चलिए अन्ना को अनुमति मिल गयी, लेकिन इसके साथ-साथ उन अवसरवादियों को भी, जो कि अब तक सिर्फ मूक दर्शक थे. हर शहर में सिविल सोसाइटी का गठन हो चुका है. और उसमें भी वही लोग शामिल हैं, जिन्होंने अब तक राजनीतिक कशमकश में पूरी जिंदगी गुजार दी है. अन्ना का आंदोलन सफल हुआ है, तो सिर्फ इलेक्ट्रानिक मीडिया के कारण. एक बात सीधे तौर पर कह सकता हूं कि आम आदमी के लिए अन्ना का आंदोलन चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात है. रामलीला मैदान में लगातार डफली बजाते रहने से सरकार को थोड़ी देर के लिए जरूर झुका लिया गया, लेकिन ये कहना बेवकूफी है कि सरकार अंततः बात मान लेगी. अन्ना को राजनीति नहीं आती. वो सीधे बात करते हैं और यही ईमानदारी उनका हथियार है. वहीं कांग्रेसी बातों में उलझा कर जंग जीतना जानते हैं. सिर्फ मनीष तिवारी जैसे प्रवक्ता ही बात करने में आपा खो बैठने के कारण फेल हो जाते हैं. हमें लगता है कि अन्ना के मूवमेंट को हाइजैक कर लिया गया है. अब इसमें वैसे लोग शामिल हो रहे हैं, जिनकी ईमानदारी पर सार्वजनिक जीवन में स्वतः सवाल लग चुका है. कह सकता हूं कि अन्ना का आंदोलन पांच दिन बाद कूल-कूल हो जाएगा.
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Wednesday, August 17, 2011
Friday, April 8, 2011
एक आदमी की ताकत
कल हमारी कालोनी में कुछ बुद्धिजीवी टाइप के लोग बहस कर रहे थे. मुद्दा वही अन्ना केस था. अन्ना को गांधी कहने के मुद्दे से सवाल-जलाब शुरू हुआ और फिर वही लोकल लेवल पर गरियाने के लेवल पर आ गया. बिंदास अंदाज में कहूं तो जो बाबू जितना फेंकना था, फेंक रहे थे. उन्हें दूसरे हजारों लोगों में गलतियां ही गलतियां नजर आ रही थीं. अन्ना ने एक सिस्टम को लेकर बात शुरू की. उनके समर्थन में पूरी जमात भी उठ खड़ी हुई. लेकिन मैं कहता हूं कि हमारे यहां हम अपने यहां से क्यों नहीं शुरुआत करते. ये सिस्टम सुधारने का पहला स्तर या स्टेप तो परिवार ही है. मेरे मन में एक सवाल बार-बार आता है कि कई लोग अपनी संतान को आधुनिक समय के हिसाब से उन तमाम पुरानी विकसित विचारधाराओं से दूर ले जाते हैं, जो किसी को बेहतर व्यक्ति बनाता है. एक बार कृष्णामूर्ति का इस देश से गरीबी उठाने पर प्रवचन हो रहा था, तो उसमें उन्होंने वैचारिक गरीबी का जिक्र किया. तमाम वो लोग. जो इस अन्ना आंदोलन के भागीदार बने हैं, वे क्या अपने घर से ईमानदार बनने या बनाने की शुरुआत नहीं करेंगे. सिस्टम तो सुधर जाएगा. क्योंकि कोई भी गलत चीज ज्यादा दिन तक नहीं टिकती. लेकिन आनेवाले समय में अन्ना जैसे लोग पैदा नहीं होंगे. अन्ना के आंदोलन में फिल्म स्टार से लेकर लेखक, अधिकारी और आम लोग तक हिस्सेदार बने, ये देख मन को संतोष मिला. पहली बार ऐसा भी हुआ कि सरकार को एक आदमी की ताकत का अहसास हुआ है. वैसे मीडिया भी कम से कम अन्ना को लगातार महत्व देता रहा. कल तक शायद अन्ना का अनशन भी खत्म हो जाए.
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