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Wednesday, August 17, 2011

अन्ना के मूवमेंट को हाइजैक कर लिया गया है

चलिए अन्ना को अनुमति मिल गयी, लेकिन इसके साथ-साथ उन अवसरवादियों को भी, जो कि अब तक सिर्फ मूक दर्शक थे. हर शहर में सिविल सोसाइटी का गठन हो चुका है. और उसमें भी वही लोग शामिल हैं, जिन्होंने अब तक राजनीतिक कशमकश में पूरी जिंदगी गुजार दी है. अन्ना का आंदोलन सफल हुआ है, तो सिर्फ इलेक्ट्रानिक मीडिया के कारण. एक बात सीधे तौर पर कह सकता हूं कि आम आदमी के लिए अन्ना का आंदोलन चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात है. रामलीला मैदान में लगातार डफली बजाते रहने से सरकार को थोड़ी देर के लिए जरूर झुका लिया गया, लेकिन ये कहना बेवकूफी है कि सरकार अंततः बात मान लेगी. अन्ना को राजनीति नहीं आती. वो सीधे बात करते हैं और यही ईमानदारी उनका हथियार है. वहीं कांग्रेसी बातों में उलझा कर जंग जीतना जानते हैं. सिर्फ मनीष तिवारी जैसे प्रवक्ता ही बात करने में आपा खो बैठने के कारण फेल हो जाते हैं. हमें लगता है कि अन्ना के मूवमेंट को हाइजैक कर लिया गया है. अब इसमें वैसे लोग शामिल हो रहे हैं, जिनकी ईमानदारी पर सार्वजनिक जीवन में स्वतः सवाल लग चुका है. कह सकता हूं कि अन्ना का आंदोलन पांच दिन बाद कूल-कूल हो जाएगा.

Thursday, September 30, 2010

इलेक्ट्रानिक मीडिया का रोल बर्दाश्त से बाहर

आज मुझसे आप बोलिये कि आप अभी के फैसले से कैसा महसूस करते हैं. तो मैं एक साधारण आदमी कहूंगा-खुश हूं. आगे जो हो, लेकिन अभी तो सबको कुछ न कुछ हिस्सा मिला है. लेकिन मीडिया के चंद लोग अब फैसले की खाल खींचने लगे हैं. ये एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर आप न जाने कितनी भी बहस कर लें, खत्म होने को नहीं है. एक अंगरेजी चैनल में एक साहब को बुलाया गया, तो उन्होंने मंदिर और मस्जिद की बातें छेड़ दी कि दोनों बने साथ. ऐसी बयानबाजी सुनकर खून खौल उठता है.
जब सारा तमाशा खत्म करने के लिए एक फैसला आया है, तो फैसले पर तमाशा खड़ा किया जा रहा है. भारत के इलेक्ट्रानिक मीडिया को खासकर पूरी तरह नियंत्रण प्रणाली में डाल देना उचित है. आज के दौर में कुछ अंगरेजीदां चैनल चंद नामित समाज के ठेकेदारों को बुला कर जो धर्मनिरपेक्षता का राग अलापना शुरू कर देते हैं, वे उस सारे सौहार्द्र के माहौल को बिगाड़ने का काम कर देते हैं, जो कुछ नेता नहीं कर पाते. भला मानिये की प्रिंट मीडिया ने अपने हर पन्ने में अनेकता में एकता का राग अलापा है. लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया बहस को धार देने की कोशिश कर रहा है.
खुद को कानून से ऊपर रखने और जजमेंट पर उंगली उठानेवाला अंगरेजी मीडिया क्या इस देश का सच्चा हितैषी होगा, ये देखना वाजिब है. अब हाइकोर्ट ने जो जजमेंट दिया है, उस पर थोड़े अंतराल के बाद बहस की जाए, तो मामला कुछ साफ होगा. इलेक्ट्रानिक मीडिया का रोल बर्दाश्त से बाहर है.

Saturday, April 10, 2010

रवीश से गुजारिश है कि हमें इतना भावुक मत कीजिये

मैं जब एनडीटीवी पर उजड़ती बस्ती के फिर से बसने की कहानी देख रहा था, तो खुद में सीखने की ललक को जगा रहा था। यहां ये तारीफ किसी ऐसी चीज के लिए नहीं है, जो सिर्फ कहने के लिए है, बल्कि जिन सामाजिक सरोकारों को लेकर लगातार हम रिपोर्टिंग की अपील एक दर्शक के बतौर करते रहते हैं, उसकी एक बानगी हमें बस्ती के बिगड़ने, उजड़ने और बनने में मिली। 
हम रांची में जहां रहते हैं, वहां पर पूरी कॉलोनी को बस्ते देखा है। सामने की पहाड़ी पर घरों को बनते देखा है। हमने उजड़ते चमन के दर्शन नहीं किये। इसका कारण यही रहा कि हम बड़े शहरों में नहीं रहते। सुना है कि बड़े शहरों में लोग बिल्डिंग या किसी खास परियोजना के लिए उजाड़ दिये जाते हैं।
रिपोर्ट में एक बात साफ हो जाती है कि हर शहर और हर आबादी की अपनी जिंदगी होती है। उस जिंदगी की अपनी कहानी होती है। जैसे नदी की धारा खुद ब खुद अपनी राह बना लेती है, वैसे ही लोग अपने जीने की राह चुन लेते हैं। हमारे यहां एचइसी जैसे बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान की स्थापना हुई। सुनते हैं कि एक समय यानी ६०-७० के दौर में और ८० के प्रारंभिक वर्षों में रौनक रहा करती थी। यहां भोजपुरी भाषियों की अच्छी-खासी संख्या रही। कई लोगों के पोते-परपोते गांव-देहात से बिछुड़ कर आज इस झारखंडी माटी के लाल बन चुके हैं। उनका नाता वहां से भी उतना ही है, जितना यहां से है। आज एचइसी में कर्मचारी घटते चले गये और रौनक भी जाती रही। वैसे में किसी संस्थान के बसने और उजड़ने पर कहानी बनाने के लिए एचइसी एक जीवंत गवाह है। 
किसी भी कहानी का विस्तार इतना बड़ा होता है कि उसमें कई कोण समा जायें। हमारे यहां एक संघर्ष पिछले हजारों सालों से चला आ रहा है कि मध्यम और निम्न वर्ग का आदमी परिवर्तन के नाम पर हमेशा हाशिये पर होता है। नौकरी के लिए भटकता मध्यम वर्ग का युवक किसी बस्ती के बनने और उजड़ने का एक गवाह बनता रहता है। उसी रिपोर्ट में रवीश बताते हैं कि कैसे छोटे से घर में मंदिर भी होता है और वाशिंग मशीन के लिए जगह भी निकाल ली जाती है। मिडिल क्लास की जिंदगी आंखों के सामने रहती है। ऐसा क्या है कि रवीश बार-बार जेहन में ये डाल जाते हैं कि उनमें कुछ खास है। उनकी रिपोर्ट जब भी देखता हूं, तो लगता है कि ऐसी ही भाषा होनी चाहिए। मानवीय पहलू को छूता उनका वाक्य बारंबार सीखने के लिए प्रेरित करता है। ये बता जाता है कि पत्रकारिता के नाम पर हमारे जैसे लोग अभी भी सीखने की सीढ़ी के पहले पायदान पर हैं। उसमें अंतिम वाक्य कि रिपोर्टर जिंदगी में रिश्ते बनाता और पीछे छोड़ जाता है, भावुक कर जाता है
रवीश से गुजारिश है कि हमें इतना भावुक मत कीजिये। रवीश की रिपोर्टिंग में जीवन में झांकने की कला नजर आती है। हमेशा कुछ अलग हटकर। इस बार बस्ती के बसने की कहानी बिना पलक झपकाये देखता रहा। अब वैसी ही अगली रिपोर्ट को इंतजार रहेगा। लेकिन एक बात पता चल गयी कि उस बस्ती में ज्यादातर लोग फिल्में और गाने ही सुनते-देखते हैं। चैनल काफी कम। सोचनेवाली बात है।

Thursday, April 8, 2010

दंतेवाड़ा से ज्यादा सानिया एपिसोड का प्रसारण, सर पटकने का मन करता है..

इलेक्ट्रानिक मीडिया ने दो दिनों में दंतेवाड़ा और सानिया की खबरों के प्रसारण के समय में सानिया की खबरों को ज्यादा तरजीह दी। लाइव टेलीकास्ट किया। ऐसा लगा कि शोएब भाई साहब के मामले ने दो देशों के संबंधों को बिगाड़ने की स्थिति पैदा कर दी है। सीधे तौर पर कहने को मन करता है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया टीआरपी के नाम पर दिमाग से पैदल हो गया है। दिमाग से पैदल होने का मतलब है कि उसे देश और समाज के सामाजिक सरोकारों से कोई मतलब नहीं है। शोएब कैसे हैं, क्या हैं, इसे लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया परेशान है। कहीं भी किसी चैनल में किसी शहीद के परिवार की स्थिति को लेकर कोई रिपोर्ट नजर नहीं आयी। क्या शहादत को इस तरह नजरअंदाज करना जायजा है। ये एक अहम सवाल है। जिस प्रकार मुंबई के समय मीडिया एक हो गया था, सारी खबरें पीछे छूट गयी थी और वही एक खबर सबके लिए थी। वैसा ही मामला दंतेवाड़ा भी है। दंत्तेवाड़ा में मारे गये जवानों की सूची इस बार सबसे लंबी थी। इलेक्ट्रानिक मीडिया यहां इस बार चूक गया। सानिया मिर्जा एपिसोड में उसने अपना चरित्र दिखा दिया है। जनसरोकारों से दूर होती इस इलेक्ट्रानिक मीडिया (खास कर हिन्दी) को अब ये सोचना होगा कि उसने अपनी धार क्यों खो दी। दंतेवाड़ा की घटना के बाद नेशनल कहे जानेवाले चैनलों को उन शहीद जवानों के परिवारों की खोज खबर के लिए जान लगा देनी चाहिए थी। उन खामियों का परत दर परत खुलासा किया जाना चाहिए था, जिसकी उसे अभी जरूरत है। रिपोर्टिंग हुई भी, तो बस खानापूर्ति के लिए। सच कहें, तो अंग्रेजी मीडिया हिन्दी की इलेक्ट्रानिक बिरादरी से ज्यादा प्रभावी तरीके से काम करता नजर आता है। ऐसा क्यों है, पता नहीं। लेकिन इस पर विश्लेषण होना चाहिए। हिन्दी मीडिया में खबरों के नाम पर सिर्फ क्रिकेट, आइपीएल या फिल्मी तड़का ही क्यों नजर आता है। नहीं तो यू ट्यूब से उठाया हुआ वीडियो ही क्यों दिखाकर टाइम पास किया जाता है। कहीं न कहीं दर्शकों को बेवकूफ बनाया जा रहा है। क्षेत्रीय इलेक्ट्रानिक चैनलों की बात जाने दें, लेकिन नेशनल कहे जानेवाले चैनल जिम्मेदारी नहीं समझ रहे, ये सोचनेवाली बाते हैं। इसी मीडिया ने दिल्ली में हुए कई कत्लों का परत दर परत खुलासा किया। कई अन्य चीजों को सामने लाने की जिम्मेवारी उठायी। लेकिन दंतेवाड़ा मामले में ये फिसड्डी साबित हुआ। क्योंकि उसके पास शायद ऐसी कोई जमीनी जानकारी नहीं है, जिससे एक पूरी व्यवस्थागत रिपोर्टिंग की जा सके। सानिया
एपिसोड का दंतेवाड़ा घटना की तुलना में ज्यादा महत्व देना देश के साथ विश्वासघात है। जनसरोकार से दूर होती हिन्दी इलेक्ट्रानिक मीडिया का ये चरित्र खतरनाक है। इससे उसे कम, देश को ज्यादा नुकसान है।
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