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Monday, March 22, 2010
अब नीतीश के विकास के दावे से परेशान क्यों हैं?
नीतीश के लिए बिहार क्या है या नीतीश के कार्यकाल में बिहार ने कितनी प्रगति की, ये अब बहस से परे है। लेकिन विकास के हिसाब से नीतीश पर कई तरह के आरोप लगाये जा रहे या कोशिश हो रही है। हमारा मानना है कि जीरो ग्रोथ से बेहतर कम से कम दस फीसदी का ग्रोथ है।नीतीश को सम्मान क्या मिला, एक विरोधी स्वर पूरी तेज आवाज में गूंजने लगा। विकास के दायरे, उसकी सही स्थिति और अन्य बातों को लेकर बहस तेज हो गयी है। लेकिन हमारा मानना है कि नीतीश की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने बिहार के प्रति कायम नेगेटिव माइंड सेट को हटाने में कामयाबी पायी। बिखरे हुए कुनबे को समेटने में नीतीश ने थोड़ा वक्त लगाया और अब विकास की कुछ रफ्तार को तेज किया है। वैसे में उन पर ये आरोप लगाना कि पटना पर उन्होंने ज्यादा यानी कुल उपलब्ध पूंजी का ३० फीसदी से ज्यादा खर्च किया और अन्य क्षेत्रों को नजरअंदाज किया, कुछ चुभता है। शुरुआत कहीं से तो होगी। और राजधानी के तौर पर पटना को प्राथमिकता की सूची में तो रखना ही होगा। विस्फोट साइट पर आये कमेंट्स में मिथिलांचल की मांगों को लेकर समर्थन जताया गया। हम ये कहते हैं कि आप किसी भी राज्य के कितने टुकड़े करेंगे। यहां झारखंड का जो हाल है, उसमें जार-जार रोने का मन करता है। आज जो लीडरशिप की अराजक स्थिति है, उसमें नीतीश कुमार एक दीये की तरह लगते हैं।
एक इंजीनियर आदमी, राजनीति के संघर्ष में खुद को परिपक्व किया हुआ और नौकरशाही की हर पेंच को जाननेवाले नीतीश कुमार सारे लीडरों में कुछ अलग हटकर हैं। वैसे में जिस स्थिति-परिस्थिति में उन्होंने बिहार को संभाला, उसमें हम उन्हें किस करिश्मा की उम्मीद करते हैं। दरअसल हमारी मानसिकता है कि हम हर निर्माण में सतही मानसिकता से ऊपर उठकर नहीं सोचते। राजनीति से परे हट कर नहीं सोचते।
बिहार की जो भद्द पीटी, उसमें इसी मानसिकता का योगदान रहा। जब राजद का कार्यकाल रहा, तो ये सवाल नहीं पूछा जाता था कि विकास की पूंजी के हिस्सेदार कौन-कौन से हैं, क्योंकि विकास को तो गोली मारिये, ये किस चिड़ियां का नाम है, ये लोग भूल गए थे। वैसे में नीतीश कुमार ने जहां टॉनिक पिलाया या सब्जबाग दिखाया, तो उसकी चिंदी-चिंदी उड़ाने की प्रक्रिया या कहें प्रयास शुरू हो गए। बस करो, भाई। पहले झारखंड, फिर तेलंगाना विवाद, उसके बाद यूपी को बांटने का विवाद और अब विकास के लिए खर्च हुए पूंजी में किसको कितना मिला, के बहस में अलग मिथिलांचल या अन्य अंचल की मांग टीस उत्पन्न करती है। हम कहते हैं कि नीतीश को फिर से पांच साल का जनता पूरा भरपूर मौका दे, उसमें कम से कम ये तो दिखे कि उनके दस साल और राजद के दस साल में कितने और कैसे अंतर रहे।
Tuesday, March 2, 2010
अच्छा ताजा और बासी सौंदर्य क्या होता है?
हमने एक सवाल उठाया कि क्या किसी पोस्ट पर विषय से अलग हटकर महिला की तस्वीर लगाना उचित है। उसमें एक कमेंट्स आया।
आपको सुन्दरता से एलर्जी क्यों है ?क्या ताजगी भरा सौदर्य है!
मन प्रफुल्लित हो गया -हाँ आपका यह कहना ठीक है कि विषय के साथ उसका कोई तारतम्य नहीं पर विश्यास्कती के साथ तो है मेरे भायी
फिर रचना जी का कमेंट आया
maansik rogi bahut hae samaj mae jo kewal duartaa kae bhawarae maatr haen unko vishy sae nahin vastu sae { kyuki unki nazar mae naari kaa saundarya vastu maatr haen } pyar haen
अब हम असमंजस में हैं कि बासी और ताजा सौंदर्य क्या होता है? सुंदरता किसे अच्छी नहीं लगती। लेकिन एक नजरिया होना चाहिए। कोई स्त्री कितनी भी सुंदर हो, लेकिन व्यवहार उचित और संयम भरा नहीं हो, तो सुंदरता के क्या मायने? अब सवाल ये उठता है कि ताजा सौंदर्य क्या होता है? ताजा सौंदर्य की परिभाषा क्या है? हम आज तक ताजा सौंदर्य का मतलब नहीं समझ पाये। यहां ताजा शब्द के इस्तेमाल पर जोर है।
सब्जी ताजी हो सकती है। ताजी भात या दाल हो सकती है, जो तुरंत बनी हो, लेकिन क्या सुंदरता, वह भी स्त्री की सुंदरता ताजी हो सकती है।
बड़ी मुश्किल है। हमें लगता है कि हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये। यहां कठिन हिन्दी शब्द का प्रयोग कर दिया, क्योंकि इसे समझने के लिए भी सामान्य व्यक्तियों को शब्दकोष का सहारा लेना पड़ेगा। मुझे अब उस शब्दकोष की तलाश है, जिसमें इस ताजी या बासी की पूरी बारीक जानकारी हो।
जहां तक हमें लगता है, तो ये मनुष्य के लालन-पालन और उसके वातावरण पर निर्भर करता है कि वे किसी चीज, वस्तु या किसी महिला को भी कैसे देखते हैं। यहां विचारों के महासमुद्र में दैहिक सुंदरता का क्या मतलब है? क्या हम अगर किसी वृद्धा की तस्वीर होगी, तो उसे नापसंदगी के दायरे में लायेंगे। सीधे तौर पर मन शर्म से पानी-पानी हो रहा है।
मुझे अपनी भारतीय संस्कृति की वह परिभाषा याद है, जहां नारी को पूजनीय कहा गया है। नारी शक्ति है और इसके पीछे के अर्थ को समझने से पहले अपने नजरिये को ठीक करना होगा। बड़ी-बड़ी बातें करना अपनी जगह है, लेकिन उसे व्यावहारिक रूप से अमल में लाना अपनी जगह। हमें लगता है कि हम कम से कम इस ब्लाग जगत को गलत अवधारणा से मुक्त करें।
आपको सुन्दरता से एलर्जी क्यों है ?क्या ताजगी भरा सौदर्य है!
मन प्रफुल्लित हो गया -हाँ आपका यह कहना ठीक है कि विषय के साथ उसका कोई तारतम्य नहीं पर विश्यास्कती के साथ तो है मेरे भायी
फिर रचना जी का कमेंट आया
maansik rogi bahut hae samaj mae jo kewal duartaa kae bhawarae maatr haen unko vishy sae nahin vastu sae { kyuki unki nazar mae naari kaa saundarya vastu maatr haen } pyar haen
अब हम असमंजस में हैं कि बासी और ताजा सौंदर्य क्या होता है? सुंदरता किसे अच्छी नहीं लगती। लेकिन एक नजरिया होना चाहिए। कोई स्त्री कितनी भी सुंदर हो, लेकिन व्यवहार उचित और संयम भरा नहीं हो, तो सुंदरता के क्या मायने? अब सवाल ये उठता है कि ताजा सौंदर्य क्या होता है? ताजा सौंदर्य की परिभाषा क्या है? हम आज तक ताजा सौंदर्य का मतलब नहीं समझ पाये। यहां ताजा शब्द के इस्तेमाल पर जोर है।
सब्जी ताजी हो सकती है। ताजी भात या दाल हो सकती है, जो तुरंत बनी हो, लेकिन क्या सुंदरता, वह भी स्त्री की सुंदरता ताजी हो सकती है।
बड़ी मुश्किल है। हमें लगता है कि हम किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये। यहां कठिन हिन्दी शब्द का प्रयोग कर दिया, क्योंकि इसे समझने के लिए भी सामान्य व्यक्तियों को शब्दकोष का सहारा लेना पड़ेगा। मुझे अब उस शब्दकोष की तलाश है, जिसमें इस ताजी या बासी की पूरी बारीक जानकारी हो।
जहां तक हमें लगता है, तो ये मनुष्य के लालन-पालन और उसके वातावरण पर निर्भर करता है कि वे किसी चीज, वस्तु या किसी महिला को भी कैसे देखते हैं। यहां विचारों के महासमुद्र में दैहिक सुंदरता का क्या मतलब है? क्या हम अगर किसी वृद्धा की तस्वीर होगी, तो उसे नापसंदगी के दायरे में लायेंगे। सीधे तौर पर मन शर्म से पानी-पानी हो रहा है।
मुझे अपनी भारतीय संस्कृति की वह परिभाषा याद है, जहां नारी को पूजनीय कहा गया है। नारी शक्ति है और इसके पीछे के अर्थ को समझने से पहले अपने नजरिये को ठीक करना होगा। बड़ी-बड़ी बातें करना अपनी जगह है, लेकिन उसे व्यावहारिक रूप से अमल में लाना अपनी जगह। हमें लगता है कि हम कम से कम इस ब्लाग जगत को गलत अवधारणा से मुक्त करें।
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Friday, February 12, 2010
रण फिल्म -ईमानदारी को इतना घोला गया कि बर्दाश्त से बाहर हो जाता है...
विजय हर्षवर्द्धन के रूप में अमिताभ जिस आदर्श के तौर पर रण फिल्म में भाषण देते नजर आते हैं, उसमें लगता है कि पूरा मामला अति रंजित हो गया है। ये फिल्म एक कदम आगे निकल कर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक को इतना कमजोर दिखा जाती है कि विदेशों में रहनेवाले भारत को किसी टापू से कम न समझें, जहां टोलों की तरह राजनीतिक चंद स्वार्थ के लिए शीर्ष पद को भी हाशिये पर रख देते हैं। ईमानदारी की मिसाल कायम करते हुए पूरब जब खुद डबल क्रास कर रही कंपनी की कर्मचारी की बातों में आकर सबूत दूसरे चैनल को दे देता है, तो यहीं से पटकथा कमजोर होती चली जाती है। पूरी फिल्म को सतही डायलॉग के सहारे ईमानदारी की चिमकी के सहारे चमकाने की कोशिश की गयी है। पटकथा में मीडिया के उस बात को इग्नोर कर दिया गया है,जहां ये बताना जरूरी होता है कि सबूत में कितना दम है। एक सीडी के कारण प्रधानमंत्री की कुर्सी को खतरा उत्पन्न हो जाता है। देश की राजनीति का स्तर अवसरवादिता के मामले में क्या इतना कमजोर है या चैनलों के अंदर की कहानी ऐसी ही है। हम चैनलों की अंदरूनी शक्ल-सूरत से अनजान हैं, लेकिन अगर चैनलों की अंदरूनी स्थिति का रण फिल्म ने सही चित्रण किया है, तो ये दर्शक के सामने इन पर विश्वास करने का अहम सवाल छोड़ जाता है। दूसरी बात, आज के दौर में फिल्म के पत्रकार हर्षवर्द्धन के जैसा ईमानदार बना जा सकता है क्या? रण फिल्म इलेक्ट्रानिक चैनल में काम कर रहे लोगों के लिए सामान्य बात की तरह होगी, लेकिन जो चैनलों से बाहर के लोग हैं, उनके सामने इलेक्ट्रानिक चैनल की काफी हल्की इमेज बन जाती है। पैसों के लिए खबरों का सौदा करते हुए दिखाना चौथे स्तंभ को तोड़ने जैसा है। जैसा करते फिल्म में चैनलों को दिखाया गया है, उसमें तो पूरी सिस्टम का बंटाधार हो जाएगा। पता नहीं, कहां और कैसे फिल्म कुछ लोगों को प्रभावित करती है। ईमानदारी की मिठास को इतना घोला गया है, वह कड़वी हो गयी है। ये सच का सामना करनेवाले उस किरदार की तरह हो गया है, जो पैसे के लिए हर सच को दुनिया के सामने रख रहा हो। रण फिल्ममें चैनल डरा जाते हैं। वे ऐसी तस्वीर पेश कर जाते हैं कि टीवी खोलते हुए डर लगता है। साथ ही मीडिया कर्मियों की बेईमानी की परत दर परत खोलती मालूम होती है। क्या सचमुच ऐसे हालात हैं? पता नहीं, अगर ऐसा है, तो ईश्वर भला करे।
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