Showing posts with label cricket. Show all posts
Showing posts with label cricket. Show all posts

Monday, May 21, 2012

आईपीएल के नाम पर देश बदनाम हो रहा है, साहब. कोई सुन रहा है..क्या?



जिस झारखंड में मैं रहता हूं , स्पोट्र्स को लेकर, आईपीएल की चमक को लेकर, रेव पार्टी की बात को जानकर और सुनकर थोड़ा खुद को गंवई टाइप का हो गया मानता हूं. जमाने की स्पीड के साथ नहीं बढ़ पा रहा. अपुन का शौक का भी बस लिमिटेड है. ज्यादा बहुत हो गया तो कोल्ड ड्रिंक्स की एक बोतल गटक लेता हूं. कुछ कहें या ना कहें, लेकिन अपने आसपास ऐसे लोगों की तादाद ज्यादा देखता हूं, जो बेहिसाब पैसा कमाने वालों में नहीं हैं. जिनके लिए दाल-रोटी की जुगाड़ में भिड़े रहना एक मजबूरी है. ऐसे में आईपीएल के पूरे तमाशे में शाहरुख खान की बादशाहत को चुनौती देते एक गार्ड की फोटो ने जेहन पे ऐसा असर डाला कि बार-बार अब भी शाहरुख की ओर इशारा कर ह्वीसल बजाते गार्ड की तस्वीर आंख के सामने से गुजर जाती है.

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार गार्ड ने मीडिया वालों से ही तंग होकर अपनी फैमिली को मुंबई से बाहर भेज दिया है. मुझे ताज्जुब इस बात से है कि इस देश में आखिर इतना फर्क क्यों है? चंद लोगों के पास इतना पैसा है कि आईपीएल, रेव पार्टी या यूं कहें कि सारी अय्याशी के लिए इंतजामात हैं. वहीं दूसरी तरफ वो लोग भी हैं, जो बस एक कोल्ड ड्रिंक की बोतल खरीदकर अपनी हसतरें पूरी कर लेते हैं. अगर आप झारखंड से हैं, तो यहां कई हाकी या फुटबाल खिलाडिय़ों को बस यूं ही भटकते, चाय बेचते या फटेहाली की जिंदगी गुजारते देख सकते हैं.

मीडिया में, फेसबुक के वाल पर अभी आप जाएंगे, तो आपको क्रिकेट को गरियाते हुए पोस्ट मिल जाएंगे. सब लोग चिंतित हैं. लेकिन इनमें से 80 फीसदी ऐसे हैं, जिन्होंने बस अपने अहम की तुष्टि के लिए पोस्ट लिखे हैं या चिंता जाहिर की है. अगर उन्हें भी इस आईपीएल के तमाशे के लिए इनवाइट किया जाए, तो वो दौड़े-दौड़े चले आएंगे. कीर्ति आजाद ने तो क्रिकेट को बचाने के लिए धरना भी दे दिया है. लेकिन क्या हम सोचते हैं कि जिस क्रिकेट को हमने आहें भर-भरकर इस मुकाम तक पहुंचाया, उसका इस्तेमाल कर हमें ही मूर्ख कर कैसे पैसा बनाया जा रहा है.

आप हर आईपीएल देखनेवाले के प्रति व्यक्ति द्वारा बतौर दर्शक निवेश किए गए समय पर गौर करें.  आप पाएंगे कि वर्किंग आउटपुट का 80 फीसदी भाग आईपीएल ले ले रहा है. इस देश में जब पेट्रोल की कीमतों में और दस रुपए बढ़ाने की बात हो रही है, तो कहीं से भी कोई विरोध नहीं करता है. लेकिन आईपीएल, रेव पार्टी के नाम पर बवाल में सब नंगे होने को उतारू हैं. हर बात में सट्टा लगने-लगाने की बात भी सुनी जाती है. सौ के हजार बनते होंगे. लेकिन ये सट्टा कौन लगाता है. ये वो लोग लगाते हैं, जिनके पास कुछ एक्स्ट्रा है. ये एक्स्ट्रा हमारे और आपके पास नहीं है. क्योंकि हम लोग कामन मैन हैं. हमने अपने पैसों का गलत इस्तेमाल करना नहीं सीखा. हम ईमानदार हैं. हमारे जमीर को कुछ गलत करने पर चोट पहुंचती है. पैसा बनाने की कला हमारे पास नहीं है. ऐसे में वो गार्ड भी उन्ही कामन मैन में से एक है और रहेगा.

शाहरुख की उस पर उठी उंगलियां उस कामन मैन के जमीर को भी ठेस पहुंचा रही है, जो कि  पैसा बनाना नहीं जानता है. अपने मिले वेतन के पैसे से जिंदगी गुजारता है. जो किसी माल या बड़े सिनेमा घर में अपने बच्चों को इसलिए नहीं ले जा पाता होगा, क्योंकि वहां लगनेवाली कीमत उसके औकात से ज्यादा होंगी. सवाल यही है कि इतना गलत हो रहा है और संस्कार, ईमानदारी, करप्शन हटाने की बात करनेवाली सरकार चुप है. मौन है. क्रिकेट के नाम पर हो रही बेइज्जती को बर्दाश्त कर रही है.

क्या हमारी सरकार या हमारे सिस्टम में इतनी गैरत नहीं कि वो कोई भी आयोजन, चाहे वो प्राइवेट ही क्यों न हो, बिना किसी विवाद के करा सके. आईपीएल पर उठ रहीं उंगलियां दिल पर चोट करती हैं. आमिर खान को भी अपने सत्यमेव जयते को इस इश्यू की ओर मोड़ देना चाहिए. क्योंकि इस मुद्दे पर हर किसी के दिल को चोट पहुंचनी चाहिए. दिल को लगना चाहिए. पिछले एक सप्ताह में जितने विवाद हुए हैं, उसके बाद ये बताने की जरूरत नहीं है कि आईपीएल को सुर, शबाब और पैसे के काम्बिनेश न को तोड़ कर उसे नया प्रोफेशनल मंच बनाया जाए, प्रोफेशनलिज्म अख्तियार करने का मतलब कैरेक्टर को पूरी तरह ढीला कर देना नहीं होता है. आईपीएल के नाम पर देश बदनाम हो रहा है, साहब. कोई सुन रहा है..क्या? 

Friday, April 1, 2011

बस अब कल के मैच पर है निगाह..

कल के वर्ल्ड कप फाइनल को लेकर मसल्स टाइट हो रहे हैं. जोश शायद उतना नहीं हो, लेकिन मीडिया इसे कुछ हद तक इज्जतदार हेडिंग देते हुए बयानबाजी कर रहा है. वैसे हमारा मिजाज कुछ अलग किस्म का है. कोई जीते-हारे, उससे कोई अपने को फर्क नहीं पड़नेवाला. सबसे ज्यादा फर्क इससे पड़नेवाला है कि किस अंदाज में हारते हैं या जीतते हैं. अगर एकतरफा जीत होती है, तो वो भी गलत होगा और एकतरफा हार, तो वो भी गलत. जीतना है, तो अंतिम पल तक बाजी के लिए लड़ते रहना होगा. जब तक ये जज्बा टीम इंडिया नहीं ला पाएगा, जीतना मुश्किल है.

श्रीलंका से कोलकाता में मिली हार हमें याद है. हमें लगता है कि श्रीलंका का हौव्वा सर पर जरूर चढ़ा हुआ है. साथ ही हमारी जीत का नशा भी फट गया है. हम जानते हैं कि लंका फतह उतनी आसान नहीं होगी. टीम के ग्यारह हनुमानों को फिर से जामवंत की जरूर पड़ेगी, जो उन्हें उनकी आंतरिक शक्ति की पहचान कराए. वैसे रांची से होने के कारण धौनी हमेशा से हमारे लिये कुछ खास रहे हैं. कैप्टन कूल की रणनीति ने सबके मुंह बंद कर दिए. नेहरा को लेकर उन पर चाहे जितनी भी उंगली उठी हो, लेकिन नेहरा की कामयाबी ने हम लोगों का उन पर भरोसा बढ़ा दिया है. कैप्टन कूल ने भले ही बल्लेबाजी से जादू न दिखाया हो, लेकिन उनका दिमाग बोल रहा है. हर रणनीति दुश्मनों पर भारी पड़ रही है.

पाक से मैच जीतने के बाद रांची के मेन रोड में कुछ इस तरह उमड़ी भीड़
रांची सिटी में पाक फतह के दिन रात में जो दीवानगी का आलम था, उसे हम भी भूल नहीं सकते हैं. ये सच है कि हम अब हार नहीं स्वीकार कर सकते. लेकिन ये सोच भी खतरनाक है. ये अफीम के नशे की तरह है. जो बार-बार चाहिए. अगर नहीं मिलेगी, तो हम सब पागल हो जाएंगे. हमें हमारी दीवानगी ने ही कुछ इस हद तक कामयाबी दिलायी है कि १९८३ जैसी जीत का सपना संजोये बैठे हैं. बस अब कल के मैच पर है निगाह..

Friday, March 25, 2011

एक बेहतर टीम वर्ल्ड कप से बाहर हुई और बेहतर खेल के साथ.


क्रिकेट ज्यादा नहीं जानता. लेकिन क्रिकेट के बारे में कुछ-कुछ जानता हू. ये जानता हूं कि ये ऐसा गेम है, जिसमें कब क्या हो जाए, कोई नही जानता है. जावेद मियांदाद का छक्का आज भी उसी तरह दिलोदिमाग पर छाया है, जैसे कल की बात हो. कल जब रिकी पोंटिंग का चेहरा खेल के अंत में देख रहा था, तो एक निराश हो चुके योद्धा के दिल की धड़कनों को साफ महसूस कर रहा था.

आस्ट्रेलिया को हराने के बाद हम इतना चहके हैं कि पाकिस्तान के साथ जीत या हार की बात बेमानी हो चुकी है.सबसे बड़ा सवाल ये है कि आज की तारीख में आस्ट्रेलिया हमारे लिये क्यों इतना महत्वपूर्ण हो गया. आस्ट्रेलिया में हार की ठिकरा पोटिंग पर फूट रहा है. वहां पोंटिंग के खिलाफ हेडलाइंस लग रहे हैं. लेकिन हम भूल जाते हैं कि आस्ट्रेलिया ने ही हमारे अंदर के सोये हुए शेर को जगाया है.

किस्सा यूं है कि आस्ट्रेलिया के साथ भिड़ंत के पूर्व तक हम लोग एक भले और संत आदमी थे. हम हार को उसी हिसाब से स्वीकार कर लेते थे, जैसे कि एक भाग्यवादी अपने हिस्से में आयी हर चीज को स्वीकार करता है. लेकिन इस दुनिया में जीतता वही है, टिकता वही है, जिसमें अंत तक लड़ने का जज्बा हो. इंडियन टीम ने आज की तारीख में लड़ना सीख लिया है.

महेंद्र सिंह धौनी का अपने प्लेयरों पर भरोसा काम दे रहा है. भरोसा ये कि वे जरूर परफार्म करेंगे. कुछ कर दिखाने का भरोसा हमेशा काम देता है. रैना के मामले में वही हुआ. जब सारे सितारे चले गए, तो रैना युवराज के हमसफर बनकर उतरे. मुझे एक बात पर हंसी आती है कि इंडिया मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया अपनी समीक्षा में इतना सतही कैसे हो जाता है. याद कीजिए वेस्टइंडीज से जीत का वक्त और साउथ अफ्रीका से हार का दिन. मीडिया ने पीयूष चावला को लेकर इतना कुछ कहा लिखा. लेकिन आस्ट्रेलिया के साथ जीत के बाद उसके सुर बदल गए. ये प्रवृत्ति खतरनाक है. हमारे यहां सबसे बड़ी बात है कि हमने क्रिकेट को क्रिकेट नहीं रहने दिया है.

हमारी भावना, हमारे जज्बात कुछ ऐसे हो जाते हैं कि हम विरोधी टीमों को दुश्मन मान बैठते हैं. ऐसे में युवराज के द्वारा मैच के बाद प्रेस कान्फ्रेंस में ये कहना कि गेम टीम खेलती है. ये कोई इंडिविजुअल एफर्ट से नहीं जीता जा सकता है, काफी बातों को साफ कर देता है. साथ ही ये कि मैं न होता, तो कोई और होता. हमें ये मान कर चलना होगा कि हमारे खिलाड़ी जरूर अंतिम समय तक अपनी मारक क्षमता के साथ खेलें, लेकिन जीत के प्रति ऐसी अंधभक्ति  का प्रदर्शन नहीं करें कि दुनिया भी हमारी हार पर उसी प्रकार झूमे, जैसा कल हम आस्ट्रेलिया को हराने के बाद झूम रहे थे. मैं इससे इनकार नहीं करता हूं कि आस्ट्रेलिया ने कई बार अपनी बातों और रुखे रवैये से हमारी अंतरात्मा को रौंदा है. इस कारण हम आस्ट्रेलिया को हराने के लिए इस हद तक जुनूनी हो गए कि जज्बातों को किनारे लगा दिया. वैसे एक बेहतर टीम वर्ल्ड कप से बाहर हुई और बेहतर खेल के साथ.

Thursday, April 22, 2010

आइपीएल विवाद - सरकारी विभाग

आज आइपीएल विवाद के बाद सरकारी विभाग जाग रहे हैं। औपचारिकता निभायी जा रही है। मीडिया हर पल की जानकारी दे रहा है। सवाल ये है कि इतने करोड़ों की लेन-देन में अनियमतता के बाद भी सरकारी विभागों को कोई खबर नहीं है। एक बात जाहिर है कि सत्ता केंद्र में बैठे व्यक्तियों के रिश्तेदारों की डोर इन विवादों में फंसी है। रातों रात इस देश को अमेरिका बनाने की फिराक में सारा कुछ बेड़ा गर्क कर दिया जा रहा है। ट्वेंटी-२० के नाम पर चीयर गर्ल्स की डांस और हीरो-हीरोइनों का स्टाइलिश पोज और उपस्थिति उन सारे तकनीकी और विवादों के विषय को दूर फेंकती रही, जिससे इस सच का खुलासा होता कि इतना बड़ा आयोजन कैसे और किस तरीके से हो रहा है। सवाल ये है कि आज की तारीख में क्या किसी की औकात सचमुच में सौ करोड़ या उससे ज्यादा की खरीदारी की है। अगर है, तो ये बातें सार्वजनिक करने में क्या बुराई है? दूसरी बात कि एक फ्रेंचाइजी में शायद कई हिस्सेदार है, जो परदे के पीछे हैं। (जैसा कि सुना गया है या जानकारी मिली है)। वैसे में तो ये और भी जरूरी हो जाता है कि सार्वजनिक पटल पर इन चीजों को लाया जाये। सबसे अहम सवाल ये है कि सरकार किसकी है और उन पदों पर बैठे सरकारी नुमाइंदे कौन हैं, जाहिर है जनता के और जनता के प्रति जवाबदेह हैं। एक तरह से कहें, तो आइपीएल ने बैठे बिठाये लाखों का रोजगार इन शक्ति संपन्न नुमाइंदों के रिश्तेदारों को उपलब्ध कराया है। क्रिकेट के नाम पर जारी इस नौटंकी में परत दर परत जो खुलासे हो रहे हैं, उससे मुंह खुला का खुला रह जाता है। सवाल यही है कि सरकारी विभाग इतने करोड़ों के लेन-देन को कैसे नजरअंदाज करते रहे। आज की तारीख में शशि थरूर पीछे हो गये हैं और उनका कहीं नाम नहीं आ रहा। दूसरी बात पैसेंजर प्लेन को चार्टर प्लेन में बदलने की है। ये इस बात की ओर संकेत देता है कि पूरी व्यवस्था हाशिये पर है। क्रिकेट के नाम पर ये गंदा खेल है। अब तो आगे से अभिनेता और अभिनेत्रियों को इन सारी नौटंकियों में फंसने से पहले सौ बार सोचना होगा। कहीं न कहीं ग्लैमर के नाम पर उनका इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा।

Monday, April 19, 2010

आइपीएल का धंधा. ..... लगता है कुछ गंदा

देखिये लालू प्रसाद कहते हैं कि बीसीसीआइ का सरकार अधिग्रहण करे। ये तीन-चार साल बाद सरकार जाग रही है। जब देश में सुरक्षा के सवाल पर आइपीएल को साउथ अफ्रीका में कराया जा रहा था, तब सोचा जाना चाहिए था, ये सब। शशि थरूर और सुनंदा पुष्कर के बहाने आइपीएल के पीछे का खेल बहस का मुद्दा बन गया है। क्रिकेट को प्रोडक्ट बनाकर बेचे जानेवाले आइपीएल के इस रूप पर जोरदार बहस होनी चाहिए। ये देश उन्मुक्त बाजार के हवाले हो या नहीं, ये सबसे गंभीर बहस है। आइपीएल एक ट्रेंड है, जिसे बाद में संभालना मुश्किल है। आज आइपीएल के बहाने जो नेता इस बहस को उठा रहे हैं, उनमें कम से कम, हमारा मानना है कि इतने संस्कार भरे हैं कि देश के प्रति वे समग्र रूप से सोचते हैं। २०-२० क्या है, चट मंगनी पट ब्याह। आपने खेल को तेज रफ्तार का बना दिया। उसमें करोड़ों की बोली लगायी जाती है। लेकिन उसकी पारदर्शिता पर उंगली उठती है और आयकर विभाग इसे जांच के दायरे में ले लेता है। जांच कर रहा है। ये सारा मामला कहीं न कहीं ये संदेश दे रहा है कि कुछ गड़बड़ है। सवाल ये है कि क्रिकेट की दीवानगी के बहाने हम देश के प्रति जिम्मेदारी, सामाजिक मर्यादा और अपनी विरासतों का जो सत्यानाश कर रहे हैं, उसका क्या होगा। पुरानी पीढ़ी कम से कम इस नुकसान को ज्यादा महसूस कर रही है, लेकिन नयी पीढ़ी तो उन्मुक्त बाजार और खुलेपन का स्वाद चखने के बाद शायद ये सवाल भी न करे। जब आइपीएल को सुरक्षा के नाम पर द. अफ्रीका में कराने की बात हुई थी, तो सर फोड़ने का मन कर रहा था। इस देश की व्यवस्था कोई खेल संघ या व्यवस्था कैसे हाशिये पर रख सकता है। असल में इसके पीछे इतना पैसा है कि मर्यादा, जिम्मेवारी या अन्य शब्द गड्ढे में धकेल दिये जाते हैं। अरबों के इस धंधे को कम से कम पारदर्शिता और मूल्यों के मापदंड पर तो रखना ही चाहिए। नहीं तो अनियंत्रित हो जाने के बाद कुछ नहीं हो सकता। हम तो शशि थरूर को धन्यवाद देते हैं कि उनके बहाने ये आइपीएल का धंधा बहस का मुद्दा बना। कहां से कौन कितना पैसा लगा रहा है और उसका स्रोत किया है, ये हर किसी को जानने का हक है। यहां इस चीज का भी ख्याल रखा जाये कि खेल के नाम पर किसी राष्ट्र का अपमान नहीं है। जैसा कि किसी पाक खिलाड़ी की बोली नहीं लगने पर अनुभव हुआ है। किसी देश की भावना, किसी का सम्मान पैसे से बड़ी चीज होती है। ये देखना होगा। बहुत हुआ। अभी सदन गूंज रहा है, कल सड़कों पर इसे लेकर हंगामा मचना तय है।
Prabhat Gopal Jha's Facebook profile

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

अमर उजाला में लेख..

अमर उजाला में लेख..

हमारे ब्लाग का जिक्र रविश जी की ब्लाग वार्ता में

क्या बात है हुजूर!

Blog Archive