नारी जाति के प्रति सम्मान जाहिर करते हैं, लेकिन ये सम्मान हर परिस्थति में बरकरार रहना चाहिए. वैसे मां के लिए दो शब्द-ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की मूरत क्या होगी, क्या होगी. मैंने नहीं देखा है कहीं...ो
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Saturday, May 7, 2011
Sunday, May 9, 2010
मां के स्वरूप को जानने के लिए मृत्यु तक प्रतीक्षा करनी होगी..
आप मां के लिए किस लब्ज का प्रयोग करेंगे। किस शब्द का सहारा लेंगे। मां की कोख से उपजा एक फूल कल उसके खिलाफ ही आवाज बुलंद करे, तो उस पर क्या बीतती है, ये एक मां के दिल से ही पूछना चाहिए। मेरी मां मेरे लिये सबकुछ है। हर किसी के लिए मां का स्वरूप व्यक्तिगत होता है, मेरे लिये भी है, लेकिन जब ममता के व्यापक स्वरूप का बोध होता है, तो लगता है कि मां एक शब्द नहीं, बल्कि इस संसार को शीतलता प्रदान करनेवाली छाया है। जिसके नीचे आकर हम अपने सुख-दुख सबकुछ भूल जाते हैं। सही मायने में कहूं, तो आज तक मैं अपने कपड़ों के मामले में मां पर निर्भर हूं। मां मेरे सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक का ख्याल रखती है। क्या मां के बिना कोई जिंदगी जी जा सकती है,मैं सोच भी नहीं सकता। कभी झुंझलाहट भी होती है, तो मां उसे मुस्कुराहट के साथ झेल लेती है।वैसे जब पहली बार मेरे पास मां है, वाला डायलॉग सुना था, तो लगा था कि क्या बात है? साला एक डायलॉग में शशि कपूर ने अमिताभ को पटकनी दे दी। मां के चरित्र को जीना आसान नहीं होता। पूत कपूत निकल जाये, लेकिन मां की ममता उसे कपूत नहीं मानती। उसके लंबे जीवन की कामना करती रहती है। फिल्म वास्तव में संजय दत्त अपनी मां को न जाने कितने दर्द देते हैं। मां के पास विवशता होती है, वह क्या करे। मां कहां जाये। कैसे बोले, बेटा मैं तेरे भविष्य की चिंता करती हूं। यहां तो संतान का डायलॉग रहता है, मां ये तो तेरी जिम्मेदारी थी। अब मैं अपनी जिंदगी जीना चाहता हूं। क्या एक मां की जिंदगी उसकी अपनी नहीं होती। वह २०-२२ साल तक इसी चंद शब्दों के कथन को सुनने के लिए जिंदा रहती है। मां की लोरी, मां की थपकी और मां का दुलार जादु किये रहता है। वह न रहे, तो जिंदगी का एक हिस्सा खाली ही रह जाता है। मैं मां के व्यापक स्वरूप की जब बातें करता हूं, तो मदर टेरेसा का ख्याल आता है। गरीब, अमीर और कोढी, बीमार या अपंग को अपनी ममता की छांव देनेवाली मदर मां के एक बड़े किरदार के रूप में नजर आती। जो मां के प्यार को नहीं पा सके, उन्होंने मदर टेरेसा की छुअन में उस ममता का एहसास किया। आप किसी वृद्धा को सिर्फ मांजी बोलिये और उसके साथ एक अनोखा रिश्ता जुड़ जाता है। वह आपके सामने अपने सारे दुख उड़ेल देगी। पता नहीं क्यों, जवान होकर संतान अपनी मां को भूल जा रहे हैं। अभी की नयी पीढ़ी के पास अपनी मां के लिए वक्त नहीं है। उसके साथ वह अहसास नहीं है, जिसके सहारे वह अपनी मां के कर्ज को चुका सके। मां के असल स्वरूप को सरोगेट मदर के रूप में भुनाया जा रहा है। कैसे ममता का असली स्वरूप बरकरार रखा जा सकेगा। जो जन्म देनेवाली होगी, वह कैसे उसे दूसरे के हाथों में अपनी कोख से जन्मे जीवन को सौंप देती है। ये हमारा मन नहीं मानता, लेकिन हो रहा है। मां भी बाजारवाद का शिकार है। पैसे लेकर कोख का सौदा किया जा रहा है।
एक बात कहूं, तो इस लेख में मैं मां के स्वरूप की व्याख्या करना चाहता हूं, लेकिन हो नहीं पा रहा। मां के किरदार में इतने बदलाव हुए हैं कि दिग्भ्रमित हो जाता हूं। कैसे कहूं कि यही मां का असली स्वरूप है। तीस पार का हो गया हूं, लेकिन इस किरदार को जानने की कोशिश जारी है। मैं ये नहीं कह सकता कि मैंने मां के पूर्ण स्वरूप को जान लिया है। मैं तो अपने को पिता के तौर पर अनुभव शुरू कर ही रहा हूं। मां के स्वरूप
को जानने के लिए मृत्यु तक प्रतीक्षा करनी होगी। क्योंकि कई अनुभवों के बाद ही इस मुद्दे पर बहस भी हो सकेगी। क्या आप मेरा इंतजार करेंगे?
एक बात कहूं, तो इस लेख में मैं मां के स्वरूप की व्याख्या करना चाहता हूं, लेकिन हो नहीं पा रहा। मां के किरदार में इतने बदलाव हुए हैं कि दिग्भ्रमित हो जाता हूं। कैसे कहूं कि यही मां का असली स्वरूप है। तीस पार का हो गया हूं, लेकिन इस किरदार को जानने की कोशिश जारी है। मैं ये नहीं कह सकता कि मैंने मां के पूर्ण स्वरूप को जान लिया है। मैं तो अपने को पिता के तौर पर अनुभव शुरू कर ही रहा हूं। मां के स्वरूप
को जानने के लिए मृत्यु तक प्रतीक्षा करनी होगी। क्योंकि कई अनुभवों के बाद ही इस मुद्दे पर बहस भी हो सकेगी। क्या आप मेरा इंतजार करेंगे?
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