Wednesday, August 27, 2008

रुको, देखो, संभलो और फिर चलो

पहले जम्मू और अब उड़ीसा। हिंसा और द्वेष का उठता बवंडर। उड़ीसा में पहले वीएचपी नेताओं की हत्या हुई और फिर नन को जिंदा जला दिया गया। आज इस देश में हिंसा और द्वेष ने आम जनमानस को बुरी तरह झकझोर कर रख दिया है। वह तिलमिलाता है, लेकिन रोटी-कपड़े के लिए नहीं, बल्कि उन मुद्दों के लिए, जो कि सहज संवाद से सुलझाया या समझा जा सकता है। हमारे लोग लड़ते हैं, आपस में ही, बिना किसी कारण या वजह के। हम एक ही ईश्वर की संतान हैं। हमारा खून, हमारा चिंतन और हमारे विचार एक हैं। ये सब चीजें हम सब समझते हैं, जानते हैं। लेकिन जैसे कभी-कभी कुछ हो जाता है। भटकाव के प्रवाह में खोकर हिंसा का नंगा नाच इस देश को उस चौराहे पर खड़ा कर देता है, जहां हमारा सिर शमॆ से झुक जाता है। जेहन में १९८४, १९९२ और गुजरात के दंगे ताजें हो जाते हैं। शायद यहां के लोगों ने इन घटनाओं से अब तक सीख नहीं ली है। राजनेताओं को रोटी-कपड़ा और मकान की फिक्र नहीं दिख रही। देश में महंगाई का मुद्दा दो महीने पहले उठा तो था, लेकिन परमाणु करार मुद्दे की धार में जैसे एक कोने में खो गया। न बहस हो रही है और न उसे सुलझाने के लिए कोई ठोस कदम उठाये जा रहे हैं। हम इतने असंवेदनशील हो गये हैं कि उस गरीब की आह नहीं महसूस कर पा रहे हैं, जो दो जून की रोटी के लिए हर वक्त संघषॆ कर रहा है। धमॆ के मुद्दे पेट की भूख के आगे गौण हो जाते हैं। जम्मू में एक महीने से जारी बवाल थम नहीं रहा है कि उड़ीसा में एक नया सिलसिला चालू हो गया। धमॆ को मुद्दा बनाकर इस देश को विनाश की ओर कितने दिनों तक धकेला जाता रहेगा, पता नहीं। एक आम आदमी को क्या चाहिए, रोटी-कपड़ा और मकान। पहले हमारे समाज के अंतिम व्यक्ति तक को ये तीन चीजें मिल तो जायें। एक बात तो हैं, हमारे देश की व्यवस्था कुछ मायनों को काफी बेहतर है, लेकिन हमारा गलत चिंतन और उसे बिगाड़ने के लिए तूला रहता है। कम से कम अब तो भाई धमॆ के नाम पर मत खेलो, रुको, देखो, संभलो और फिर चलो।

1 comment:

amar said...

'फिर इलेक्शन की हवा बहने को है
फिर चमन में फूल 'मज़हब' के खिले।'

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