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Monday, January 16, 2012

हर नयापन अपने पीछे कुछ पुरानापन छोड़ जाता है.

आज मकर संक्रांति है. सुबह-सुबह स्नान कर चूड़ा-दही खाना. रिवाज के हिसाब से. कुछ नयापन का एहसास भी होता है. लेकिन हर नयापन अपने पीछे कुछ पुरानापन छोड़ जाता है. पुराना... जिसकी नींव पर आज का नया खड़ा होता है. मैंने जनवरी के पहले सप्ताह में नए मकान में शिफ्ट किया.. अपना नहीं, बल्कि किराए का. जिंदगी के सफर में समय के हम सब गुलाम होते हैं. वो जैसा कराता है.. हम करते जाते हैं.

पिछले एक साल जिस घर में रहा, अब उस घर की यादें.. कुछ हल्की लकीर की भांति मिटती चली जा रही है. कभी-कभी निगाहें वहां खींची गई पुरानी तस्वीरों पर चली जाती हैं. पिछले साल के कई किस्से यूं ही जेहन में तैर जाते हैं. यहां नए घर में भी अब यादें जुड़ती जा रही हैं. वो भी कल पुरानी हो जाएंगी. हां..यहां नए घर में पुराने बाशिंदों के किस्से दीवारों पर लिखी-पुती हैं. उनके बच्चों के नन्हें हाथों से उकेरी गई तस्वीरें और अक्षर कुछ पल को ठिठकाती हैं. चलते कदम रुक जाते हैं. उम्र जब 40 के पास पहुंचने को होता हो, तो बचपन और ज्यादा अच्छा लगने लगता है. बिना फिकर वाले ओल्ड डेज. जो नहीं लौटेंगे. समय की तेज रफ्तार में जिंदगी तो यूं ही बहती जाती है. खासकर छुट्टी के दिन तो दिमाग उन्हीं लकीरों के आसपास फीलिंग्स को टटोलने को उतारू हो जाता है. एक लत सी लगी रहती है.

संयोग से शरतचंद्र का एक उपन्यास भी पढ़ रहा हूं. नाम है 'श्रीकांत.  श्रीकांत के बचपन के किस्से पढ़कर न जाने क्यों खुद को उसी के आसपास पाता हूं. हां, अंतर बस एक रहता है कि श्रीकांत की जिंदगी गंगा की लहरों के आसपास से होकर गुजरती है, तो मेरा बचपन रांची की पहाडिय़ों को छूता हुआ. वैसे नई शहरी हवा में  पहाडिय़ों पर घर बन गए हैं. हां, तो कह रहा था-दीवारों पर उकेरी गई तस्वीरों में कहानियां ढूढ़ता हूं. बेटियों की बनाई ड्राइंग में खुद के चेहरे को गढ़ा हुआ देखता हूं. मेरी बेटी की पहली क्लास की पहली ग्रुप फोटो खिंचवाई गई है. अच्छी है. बेटी के नन्हे-नन्हे हाथों को पेंसिल पकड़ लिखते देख गुदगुदी सी होती है. उम्मीद है कि ये नन्हे हाथ को बड़े काम करेंगे. वैसे जिंदगी चलते रहने का नाम है-चरैवति..चरैवति.

Friday, January 7, 2011

मेरी जिंदगी के ये गुजरते दिन

कुछ दिनों पहले एक एक्सीडेंट में बाल-बाल बचा, लेकिन स्कूटर का भट्ठा बैठ गया. अब मजबूर होकर पैदल चलना पड़ता है. शुरू में न जाने क्यों पैदल चलने के नाम पर शिकन की हल्की रेखा माथे पर उभर जाती थी. लेकिन दो-चार दिनों के बाद ये मस्ती में बदल गयी. आज-कल रोज पैदल जाने के क्रम में कई ऐसे लोगों से भी दुआ-सलाम कर ले रहा हूं, जिनसे मिले कम से कम तीन से चार साल गुजर चुके हैं. फिटनेस भी बढ़ा है.

 मेरी जिंदगी के पन्नों में ये दिन खुशनुमा पलों में शुमार होते जा रहे हैं. साथ ही पैदल चलने के क्रम में कई बार प्रभु को धन्यवाद देना भी नहीं भूलता. इसका कारण रिम्स से गुजरते वक्त जिंदगी के सुख-दुख के सम्मिलित अनुभवों से गुजरना होता है. वहां से गुजरते वक्त कई बीमार लोगों को इलाज के लिए जाते वक्त ये सोचता हूं कि ये ईश्वर कृपा ही है कि अपनी दो टांगों पर जिंदगी की दौड़ में शामिल हूं. हमारी जिंदगी में चलते सवालों के दौर में हम ज्यादातर समय निगेटिव थिंकिंग को ही तरजीह देते हैं. ऐसे में कभी-कभी हालात आपको उस स्तर पर ले जाते हैं, जहां से आपको सही या गलत का फर्क मालूम पड़ता है. एक बात कहूं, तो अभी की जिंदगी में पैसे से ज्यादा संतुष्टि को ही अहमियत देने की बात होती है, क्योंकि इसके पहले संतुष्ट होने के नजरिये से कभी जिंदगी को नहीं देखा. जो भी हो, जिंदगी पहले जैसी नहीं रही.

इस साल का संकल्प थोड़ा आध्यात्मिकता से भरा है, पैसे को कम, आत्मसंतुष्टि को ज्यादा तरजीह देना है. बस ईश्वर की कृपा से अभी के दौर में मिल रही प्रसन्नता कायम रहे. दोस्तों के लिए भी यही दुआ करता हूं. एक बात का ख्याल और आता है कि सारे लोग गति में हैं. हमारे आसपास किसी के पास अपने दोस्तों के लिए वक्त नहीं है. ऐसे में मैं अपना ज्यादा से ज्यादा समय दोस्तों और परिजनों के बीच गुजारने का इच्छुक हूं. कम से कम खुद को तो दुनिया की भीड़ में अलग कर सकूं. वैसे भी पैसे को लेकर हाय-तौबा से अब घृणा सी होने लगी. जितने भी पैसे मिले, कम से कम दाल-रोटी चलती रहे, केवल यही इच्छा है.

Thursday, October 14, 2010

महासप्तमी की पूजा और मेरी जिंदगी

दुर्गाबाटी में सप्तमी की महाआरती
भगवान विष्णु शेषनाग पर लेटे हुए. 
ये हाउसिंग कालोनी में पंडाल के सामने बना है.
या देवी सर्वभूतेषु..
मां दुर्गा की आराधना मं लीन इस जगत में हम एकाकी बन मात्र दर्शक की भूमिका में आ बैठे हैं. हर दुर्गापूजा की तरह इस बार कुछ स्पेशल है. स्पेशल ये है कि मैं इस बार पूजा में बेटियों संग भटकता रहा इस पंडाल से उस पंडाल. पंडालों की अपनी कहानी होती है. वहीं हमारे शहर में स्थित दुर्गाबाटी की बात निराली है.  शाम में जब अंत में मां के दर्शन को बेताब होकर दुर्गाबाटी पहुंचा तो ढाक की गूंज ने अंतरमन में मौजूद सारे द्वंद्व धो डाले. ये वो समय था, जहां शब्दों की लफ्फाजी के कोई मायने नहीं रह जाते. क्योंकि हम सारे लोग उस समय भीड़ रहते हुए भी मां के स्वरूप से साक्षात दर्शन कर रहे होते हैं.


मैं और मेरा दोस्त अखिलेश पंडाल में
दुर्गाबाटी  में  परंपरागत तरीके से पूजा की जाती है. बंगाली समाज द्वारा आयोजित यहां की पूजा सादगी के लिए प्रसिद्ध है. यहां मां की मूर्ति का स्वरूप हर साल एक ही रहता है. यहां आप जाकर मन की शांति की खोज कर सकते हैं. मैं व्यक्तिगत रूप से मां के उस अहसान को नहीं भूल सकता है,जब एक परीक्षा के शुरू में यहां पहुंच कर मां की मदद मांगी थी और मां ने कई हाथ मदद को आगे बढ़ा दिए थे. उस समय हमने वैसी कोई आशा नहीं की थी. बस सारा कुछ मां पर छोड़ दिया था और मां ने मदद पहुंचाया भी.

हमारी कॉलोनी में बना पूजा पंडाल
मूर्ति तो एक माध्यम होती  है, लेकिन कुछ पल ऐसे होते हैं, जिस समय लगता है कि मां स्वयं वहां मौजूद हों. शायद कह रही है कि हे वत्स तुझे भटकने की क्या जरूरत है, मैं तो हमेशा तेरे पास हूं. भीड़ में चलते हुए एक बात का अहसास हुआ कि हमारे साथ चलते हुए कई जय माता दी जय जयकार करते चलते रहे. , मां की मर्जी के हिसाब से हम भी पंडाल दर पंडाल उनके दर्शन करते चलते हैं. मां की दी हुई शक्ति के सहारे ही हमारे पैर शहर की उन दूरियों को तय कर लेते हैं,जिनके बारे में प्रायः सोचते भी नहीं.

दोस्त मयंक दुर्गाबाटी में
रांची शहर की दुर्गापूजा में एक सम्मिलित प्रयास का अहसास होता है. यहां के सारे लोग पूजा को सफल बनाने में लगे रहते हैं. इसकी बानगी आपको शहर की सड़क पर चलते लोगों की भीड़ में दिखेगी. एक अनुशासन का अहसास साफ होता है. भले ही हम कितने भी बड़े आलोचक हो जाएं, लेकिन पूजा को लेकर जैसी अनुशासन दिखती है, वह काबिलेतारीफ है. दुर्गाबाटी में ढाक को बजते देखना भी मन को प्रसन्न कर जाता है. सीडी पर रिकार्डेड ढाक की धुन में वैसी शक्ति नहीं मिलती है, जैसी साक्षात ढाक बजाते ढाकियों को देखने से मिलती है. ये पूजा हजारों लोगों की जीवन-रोटी भी तय करती है. एक बाजार बनता है, जिसके दम पर कई की रोजी-रोटी चलती है. हमारे जेहन में ये दुर्गापूजा हमेशा मौजूद रहेगी.

Sunday, May 9, 2010

मां के स्वरूप को जानने के लिए मृत्यु तक प्रतीक्षा करनी होगी..

आप मां के लिए किस लब्ज का प्रयोग करेंगे। किस शब्द का सहारा लेंगे। मां की कोख से उपजा एक फूल कल उसके खिलाफ ही आवाज बुलंद करे, तो उस पर क्या बीतती है, ये एक मां के दिल से ही पूछना चाहिए। मेरी मां मेरे लिये सबकुछ है। हर किसी के लिए मां का स्वरूप व्यक्तिगत होता है, मेरे लिये भी है, लेकिन जब ममता के व्यापक स्वरूप का बोध होता है, तो लगता है कि मां एक शब्द नहीं, बल्कि इस संसार को शीतलता प्रदान करनेवाली छाया है। जिसके नीचे आकर हम अपने सुख-दुख सबकुछ भूल जाते हैं। सही मायने में कहूं, तो आज तक मैं अपने कपड़ों के मामले में मां पर निर्भर हूं। मां मेरे सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक का ख्याल रखती है। क्या मां के बिना कोई जिंदगी जी जा सकती है,मैं सोच भी नहीं सकता। कभी झुंझलाहट भी होती है, तो मां उसे मुस्कुराहट के साथ झेल लेती है।वैसे जब पहली बार मेरे पास मां है, वाला डायलॉग सुना था, तो लगा था कि क्या बात है? साला एक डायलॉग में शशि कपूर ने अमिताभ को पटकनी दे दी। मां के चरित्र को जीना आसान नहीं होता। पूत कपूत निकल जाये, लेकिन मां की ममता उसे कपूत नहीं मानती। उसके लंबे जीवन की कामना करती रहती है। फिल्म वास्तव में संजय दत्त अपनी मां को न जाने कितने दर्द देते हैं। मां के पास विवशता होती है, वह क्या करे। मां कहां जाये। कैसे बोले, बेटा मैं तेरे भविष्य की चिंता करती हूं। यहां तो संतान का डायलॉग रहता है, मां ये तो तेरी जिम्मेदारी थी। अब मैं अपनी जिंदगी जीना चाहता हूं। क्या एक मां की जिंदगी उसकी अपनी नहीं होती। वह २०-२२ साल तक इसी चंद शब्दों के कथन को सुनने के लिए जिंदा रहती है। मां की लोरी, मां की थपकी और मां का दुलार जादु किये रहता है। वह न रहे, तो जिंदगी का एक हिस्सा खाली ही रह जाता है। मैं मां के व्यापक स्वरूप की जब बातें करता हूं, तो मदर टेरेसा का ख्याल आता है। गरीब, अमीर और कोढी, बीमार या अपंग को अपनी ममता की छांव देनेवाली मदर मां के एक बड़े किरदार के रूप में नजर आती। जो मां के प्यार को नहीं पा सके, उन्होंने मदर टेरेसा की छुअन में उस ममता का एहसास किया। आप किसी वृद्धा को सिर्फ मांजी बोलिये और उसके साथ एक अनोखा रिश्ता जुड़ जाता है। वह आपके सामने अपने सारे दुख उड़ेल देगी। पता नहीं क्यों, जवान होकर संतान अपनी मां को भूल जा रहे हैं। अभी की नयी पीढ़ी के पास अपनी मां के लिए वक्त नहीं है। उसके साथ वह अहसास नहीं है, जिसके सहारे वह अपनी मां के कर्ज को चुका सके। मां के असल स्वरूप को सरोगेट मदर के रूप में भुनाया जा रहा है। कैसे ममता का असली स्वरूप बरकरार रखा जा सकेगा। जो जन्म देनेवाली होगी, वह कैसे उसे दूसरे के हाथों में अपनी कोख से जन्मे जीवन को सौंप देती है। ये हमारा मन नहीं मानता, लेकिन हो रहा है। मां भी बाजारवाद का शिकार  है। पैसे लेकर कोख का सौदा किया जा रहा है।
एक बात कहूं, तो इस लेख में मैं मां के स्वरूप की व्याख्या करना चाहता हूं, लेकिन हो नहीं पा रहा। मां के किरदार में इतने बदलाव हुए हैं कि  दिग्भ्रमित हो जाता हूं। कैसे कहूं कि यही मां का असली स्वरूप है। तीस पार का हो गया हूं, लेकिन इस किरदार को जानने की कोशिश जारी है। मैं ये नहीं कह सकता कि मैंने मां के पूर्ण स्वरूप को जान लिया है। मैं तो अपने को पिता के तौर पर अनुभव शुरू कर ही रहा हूं। मां के स्वरूप
को जानने के लिए मृत्यु तक प्रतीक्षा करनी होगी। क्योंकि कई अनुभवों के बाद ही इस मुद्दे पर बहस भी हो सकेगी। क्या आप मेरा इंतजार करेंगे?

Thursday, April 22, 2010

मेरी बड़ी बेटी आज तीन साल की हो गयी..

मेरी बड़ी बेटी आज तीन साल की हो गयी। तीन साल देखते-देखते बीत गए। काफी कुछ कहने-बोलने को है। तीन साल की सोना और एक साल की सौम्या आज हमारी जिंदगी के अहम हिस्से हैं। उनके साथ टाम एंड जेरी की शैतानी और छोटा भीम की हर जांबाजी को देखना हमारी विवशता है। कोई और चैनल लगाया सिवाय कार्टून छोड़कर तो हंगामा बरप जाता है। प्रकृति के साथ उनका अनोखा सामंजस्य रहता है। सूरज की पहली किरण के साथ जगना और ढलने के साथ सो जाना उनका नियम है। इन सबके बीच हमारी जिंदगी हमारी नहीं रहती। उसकी हमउम्र अन्य बच्चों को भी देखता हूं, तो अब जाकर जिम्मेदारी का अनोखा बोध होता है। ये बोध, ऐसा है, जो एक पिता ही महसूस कर सकता है। एक मजबूत पीढ़ी तैयार करने की जिम्मेदारी का बोध। इस पीढ़ी पर ही हमारे देश की प्रगति निर्भर करेगी। मुझे अपनी बेटी को हर वह खुशी देने की इच्छा होती है, जो हमने महसूस की है। लेकिन जिस प्रकार का समाज बन रहा है और आसपास का माहौल बदल रहा है, उसमें एकाकी होते जा रहे जीवन में उनका संघर्ष कैसा होगा, ये सोचनेवाली बात है। कंक्रीट के जंगल बनते जा रहे शहर, जिंदगी का दबाव और दूसरी चीजें जिंदगी के रस को निचोड़ ले रही हैं। एक बच्चा क्या चाहता है, मैदान में दौड़ लगाना, लेकिन शहरों में मैदान नहीं बचे रह गये हैं, कहां दौड़ेंगे आज-कल के बच्चे। हर बच्चे को ये सुविधा उपलब्ध कराना समाज की जिम्मेदारी है, लेकिन समाज इन जिम्मेदारियों से पीछे भाग रहा है। मैं अपनी बेटियों को उस दबाव से मुक्त रखना चाहूंगा, जहां प्रतियोगिता शुरू होती है। खुद का विकास हो, यही मेरा उद्देश्य होगा। कोई ऐसी योजना नही होगी, जहां उनकी जिंदगी मशीन बनती हो। खुद के व्यक्तित्व के प्रति जिम्मेदार बनो, ये जरूरी है। आज लोग खुद के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं, वे जरूरत से ज्यादा पाना चाहते हैं। इसी चाहत में सीमा को पार कर जाते हैं। उस सीमा को पार करने के बाद उनकी रंगीन जिंदगी बदरंगी हो जाती है। हम तो बेटियों को हमेशा कहेंगे, जहां रहो खुश रहो। क्योंकि खुश रहना ही जिंदगी है। जहां खुशी नहीं है, वहां पैसे की पूजा कर क्या होगा। क्या जिंदगी में खुशी के दो पल पैसे से खरीदे जा सकते हैं। थोड़ा मामला दार्शनिक हो सकता है, लेकिन सच्चाई यही है। जिंदगी को बिंदास जीना है, चाहे जैसे भी  हो, यही कहना चाहूंगा।

Saturday, April 17, 2010

शायद कल रफ्तार तेज हो जाये...

कभी-कभी लगता है, जैसे कुछ काम नहीं होगा। लगता है, जैसे अपने बस में कुछ नहीं। सुनते हैं कि बर्नआउट वाले स्टेज में ऐसा होता है। क्या हमने ऐसा कर लिया है क्या? इतना काम कर लिया है? या हमारे पास टॉपिक या यूं कहें मुद्दों की भरमार नहीं है। मैं अब सानिया मिर्जा एपिसोड या आइपीएल विवाद पर नहीं लिखना चाहता। क्या लिखें कि हम पब्लिक लोग इतने बेवकूफ हैं कि इस खेल को नहीं समझ सकते। ये पैसा, ये बाजार, ये दुनिया, ये संसार सारा कुछ एक वहम है। यही बात बार-बार मन में आती है। पिछले तीन-चार दिनों से उंगलियों टिपियाने को नहीं उठती। सही में कहूं, तो जब आज लिखने की इच्छा हुई, तो यही लिखा कि कुछ लिखने का मन नहीं कर रहा। अब तो ब्लागियाने का टेंशन पता नहीं जाता रहा। उसमें वह आकर्षण भी नहीं रहा शायद। सारा कुछ उलट-पुलट लगता है। धूप में निकलो तो खोपड़ी जलने लगती है। छाता लेकर निकलनेवाले लोग चिढ़ाते हैं। छाया को अपना साथी बनाये चलते हैं। जिंदगी में आ रहे बदलावों के साथ हमारे इस ब्लागियाने की रफ्तार में भी थोड़ी कमी आयी है। सारा कुछ धीरे-धीरे बदल रहा है। मैं ज्यादा टेंशन नहीं लेना चाहता। फेसबुक पर भी स्टेटस में लिखा-सबकुछ स्लो-स्लो है।  शायद कल रफ्तार तेज हो जाये....

Thursday, September 3, 2009

या खुदा, हे ईश्वर, हे ऊपरवाले ये किस चक्कर में फंसा दिया

ब्लागिंग के चक्कर में देर रात दो बजे सोना, फिर सुबह आठ बजे उठना। सारा रूटीन अस्त-व्यस्त। अनुलोम-विलोम करने की भी फुर्सत नहीं।
यहां उठने के बाद बुढ़ऊ सबके अनुलोम-विलोम, टहलना-घूमना, गरियाते हुए सिस्टम को चुनौती देते देखते हैं। या खुदा, हे ईश्वर, हे ऊपरवाले ये किस चक्कर में फंसा दिया


ब्रेकिंग न्यूज... ब्रेकिंग न्यूज...

हमारा वजन और दो किलो बढ़ गया। कारण- फिर वही टिपियाते रहना, ब्लागिंग करते रहना। इसके लिए दोषी कौन है? इसके लिए मोटिवेटर के रूप में किसने काम किया है, ये जांच का विषय है।






ऊपर मोटी बिल्ली मौसी की तस्वीर ये चेताने के लिए कि हमारी हालत भी ऐसी ही न हो जाये। चिकित्सक महोदय घूमने-फिरने और टहलने के लिए भी बोलते हैं। चीन में तो इंटरनेट से चिपके रहने को बीमारी के रूप में लिया जा रहा है। वहां इसके लिए जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है। इसलिए अब ज्यादा टेंशन नहीं लेकर सकारात्मक यानी पोजिटिव वे में टिपियाना प्रक्रिया करते रहना पड़ेगा। यानी अंतराल-अंतराल पर, लगातार नहीं


जब पहले दिन लिखे थे, तो आप लिखते रहें, हिन्दी की सेवा करते रहें... वाली पंक्ति पढ़ने के बाद जोश-ए-हिन्दुस्तान में पूरा सिस्टम को चैलेंज देते हुए धड़ाध़ड़ लिखते रहें। लिखेंगे क्या, बस उगलते चले गये, जो मन में आया।

अब यहां साल बीतने के बाद शुद्ध-अशुद्ध के चक्कर में विवादित भी हो गया। प्रोफाइल बदल डाला। सुना था कि नाम में क्या रखा है, अब संतोष के लिए बोलेंगे प्रोफाइल में क्या रखा है?

तुम भी आदमी.. हम भी आदमी.... तुम्हारा खून भी लाल... हमारा खून भी लाल...

तुम चालाक..... हम ..... (गेस करिये, ये आप पर छोड़ रहे थे)

कह रहे थे कि ब्लागिंग का चक्कर मल्टीफेरियस प्रोबलेम में फंसाने के लिए काफी है। सुना है कि अमिताभ बच्चन भी ब्लागिंग करते हुए नाराज हो चले थे। लेकिन यहां हम नाराज होकर क्या करेंगे? हम बोलेंगे कि नहीं लिखेंगे, तो हमको टेरेगा कौन? यहां तो लोग हम नहीं लिखेंगे, बोलकर थोड़ी मिन्नत की उम्मीद करते रहते हैं? कम से कम मार्केट रेट तो बढ़ जाता है।


वैसे एक बात खास है कि बाहरी दुनिया से रू-ब-रू तो हो ही लेते हैं।

ब्लागिंग-शलागिंग कर लेते हैं लिख लेते है,
कह देते हैं
निपट गंवार जानके हमको
दुनियावाले रपट देते हैं

हमरी जिंदगी है क्लामेक्स
भरी
सबको है बड़ी हड़बड़ी

इसलिए कहीं नहीं जाके

इत्मीनान से टिपिया के

सुकून भरी जिंदगी का मजा लूट लेते हैं

ब्लागिंग-शलागिंग कर लेते हैं

(ओवरऑल नया कवि हूं, कुछ प्रोत्साहित जरूर करेंगे)

Sunday, January 11, 2009

तलाश है एक खुशनुमा शाम की

ये शाम मस्तानी मदहोश किये जाये..... किशोर की आवाज लिये और राजेश द्वारा अभिनीत गीत मन में उमंगों के तराने छेड़ देते हैं। शायद आपके मन में भी होता होगा।
मैं पत्रकारिता में डेस्क जॉब से जुड़ा हूं और सामान्य तौर पर हर दिन शाम के चार से रात के १२ बजे तक मेरा जीवन आफिस में सिमटा रहता है। उस हिसाब से हर दिन की शाम मेरी जिंदगी से दूर ही रहती है। एसी रूम और ऊंची दीवारें बाहरी प्राकृतिक दुनिया से मेरे जीवन को दूर कर देती हैं।
इस कारण शाम में आकाश में छायी वो लाली और गोधूली बेला का वो रूमानी दृश्य देखे शायद सालों गुजर गये। कभी कभार जोर जबरदस्ती छुट्टी के दिनों में शाम में घूमने निकल भी जाता हूं, तो वो ख्यालात जेहन में नहीं आते, जो बेफिक्र मन से शाम में सामान्य तौर पर टहलते हुए आते होंगे। यानी नौकरी के इन १२ सालों ने शाम की जिंदगी को दूर कर दिया है।
जब दूसरों को देखता हूं, तो कुछ कल्पना मिश्रित और कुछ खुद की यादों के सहारे एक तस्वीर उकेरने की कोशिश करता हूं कि शाम ऐसी होती होगी, वैसी होती होगी। लेकिन एक टीस मन में रह ही जाती है। एक ददॆ दिल के कोने में छुपा ही रह जाता है। एक बच्चा जो कहीं किसी कोने में छुपा है, बाहर आने को छटपटाता रह जाता है। शाम में पहाड़ों पर चढ़ना, खेलना और लड़ना याद आता है। याद आता है, पहाड़ी की चोटियों पर चढ़ कर पूरे रांची शहर की हरियाली को देखना। याद आता है, टैगोर हिल की चोटी पर चढ़कर अध्याम की बुलंदियों को कोशिश करते लोगों को देखना। याद आता है, लोगों का बतकही करते हुए ठठ्ठा कर हंसना। यानी सिफॆ यादें ही बाकी रह गयी हैं। जिंदगी सरपट भागती चली जाती है। और मैं एक खुशनुमा शाम का अहसास लिये बस जिंदगी जिये चला जा रहा हूं। क्या आप मेरी उस एक खुशनुमा शाम को लौटाने में मेरी मदद कर सकते हैं।
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