Saturday, November 15, 2008

आत्मा की सुनें, दूसरों की नहीं

बहस और आरोप-प्रत्यारोप के दौर में कभी-कभी पुरानी रचनाएं मन खोलकर रख देती हैं। विचार करते हुए एक कहानी पर नजर पड़ी। पुरानी पत्रिका में थी। सोचा यहां आपके लिए डाल दूं।

कहानी इस प्रकार है।

प्राचीन यूनान के एथेंस नगर में एक प्रसिद्ध मूरतिकार था। उसने एक जैसी दो प्रतिमाओं का निमाॆण किया। पहली प्रतिमा शहर के उद्यान में बन रही थी। वैसी ही दूसरी प्रतिमा वह रात्रि के समय अपने घर में बनाया करता था। उद्यान में कला प्रेमी लोग उसे काम करते हुए बड़े गौर से देखा करते थे। अधिकांश व्यक्ति प्रतिमा की रचना में दोष भी निकाल लेते और तरह-तरह के सुझाव देते। वह कलाकार सुझावों पर हर अमल की कोशिश करता। वह पहली प्रतिमा में कहे अनुसार परिवतॆन करता रहता था। लेकिन दूसरी प्रतिमा अपनी पसंद से बना रहा था। दोनों प्रतिमाएं एक साथ बनकर पूरी हुई। इसके बाद उसने दूसरी प्रतिमा को भी पहली के साथ ले जाकर खड़ा कर दिया। दशॆकों ने पाया कि पहली की तुलना में दूसरी प्रतिमा कलात्मक और सौंदयॆ में अप्रतिम है। लेकिन पहली प्रतिमा दूसरी की तुलना में फीकी है।

कलाकार ने कहा, लोगों पहली प्रतिमा आपके दृष्टिकोण के अनुसार रचित है, जबकि दूसरी मेरी आत्मा की रचना है?

आप समझ सकते हैं। अब आगे क्या कहूं।

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