Sunday, September 7, 2008

हिदी-मराठी, हमारा-तुम्हारा, कब तक रोकिये यह सिलसिला


ताजा खबर - जया बच्चन के बयान के बाद मराठी बनाम हिंदी विवाद ने फिर जोर पकड़ लिया है।

क्या कहा - जया बच्चन ने मुंबई में फिल्म द्रोण के प्रोमो की लांचिंग के मौके पर कहा कि हम यूपी के लोग हैं, हमें हिंदी में बात करनी चाहिए। कहा जा रहा है कि जया बच्चन ने यह बात मजाक के तौर पर कही है।

चलिये ठीक है, माना कि यह बात मजाक के तौर पर कही गयी। अब आप चाहेंगे कि मैं एक हिंदीभाषी जयाबच्चन की बात का समथॆन करूंगा। आपका सोचना सही होता, लेकिन मैं उनकी बातों का समथॆन नहीं करता। क्योंकि मुझे जिला, तहसील या राज्य से ऊपर अपने देश से प्रेम है।

वह कहती हैं-हम यूपी के लोग। इससे क्या जाहिर होता है। इससे उनका उस इलाके से लगाव जाहिर होता है। अच्छी बात है, पर क्या इसे सावॆजनिक मंच से बयान जारी कर बताना जरूरी है?

अगर इसी तरह राज ठाकरे मराठी प्रेम की बात करते हैं, तो आप उन पर उंगली उठाते हैं कि वह देश को भाषा के आधार पर बांट रहे हैं। लेकिन अब जब हम-आप हिंदी के बहाने यूपी-बिहार की बात करते हैं, तो क्या हम भी वही नहीं कर रहे?

हमारे ख्याल से एक सेलिब्रिटी को पहले तो बयान हमेशा सोच-समझ कर देना चाहिए। क्योंकि वे समाज की एक रोल मॉडल हैं। साथ ही एक पॉलिटिशियंस भी।

बात इनसे हटकर जरा आप फिल्म इंडस्ट्री की ही कर लें। लोग बनाते हिंदी फिल्में हैं, लेकिन बातचीत या इंटरव्यू ज्यादातर अंगरेजी में होती है। उस समय फिल्मी गलियारे के लोग क्यों हिंदी के बारे में क्यों भूल जाते हैं?

हिंदी से अगर प्रेम है, तो उसे विवाद देने की बजाय सहज संवाद का माध्यम बनने दीजिये। नहीं तो, तुम्हारा-हमारा के चक्कर में इस देश का ही बंटाधार हो जायेगा। हां, कुछ दिनों के लिए जरूर बयानबाजी करने के कारण पब्लिसिटी मिल जाती है।

इस देश में हजारों भाषाएं बोली जाती हैं। हर दस किमी पर एक भाषा और संस्कृति दिख जायेगी। अगर हर इलाका अपनी संस्कृति और भाषा के बहाने अपनी बात मनवाने की कोशिश करने लगे, तब तो इस भारत यानी इंडिया का कल्याण होना निश्चित है।

थोड़ा मुद्दे को मोड़ कर अंगरेजी की बात करें। अंगरेज जहां गये, अंगरेजी का प्रचार-प्रसार किया। इस भाषा को इतना सहज बनाया कि यह पूरे विश्व में बोली जाने लगी। आज ज्यादा आसान शब्द अंगरेजी से ही आये हैं।

कहने का अथॆ है कि मराठी हो या हिंदी, भाषा को दायरे में बांधकर नहीं रखा जा सकता है।

भाषा को राजनीति का आधार बनाये बगैर उसकी समृद्धि के बारे में सोचिये।

इस देश ने भाषा के बहाने काफी विवाद झेल लिया है। कम से कम अब तो विवाद को नहीं बढ़ाया जाये।

शायद अन्य लोगों का भी यही सोचना होगा।

2 comments:

ओमप्रकाश तिवारी said...

इस देश ने भाषा के बहाने काफी विवाद झेल लिया है। कम से कम अब तो विवाद को नहीं बढ़ाया जाये।

सत्याजीतप्रकाश said...

छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी.

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