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Thursday, October 14, 2010

महासप्तमी की पूजा और मेरी जिंदगी

दुर्गाबाटी में सप्तमी की महाआरती
भगवान विष्णु शेषनाग पर लेटे हुए. 
ये हाउसिंग कालोनी में पंडाल के सामने बना है.
या देवी सर्वभूतेषु..
मां दुर्गा की आराधना मं लीन इस जगत में हम एकाकी बन मात्र दर्शक की भूमिका में आ बैठे हैं. हर दुर्गापूजा की तरह इस बार कुछ स्पेशल है. स्पेशल ये है कि मैं इस बार पूजा में बेटियों संग भटकता रहा इस पंडाल से उस पंडाल. पंडालों की अपनी कहानी होती है. वहीं हमारे शहर में स्थित दुर्गाबाटी की बात निराली है.  शाम में जब अंत में मां के दर्शन को बेताब होकर दुर्गाबाटी पहुंचा तो ढाक की गूंज ने अंतरमन में मौजूद सारे द्वंद्व धो डाले. ये वो समय था, जहां शब्दों की लफ्फाजी के कोई मायने नहीं रह जाते. क्योंकि हम सारे लोग उस समय भीड़ रहते हुए भी मां के स्वरूप से साक्षात दर्शन कर रहे होते हैं.


मैं और मेरा दोस्त अखिलेश पंडाल में
दुर्गाबाटी  में  परंपरागत तरीके से पूजा की जाती है. बंगाली समाज द्वारा आयोजित यहां की पूजा सादगी के लिए प्रसिद्ध है. यहां मां की मूर्ति का स्वरूप हर साल एक ही रहता है. यहां आप जाकर मन की शांति की खोज कर सकते हैं. मैं व्यक्तिगत रूप से मां के उस अहसान को नहीं भूल सकता है,जब एक परीक्षा के शुरू में यहां पहुंच कर मां की मदद मांगी थी और मां ने कई हाथ मदद को आगे बढ़ा दिए थे. उस समय हमने वैसी कोई आशा नहीं की थी. बस सारा कुछ मां पर छोड़ दिया था और मां ने मदद पहुंचाया भी.

हमारी कॉलोनी में बना पूजा पंडाल
मूर्ति तो एक माध्यम होती  है, लेकिन कुछ पल ऐसे होते हैं, जिस समय लगता है कि मां स्वयं वहां मौजूद हों. शायद कह रही है कि हे वत्स तुझे भटकने की क्या जरूरत है, मैं तो हमेशा तेरे पास हूं. भीड़ में चलते हुए एक बात का अहसास हुआ कि हमारे साथ चलते हुए कई जय माता दी जय जयकार करते चलते रहे. , मां की मर्जी के हिसाब से हम भी पंडाल दर पंडाल उनके दर्शन करते चलते हैं. मां की दी हुई शक्ति के सहारे ही हमारे पैर शहर की उन दूरियों को तय कर लेते हैं,जिनके बारे में प्रायः सोचते भी नहीं.

दोस्त मयंक दुर्गाबाटी में
रांची शहर की दुर्गापूजा में एक सम्मिलित प्रयास का अहसास होता है. यहां के सारे लोग पूजा को सफल बनाने में लगे रहते हैं. इसकी बानगी आपको शहर की सड़क पर चलते लोगों की भीड़ में दिखेगी. एक अनुशासन का अहसास साफ होता है. भले ही हम कितने भी बड़े आलोचक हो जाएं, लेकिन पूजा को लेकर जैसी अनुशासन दिखती है, वह काबिलेतारीफ है. दुर्गाबाटी में ढाक को बजते देखना भी मन को प्रसन्न कर जाता है. सीडी पर रिकार्डेड ढाक की धुन में वैसी शक्ति नहीं मिलती है, जैसी साक्षात ढाक बजाते ढाकियों को देखने से मिलती है. ये पूजा हजारों लोगों की जीवन-रोटी भी तय करती है. एक बाजार बनता है, जिसके दम पर कई की रोजी-रोटी चलती है. हमारे जेहन में ये दुर्गापूजा हमेशा मौजूद रहेगी.

Saturday, July 17, 2010

फेसबुक मित्रों आपकी तमाम शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद

फेसबुक पर मित्रों की लंबी फेहरिस्त है. जाने-अनजाने कभी टिपिया कर, तो कभी चैट बॉक्स पर जाकर बतियाने की प्रक्रिया जारी रहती है. १६ जुलाई को अपने जन्मदिन पर वहां पर बधाई देनेवालों की लंबी संख्या देखकर ये लगा कि इतने शुभचिंतक साइबर की दुनिया में मौजूद हैं.

 फेसबुक के बहाने अगर ३०-४० से ज्यादा लोगों के जेहन में हमने अपनी मौजूदगी दर्ज करायी है, तो मैं इसे अपनी सफल कोशिश कहूंगा. जब पूरी दुनिया में रिश्तों का बिखरना जारी है. लोग नए रिश्ते यूं ही तोड़ दे रहे हैं, तब बिना किसी स्वार्थ के देश और दुनिया के किसी छोर पर बैठे व्यक्ति द्वारा जन्मदिन के मौके पर बधाई देने आह्लादित यानी मन को खुश कर जाता है. कोई व्यक्ति आपके लिए खुशी की कामना कर रहा है, इससे बढ़कर और क्या बातें हो सकती हैं. जीवन में कई खुशियां शामिल रहती हैं, लेकिन मेरी ये खुशी कुछ अलग है. जाने-अनजाने घर बैठे मुझे फेसबुक ने इतने दोस्त दिए हैं कि शुक्रिया जैसा शब्द कहना छोटा पड़ जाएगा. हमारी जैसी पृष्ठभूमि रही है, उसमें जन्मदिन के दिन घर में ही खीर और हलुवा बनाकर खा-पीकर जन्मदिन मना लेने की प्रवृत्ति रही है. वैसे में फेसबुक पर मौजूद दोस्त ऐसे दिन में खुशियां बांटते हैं, तो लगता है कि अब इस दिवस को कुछ अलग तरह से मनाया जाए.

लेकिन मेरे साइबर दुनिया के दोस्तों मैं कैसे एक जगह पर सारे लोगों को बुलाऊं, ये आप ही बता सकते हैं. हमारी और आपकी मजबूरी समान है. जो गति तोरी वो गति मोरीवाली बात है. ऐसे में मैं तो यही कहूंगा कि मेरी ओर से आप धन्यवाद के प्रस्ताव को स्वीकार कीजिए और मुझे जिंदगी को बेहतर बनाने के तरीके बताते रहिए. कम ही दोस्त होते हैं, जो सही मोड़ पर सही दिशा बताते हैं. आपके स्टेटस पढ़कर जिस जानकारी की जरूरत होती है, वो तो ऐसे ही पूरी हो जाती है, लेकिन जन्मदिन के बहाने एक संवाद की ओर छोटा कदम आगे बढ़ा है, उसे और बढ़ाते चलिये. जिंदगी में आप जैसे दोस्तों का अहम स्थान है. कुछ दोस्त उम्र में भी बड़े हैं. उम्मीद है कि उनके अनुभव का भी लाभ आनेवाले दिनों में मिलेगा. रास्ते में जिंदगी का कारवां यूं ही आगे बढ़ता रहेगा, बस आपके सहयोग की दरकार है. आपकी तमाम शुभकामनाओं के लिए एक बार फिर धन्यवाद.

Tuesday, February 16, 2010

फैशन के तौर पर दोस्त बनाये रखने से क्या फायदा



मोबाइल पर मैसेज भेजकर एक साथ सैकड़ों लोगों को पीआर स्ट्रांग करने की तैयारी कर रहा हूं। होली में, दीवाली में, एक साथ पहले इतने लोगों को विश नहीं कर पाता था, लेकिन अब उंगलियों के सहारे बटन दबाकर मैसेज टिपिया कर भेज देता हूं। मेरी बातें, मेरी जिंदगी फास्ट हो गयी हैं। फास्ट ट्रैक पर सरपट दौड़ रही है। उनके बीच करीब रहनेवाला दोस्त यूं ही कभी मिल भी जाता है, तो घर नहीं आता। क्योंकि उसकी लाइफ बिजी है। अब जीमेल पर ही बज पर ही कमेंटों का दौर भी हो जाता है।

कुछ ऐसे ही तकनीकी दौर के शिखर पर खड़े होकर हम संबंधों की नयी रचना करने की कोशिश करते हैं। एक दिल की बात कहना चाहता हूं कि फेसबुक पर हमारे ६५० से ज्यादा दोस्त हो गए। उसमें से कुछ नामचीन लोग भी हैं। उन्हीं में से एक को मैंने चैट बॉक्स से पोक करके बात करने की कोशिश की, शायद कुछ बात हो। लेकिन उनके पास समय नहीं था। वैसे ६५० दोस्तों में से कई अब तक अनजान हैं। सिर्फ उनके चेहरे दिखते हैं। क्या ऐसे अनजान लोगों को दोस्त बनाये रखना जरूरी है? सोचता हूं कि जो बच गए रिश्ते या दोस्ती है, उन्हें ही निभाता चलूं। ये सोशल नेटवर्किंग साइट पर अगर एक हजार दोस्त भी बन जाएं और टि्वटर पर दो हजार फॉलोवर भी और उनके हमारे साथ किसी प्रकार का संवाद नहीं हो, तो फैशन के तौर पर उन्हें दोस्त बनाये रखने से क्या फायदा

पहले दोस्त बनाने से पहले सोचता नहीं था। लेकिन अब ये सोचता हूं कि ये एक बकवास काम है। यहां बकवास इसलिए कि इसमें भी अपना स्वार्थ है कि हमारी बात ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे। जबर्दस्ती संबंधों को ढोए जाने से बेहतर है कि उन संबंधों को तोड़ दिया जाए। जब हम रिश्ते नहीं बनाये रख सकते, जब संवाद ही नहीं हो पाते, तो फिर इन्हें ढोया क्यों जाए? 


हमारे पड़ोस में, हमारे दोस्तों में एकल परिवार की अवधारणा शायद इन्हीं कारणों से सफल हो रही है। जब रिश्ते नहीं कायम रह सकते, तो उन्हें तोड़ देना ही बेहतर है। सबसे बड़ी चीज खुशी है। जब व्यक्तिगत स्तर पर अहं को संतुष्टि मिले और संवादों का एक प्रवाह कायम हो, तभी जीवन की सार्थकता है। सीधे शब्दों में कहें, तो फेसबुक अब एक पागलपन की तरह लगता है, जब टिपिया तो आते हैं, लेकिन वहां जो संवाद होता है, वह सिर्फ उच्च मानसिक स्तर या आदर्शों का बोध कराता है, जो जाहिर तौर पर असलियत का उलटा रूप होता है। हम जो नहीं होते, उसे वहां दिखाने जाते हैं। व्यावहारिक स्तर पर भी उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि समस्या के हल के लिए जमीनी स्तर पर कोई कार्य भी नहीं होता।

सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें लिख देने और उन पर टिप्पणियों के लालच में हम जो समय गुजार देते हैं, उसका इस्तेमाल किताबों और पत्रिकाओं में लगाया जाए।

नहीं चाहिए ऐसी दोस्ती
जहां न मिले कोई झप्पी
न मिले कोई शाबासी
और न मिले दिल को दुखानेवाले दो-चार शब्द
बस नमस्ते-नमस्कार करके
एटिकेट-आदर्शोंवाले दायरे में 
बंधकर, नहीं मार सकता 
खुद को
मुझे जीना है लंबा
बेहतर रिश्तों के साथ
भले ही दो-चार हों
लेकिन वे दिलवाले हों 
और उनमें हो, एक अपनापन
नहीं चाहिए ऐसी दोस्ती
जहां न मिले कोई झप्पी
न मिले कोई शाबासी


हमने तो फेसबुक पर अपने स्टेटस में कमेंट भी डाला कि फेसबुक के दोस्तों, बड़ी बातें तो कर लेते हो, लेकिन क्या दिन में दो घंटे भी अपने करीबी लोगों के लिए निकालते हो क्या?

ये एक ऐसा सवाल है, जो कि रह-रहकर मेरे मन में कौंधता है और तीर की तरह मन में चुभता है। ये एक ऐसा सवाल है, जो इंटरनेट प्रेमी हर शख्स के सामने सवालों का दौर खड़ा करेगा।

Saturday, July 11, 2009

फेसबुक तुम्हें हमारी दोस्ती का सलाम।


एक सवाल फेसबुक को लेकर उठा। फेसबुक यानी सोशल नेटवर्किंग साइट, जिसकी जादू से हम क्या, बड़े-बडे़ नहीं बच पाए। एक बात बताइए, क्या हम सिर्फ उन्हीं अतीत के लोगों को अपने दायरे में रखेंगे या बातचीत के लिए चुनेंगे, जो हमारे संपर्क में रहे या हैं। सवाल ये है कि आपका नजरिया क्या है? जब सोशल नेटवर्किंग साइट का आप उपयोग करते हैं, तो अनायास ही आप सैकड़ों लोगों से जुड़ते चले जाते हैं। ये एक नहीं रुकनेवाला क्रम है।

सबसे बड़ी बात है कि दोस्ती के मर्म को समझना कठिन है। निजी जिंदगी में दोस्त हमेशा सुख-दुख की भावना का ख्याल रखते हैं। वैसे में फेसबुक पर जो दोस्त बने हैं, उनसे वैसी ही भावना की अपेक्षा करना क्या उचित है? मैं तो हर उस दोस्ती के आग्रह को स्वीकार करता हूं, जो मेरे पास आता है। मेरा मानना है कि अगर कोई मेरे लिए बुरा है, तो मैं क्यों दूसरों के लिए बुरा होऊं। मैं न तो त्याग की अपेक्षा करता हूं और न ये सोचता हूं कि अगला फेसबुक का दोस्त मेरे हर सवाल का जवाब देगा। अपने स्टेटस पर जवाब पाने या किसी संदेश के जवाब के लिए जबरदस्ती नहीं की जा सकती। अगर किसी ने दोस्त बनने के लिए निमंत्रण दिया है, तो हमें उसे स्वीकार करना चाहिए, ये हमारा दायित्व और फर्ज भी है।

वैसे भी निजी जिंदगी में कम ही मिलना हो पाता है, वैसे में अगर आधे-एक घंटे में किन्हीं दो-चार व्यक्तियों के साथ मन की बातें शेयर कर लीं, तो कौन सी खराब बात हो जाती है? राह चलते किसी व्यक्ति को बुलाकर मित्र बनाने का चलन तो नहीं है। लेकिन अगर आप मित्र बनाना चाहें, तो भी वह आपके स्टेटस को देखकर मित्र बनेगा। ऐसे में फेसबुक पर लोग सिर्फ एक सहज आकर्षण में बंधकर अगर मित्र बन जाते हैं, तो बुरा क्या है।

मेरे मित्रों की संख्या दो सौ पार चली गयी है, इच्छा है और बढ़े। कम से कम मेरे नाम से इतने लोग परिचित तो हैं। कौन जानता है कि जिंदगी के किस मोड़ पर कब कौन किस परिस्थिति में कहीं मिल जाए। एक संवेदनशील इंसान होने के नाते मुझे फेसबुक आकर्षित करता है। दो लाइन की उसकी स्टेटस में वो दम होता है, जो हजारों शब्दों में नहीं। आपकी सोच को सिर्फ एक तीर से मित्र बनें सैकड़ों लोगों के सामने परोसा जा सकता है। अपने मन की भड़ास को बिना गरियाए चुपचाप स्टेटस में डाल आप चुप बैठ सकते हैं। साथ ही दोस्तों की प्रतिक्रिया भी जान सकते हैं। कम से कम आपका नजरिया लोगों के विचारों को जानकर विस्तृत होता है।

सबसे जरूरी चीज संवाद करना है। जितना संवाद करिएगा, आपका दायरा और सीमा क्षेत्र उतना फैलेगा। इसलिए अपने संवाद के दायरे को विस्तृत होने दीजिए। मेरे जितने भी मित्र बने हैं, मुझे किसी से कोई गिला शिकवा नहीं है। सबसे बड़ी बात ये है कि किसी ने कम से कम मित्रता के प्रस्ताव को तो स्वीकारा। जहां रिश्तों का अंधेरा हो और रिश्ते मर रहे हों, वहां एक छोटे से दीए का जलना भी सुकून दे जाता है। फेसबुक तुम्हें हमारी दोस्ती का सलाम।
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