Showing posts with label nature. Show all posts
Showing posts with label nature. Show all posts

Friday, March 1, 2013

याद आती हैं वो पुरानी शामें और फायरिंग रेंज की सड़क

मैं जिस कॉलोनी में रहता हूं, वहां से कुछ दूरी पर एक फायरिंग रेंज है. आज से 20 साल पहले तक वहां का दृश्य कुछ और हुआ करता था. पहाड़ी, दो किमी लंबी सड़क और वहां शाम के समय टहलती मिश्रित आबादी. जो पूरे जेहन में एक बेहतरीन टूरिस्ट स्पॉट का नजारा पेश करती थी. शाम होते ही हमारे कदम दो-तीन दोस्तों के संग वहां पहुंच जाते थे. बुजुर्ग अपने ग्रुप में. बच्चे अपनी मम्मी और भाई-बहन के साथ. कुछ मजदूर और सैनिक, जो वहां पहरे के लिए तैनात रहते, दिन भर की थकान मिटाते नजर आते. पूरी दुनिया एक जगह नजर आती.

 बुजुर्गों की जुबान पर लेटेस्ट पॉलिटिकल डेवलपमेंट हुआ करता था. आगे-पीछे चलते हम लोग उनकी एनालिसिस चुपचाप सुनते रहते. कभी उनके प्वाइंट आफ व्यू सुनकर हम भी आपस में दोस्तों के साथ बहस करते थे. उसी लंबी सड़क पर चंद जवान अपनी मोटरसाइकिल से रफ्तार का जोश दिखाते नजर आते. यूं कहें एक अलग ही दुनिया थी. वहां से रांची के एक किनारे पर मौजूद टैगोर हिल साफ दिखता था. क्योंकि उस समय तक न तो वहां उतने मकान थे और न ही उतनी गगनचुंबी इमारतें. खेत ही खेत नजर आते थे. हमने नौकरी पकड़ ली. साप्ताहिक छुट्टी के दिन वहां जरूर चले जाते थे. उस समय के बाद के सालों में फायरिंग रेंज के अगल-बगल इक्के-दुकान मकान बनते देखकर मन विचलित हो उठता था.

मकानों के बनने की रफ्तार बढ़ने लगी. फायरिंग रेंज को अंततः आम अवाम से दूर करते हुए बंद कर दिया गया. वहां पर कंटीले तार लगाकर लोहे के गेट लगा दिए गए. वहां अब कोई आम आदमी घूमने नहीं जा सकता था. पहले की स्चच्छंदता जाती रही. शाम के समय घूमने के शौकीन अब कॉलोनी की सड़क पर ही चहलकदमी करते नजर आने लगे. हमारा भी साथ छूट गया. जो लोग पहले फायरिंग रेंज के पास पहाड़ी की ओर जाती सड़क पर मिलते थे, उनसे काफी दिनों के बाद ही मुलाकात हो पाती. कॉलोनी की सड़कों पर घूमते हुए आप उन्मुक्त आकाश और सुकून देनेवाली हरियाली  को नहीं पा सकते. आज भी उस ओर से जाना होता है. वहां पर जब भी फायरिंग रेंज के लोहे के एंट्रेंस गेट को देखता हूं, तो एक टीस सी उठती है. डर लगता है. रोज शाम को गुजारी गई उस खुली जिंदगी की याद आती है, जो अब कभी नहीं आएगी.

पहाड़ी पर से पूरी रांची को देखने की अपनी ललक की याद आती है. तब हम दोस्त शाम के समय आपसी प्रतियोगिता करते हुए पहाड़ की चोटियों पर चढ़ जाते. वहां से मीलों दूर तक फैली रांची को निहारते. ऊपर पहाड़ी पर गुफाओं में चमगादड़ भी लटके मिलते और मधुमक्खियों के छत्ते भी. तब डर नहीं लगा कभी भी. मेरी कॉलोनी का कोई बंदा अब पहाड़ी पर नहीं जाता. क्योंकि लोगों ने पहाड़ी पर ही घर बना लिया है. सुनते हैं कि रांची में जमीन कम पड़ गई है. सब लोग इस उगते शहर की ओर ही आ रहे हैं. लेकिन किस जिंदगी की तलाश मे. वो जिंदगी जो अब नहीं रही. उन्हें न तो वह पुरानी हरियाली मिलेगी और न सुकून. मोरहाबादी भी अब वैसा नहीं रहा.हरे पेड़ों को बेदर्दी से काट डाला गया है. मन जार-जार रोता है. सुकून की तलाश करता है. अपने से छोटों के लिए कैसी जिंदगी हम सबने तैयार कर ली है. वैसे भी सब कुछ अपने कंट्रोल में नहीं है. जैसे कि आप कैसा कमेंट देंगे, ये मैं नहीं जानता. लेकिन उन पुरानी शामों के बारे में लिखकर मैंने कुछ सुकून के पल जरूर चुरा लिए हैं.

Monday, May 30, 2011

Nature's beauty

BEAUTIFUL SCENE OF SUN SET   PIC-SUNIL SINGH

Sunday, January 11, 2009

तलाश है एक खुशनुमा शाम की

ये शाम मस्तानी मदहोश किये जाये..... किशोर की आवाज लिये और राजेश द्वारा अभिनीत गीत मन में उमंगों के तराने छेड़ देते हैं। शायद आपके मन में भी होता होगा।
मैं पत्रकारिता में डेस्क जॉब से जुड़ा हूं और सामान्य तौर पर हर दिन शाम के चार से रात के १२ बजे तक मेरा जीवन आफिस में सिमटा रहता है। उस हिसाब से हर दिन की शाम मेरी जिंदगी से दूर ही रहती है। एसी रूम और ऊंची दीवारें बाहरी प्राकृतिक दुनिया से मेरे जीवन को दूर कर देती हैं।
इस कारण शाम में आकाश में छायी वो लाली और गोधूली बेला का वो रूमानी दृश्य देखे शायद सालों गुजर गये। कभी कभार जोर जबरदस्ती छुट्टी के दिनों में शाम में घूमने निकल भी जाता हूं, तो वो ख्यालात जेहन में नहीं आते, जो बेफिक्र मन से शाम में सामान्य तौर पर टहलते हुए आते होंगे। यानी नौकरी के इन १२ सालों ने शाम की जिंदगी को दूर कर दिया है।
जब दूसरों को देखता हूं, तो कुछ कल्पना मिश्रित और कुछ खुद की यादों के सहारे एक तस्वीर उकेरने की कोशिश करता हूं कि शाम ऐसी होती होगी, वैसी होती होगी। लेकिन एक टीस मन में रह ही जाती है। एक ददॆ दिल के कोने में छुपा ही रह जाता है। एक बच्चा जो कहीं किसी कोने में छुपा है, बाहर आने को छटपटाता रह जाता है। शाम में पहाड़ों पर चढ़ना, खेलना और लड़ना याद आता है। याद आता है, पहाड़ी की चोटियों पर चढ़ कर पूरे रांची शहर की हरियाली को देखना। याद आता है, टैगोर हिल की चोटी पर चढ़कर अध्याम की बुलंदियों को कोशिश करते लोगों को देखना। याद आता है, लोगों का बतकही करते हुए ठठ्ठा कर हंसना। यानी सिफॆ यादें ही बाकी रह गयी हैं। जिंदगी सरपट भागती चली जाती है। और मैं एक खुशनुमा शाम का अहसास लिये बस जिंदगी जिये चला जा रहा हूं। क्या आप मेरी उस एक खुशनुमा शाम को लौटाने में मेरी मदद कर सकते हैं।
Prabhat Gopal Jha's Facebook profile

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

अमर उजाला में लेख..

अमर उजाला में लेख..

हमारे ब्लाग का जिक्र रविश जी की ब्लाग वार्ता में

क्या बात है हुजूर!

Blog Archive